इस लोकसभा चुनाव का मूल पाठ अगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सत्ता में वापसी से जुड़ा था, तो पश्चिम बंगाल का चुनावी नतीजा उसी का उप-पाठ है। जैसे केंद्र की सत्ता में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की धमाकेदार वापसी हुई है, वैसे ही पश्चिम बंगाल में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया है और वह सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सीटों के नजदीक पहुंच गई है। साफ है कि वाम दलों का वोट बैंक भाजपा में जा मिला है। यह लेफ्ट के लिए बड़ा झटका है। नरेंद्र मोदी ने तृणमूल प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 'स्पीड ब्रेकर दीदी' बताया था। वह सच कह रहे थे। ममता बनर्जी ने बंगाल में भाजपा को निर्णायक जीत हासिल करने से रोक दिया है, पर केसरिया पार्टी तृणमूल के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।
बंगाल में यह केसरिया लहर तीन कारणों से महत्वपूर्ण है-
वैसे तो बंगाल 1947 में धार्मिक आधार पर विभाजित हुआ था, पर यहां हिंदुत्ववादी पार्टी कभी मजबूत नहीं हुई। कांग्रेस, वाम मोर्चा और तृणमूल- इन तीनों का ही धर्मनिरपेक्ष स्वरूप रहा है। पर इस चुनाव में तृणमूल को भारी चुनौती देकर भाजपा ने बंगाल में आजादी से बाद की राजनीतिक परंपरा को ही पूरी तरह बदल दिया है। अगर भाजपा बंगाल में अपने इस जनाधार को बरकरार रखती है, तो इससे साबित हो जाएगा कि हिंदुत्व की राजनीति यहां के लिए बाहरी या त्याज्य विचारधारा नहीं है, बल्कि यह बंगाल की मुख्यधारा का अंग बन जाएगी।
वर्ष 1977 से पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय पार्टी को कभी ऐसी चुनौती नहीं मिली, जैसी इस बार भाजपा ने तृणमूल को दी है। पिछले चालीस साल से बंगाल ने अपना विशिष्ट राजनीतिक तरीका अख्तियार कर रखा था। इसके तहत पहले वाम दलों ने कांग्रेस और भाजपा को चुनौती दी, फिर तृणमूल ने भाजपा के खिलाफ असामान्य आक्रामकता का परिचय दिया। वरिष्ठ पत्रकार चंदन मित्र कहते हैं कि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा तृणमूल को मात देकर सत्ता में आ सकती है। इसका मतलब यह है कि बंगाल अपनी विशिष्ट पहचान को राष्ट्रीय विमर्श में बदल देगा। यदि अब कोई हिंसा भड़कती है, तो राष्ट्रपति शासन का विकल्प खुला रहेगा। नरेंद्र मोदी तक कह चुके हैं कि कानून-व्यवस्था के मामले में बंगाल का हाल जम्मू-कश्मीर से भी बुरा है। रूपा गांगुली कह ही चुकी हैं कि तृणमूल की हिंसा पर अगर अंकुश लगाया जाता, तो भाजपा 30 सीटें जीत सकती थी। जिस तरह से धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ, बांग्लादेशी घुसपैठियों से लेकर एनआरसी का मामला उठा और तुष्टीकरण पर खाई बढ़ी, उससे न केवल हिंदू-मुस्लिम के बीच, बल्कि धर्मनिरपेक्ष रुझान वाले हिंदू और हिंदुत्ववादी कोच राजबंशी, गोरखालैंड की मांग करते नेपाली, संथाल और मुंडा आदिवासी समूह तथा हिंदी भाषियों के बीच भी खाई बढ़ेगी। ऐसे ही भाजपा की आक्रामकता तथा एनआरसी का डर बांग्लादेश को चीन के नजदीक ले जाएगा।