गजेंद्र सिंह, दौसा, राजस्थान, उम्र 41 वर्ष
हर्षू जाटव, अलवर, राजस्थान, उम्र 55 वर्ष
आज ये सिर्फ नाम हैं। इस हफ्ते राजनीतिक दल राजनीतिक मुनाफे की फसल काटने में व्यस्त हैं। जल्द ही ये नाम महज आंकड़ों में तब्दील हो जाएंगे, जब गृह मंत्रालय नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की अगली रिपोर्ट प्रकाशित करेगा। आकलन के मुताबिक, 1995 से 2013 के बीच तीन लाख से ज्यादा किसानों (हर रोज तकरीबन 40) ने आत्महत्या की। इतनी आत्महत्याओं के बाद किसी बड़े बदलाव की उम्मीद होनी चाहिए थी, मगर मौत का यह तांडव थमता नहीं दिखता।
स्वतंत्रता की सुहानी सुबह में जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की थी, 'सब कुछ इंतजार कर सकता है, मगर खेती नहीं।' उनके ऐसा कहने की वजह बिल्कुल जाहिर थी। हर दस में से आठ लोग ग्रामीण इलाकों में रहते थे, भारत खाद्यान्न का बड़ा आयातक था और देश की गरीबी खेती से जुड़ी दिक्कतों के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। भारत दो दशकों तक 'सामूहिक कृषि' और 'सहकारी कृषि' की परिभाषाओं में उलझा रहा, और उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री और सी सुब्रमण्यम ने चारों ओर से उठ रहे विरोध का सामना करते हुए हरित क्रांति का सूत्रपात किया।
हरित क्रांति के पांच दशकों के बाद खाद्यान्न के मामले में भारत खुद को आत्मनिर्भर कहने की स्थिति में आ गया है। मगर किसानों के पेट में न तो अन्न है, और न ही तन पर कपड़े। किसानों की अनदेखी की पराकाष्ठा तो देखिए। दशक दर दशक जीडीपी की विकास दर में कृषि का हिस्सा सिमटता ही गया है। 1999 से 2014 के बीच जहां समग्र जीडीपी की विकास दर 6.99 प्रतिशत रही, वहीं कृषि का विकास महज 3.13 फीसदी की दर से हुआ। इस दौरान कम से कम दस राज्यों में कृषि विकास दर चार प्रतिशत के नीचे रही। राजनीतिक वर्ग ने न केवल कृषि को निवेश से दूर रखने का फैसला किया, बल्कि खेती को सब्सिडी का मोहताज भी बना दिया।
विकास को बढ़ावा देने और गरीबी में कमी लाने के लिए कृषि के आधुनिकीकरण का जो तर्क आजादी के बाद दिया गया था, उसमें आज भी कोई बदलाव नहीं आया है। और न ही तब से अब तक परिस्थितियां बदली हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश के छब्बीस करोड़ तीस लाख लोग, जिनमें तकरीबन बारह करोड़ उत्पादक और करीब साढ़े चौदह करोड़ मजदूर शामिल हैं, कृषि पर निर्भर है। इतना ही नहीं, देश का 55 प्रतिशत श्रमबल राष्ट्रीय आय के चौदह फीसदी हिस्से पर गुजर-बसर कर रहा है। ऐसे में, ग्रामीण भारत में गरीबी के हालात पर हैरत नहीं होनी चाहिए।
छह दशक तक बड़े-बड़े वायदों के बावजूद आज आलम यह है कि कुल बोए गए क्षेत्र का महज 37 फीसदी क्षेत्र सिंचित है, जबकि बाकी कृषि भूमि की सिंचाई उम्मीदों और प्रार्थनाओं पर निर्भर है। आपको ध्यान दिला दूं कि पहली पंचवर्षीय योजना से ग्यारहवीं योजना के बीच तकरीबन साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये मध्यम और बड़ी परियोजनाओं पर खर्च किए जा चुके हैं। चौंकाने वाली बात है कि इनमें से 571 परियोजनाएं तीस वर्ष से ज्यादा समय से लटकी पड़ी हैं। एक कार्य समूह ने इनमें से 151 परियोजनाओं का विश्लेषण करने पर पाया कि इनकी लागत एक हजार गुना बढ़ चुकी है, जबकि नौ परियोजनाएं ऐसी हैं, जो तय लागत से पांच हजार फीसदी महंगी हो चुकी हैं।
अब जरा कर्ज-संकट पर बात की जाए। हर वर्ष सरकारें कृषि के लिए उपलब्ध कर्ज के आंकड़े का प्रदर्शन करती हैं। इस वर्ष यह आंकड़ा 8.5 लाख करोड़ था। प्राथमिकता वाला क्षेत्र घोषित होने के बावजूद बैंक किसानों को कर्ज देना पसंद नहीं करते। तिस पर कर्ज प्राप्ति का रास्ता भी काफी पेचीदा है। पहले नाबार्ड से स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक, फिर जिला को-ऑपरेटिव बैंक से स्थानीय को-ऑपरेटिव और अंत में किसान तक कर्ज पहुंचता है। जाहिर है कि हर चरण में कर्ज की लागत बढ़ जाती है। जानना दिलचस्प है कि एक मर्सिडीज कार के लिए कर्ज लेना ट्रैक्टर के लिए ऋण लेने की तुलना में ज्यादा आसान है। इसके अलावा लघु वित्त संस्थान भी हैं, जो 18 से 36 फीसदी की ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज मुहैया कराते हैं। ऐसे में कर्ज के मोहताज किसानों का साहूकार तक पहुंचना आसान लगता है। हालत यह है कि दस में से छह किसानों की बैंकों तक औपचारिक पहुंच नहीं है, और इसी वजह से वे साहूकारों की दया पर निर्भर हैं।
कृषि के आगत को लेकर भी समस्याएं हैं। योजना यह थी कि अनाज की बीज प्रतिस्थापन दर कम से कम 20 फीसदी होनी चाहिए, ताकि गुणवत्ता और उत्पादन को बनाए रखा जा सके। पर यह दस फीसदी के नीचे बनी हुई है। इतना ही नहीं, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के उत्पादन के क्षेत्र में शोध और विकास की बेहद कमी है। साथ ही, उर्वरकों की उपलब्धता और उपयोग, दोनों ही पर्याप्तता की सीमा के नीचे हैं। गौरतलब है कि चीन में भारत के दस वर्ष बाद हरित क्रांति का आगाज हुआ, पर गेहूं और धान, दोनों में चीन का उत्पादन भारत से दोगुना है।
हर कृषि उत्पाद के लिए भंडारण, वितरण और प्रसंस्करण जरूरी होता है। मगर कृषि उत्पाद के भंडारण में सरकार नाकाम रही है। बाजार से बेहतर संपर्क न होने की कीमत भी वितरण व्यवस्था को चुकानी पड़ रही है। तीन दशक पुराना खाद्य व प्रसंस्करण मंत्रालय कुछ कृषिगत उत्पादों तक ही खुद को सीमित किए है। इसी तरह, बागवानी बोर्ड के तीस वर्ष होने के बावजूद बागवानी कृषि क्षेत्र का महज 20 फीसदी ही है। समझने वाली बात है कि कृषि कोई समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक विकास की चुनौतियों का समाधान है। मगर सवाल वही है कि क्या राजनीतिक वर्ग इस चुनौती से निपटने को तैयार है?
-अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक