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राज-समाज: नागरिक समाज का डर, ऐसे संगठनों को पसंद नहीं करते कुछ राजनीतिक दल

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 23 Apr 2023 06:40 AM IST

सार

बेंगलुरू में हाल ही में सिविल सोसाइटी फोरम ने विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जब नागरिक घोषणा पत्र जारी किया तो जनता दल (यू) और भाजपा ने अपने प्रतिनिधि नहीं भेजे। जद (यू) शायद नागरिक संगठनों को लेकर बेपरवाह है, वहीं भाजपा नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता पसंद नहीं करती।
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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला


घोषणापत्र के वितरण के बाद एक बैठक हुई, जिसमें राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया। मैंने भी बैठक में भाग लिया और गहरी रुचि के साथ कार्यवाही देखी। शुरुआत सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ताओं के शासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सामाजिक न्याय इत्यादि से संबंधित प्रजेंटेशन से हुई और इसका समापन वहां आए राजनेताओं की प्रतिक्रियाओं और श्रोताओं के प्रश्नों के जवाब देने से हुआ। चर्चा रचनात्मक थी। हालांकि, बैठक में राज्य के तीन प्रमुख राजनीतिक दलों में से दो के प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए। ये पार्टियां हैं, जनता दल (सेक्यूलर) और भारतीय जनता पार्टी। कर्नाटक की तीसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस ने अपना एक प्रतिनिधि भेजा था। उसके अलावा राज्य में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही आम आदमी पार्टी और श्रमिक वर्ग के जिलों के कुछ हिस्सों में अब भी प्रभाव रखने वाली माकपा (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) ने भी अपने प्रतिनिधि भेजे थे।


आयोजकों ने जनता दल (एस) और भाजपा को कई बार फोन किए, लेकिन वादा करने के बावजूद इनमें से किसी भी पार्टी ने अपना प्रवक्ता नहीं भेजा। ऐसा क्यों है? मेरा अनुमान है कि जद (एस) के मामले में शायद यह उदासीनता थी। पार्टी को नागरिक समाज की परवाह नहीं है। हालांकि, भाजपा के मामले में, इस बैठक में शामिल होने से इनकार लगभग निश्चित रूप से उन नागरिक समाज संगठनों के प्रति उनकी तीव्र नापसंदगी पर आधारित था, जो स्वतंत्र रूप से काम करते हैं।

नागरिक समाज के प्रति भाजपा की नापसंदगी का मूल कुछ हद तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वैचारिक अभिविन्यास में निहित है। स्वभाव से अधिनायकवादी, आरएसएस भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के सभी क्षेत्रों को नियंत्रित करना चाहता है। जहां भी यह काम करता है-किसानों, आदिवासियों, महिलाओं, छात्रों, पड़ोस के समूहों के बीच-वह कोई प्रतिस्पर्धा नहीं चाहता है।


भाजपा की सिविल सोसाइटी की नापसंदगी की एक अन्य, और संभवतः कहीं अधिक महत्वपूर्ण वजह है मौजूदा प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व। सहज अधिनायकवादी नरेंद्र मोदी सत्ता में रहते हुए शासन और प्रशासन को पूरी तरह नियंत्रित करना चाहते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में वह राज्य के नागरिक समाज समूहों के खिलाफ कड़ाई से पेश आए थे।


पिछले नौ वर्षों के दौरान जब से नरेंद्र मोदी सत्ता में हैं, उनकी सरकार ने स्वयंसेवी संगठनों के प्रति कटु शत्रुता प्रदर्शित की है। शिक्षा, स्वास्थ्य, नीतिगत शोध और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में शानदार काम करने वाले संगठन और जिनका किसी राजनीतिक पार्टी या धार्मिक संगठन से कोई रिश्ता भी नहीं है, उन्हें कर छापे और एफसीआरए (फॉरेन कंट्रिब्यूशन नियंत्रण) अधिनियम के तहत मिली दान प्राप्त करने की मंजूरी को वापस लेकर प्रताड़ित किया गया है। कई संगठनों को प्रताड़ित किया गया है, जिनमें से ऑक्सफेम और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च कुछ चुनींदा उदाहरण हैं। ठीक इसी समय मौजूदा सत्ता के प्रति उदार हिंदुत्व समूहों के लिए विदेश से फंड लेने पर परोक्ष रूप से कोई रोक नहीं है। कुछ साल पहले, जब गैर-सांप्रदायिक संगठनों का एफसीआरए पंजीकरण रद्द कर दिया गया था, जबकि अनिवासी हिंदू स्वतंत्र रूप से आरएसएस से जुड़े निकायों को वित्त पोषण कर रहे थे, तब कन्नड़ कार्टूनिस्ट पी. महमूद ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी :  'मोदी जी कहते हैं, वन नेशन, वन एनजीओ'।


सच तो यह है कि जब 2004 और 2014 के बीच सत्ता में थी, तब कांग्रेस ने भी एफसीआरए अधिनियम का दुरुपयोग एनजीओ को परेशान करने के लिए किया था, खासकर पर्यावरण और मानवाधिकारों पर काम करने वाले एनजीओ को परेशान करने के लिए। उसी समय, कांग्रेस ने सामाजिक कल्याण नीतियों (जैसे ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) के संबंध में नागरिक समाज समूहों से सलाह भी मांगी थी। सत्ता में अभी मौजूद भाजपा सरकार सारे नागरिक समाज संगठनों पर तब तक अविश्वास करती है, जब तक कि वे उसके बहुसंख्यकवादी हिंदुत्व एजेंडे के साथ-साथ खुद प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व पंथ को स्वीकार कर उसका उत्साहपूर्वक प्रचार नहीं करते हैं।
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नागरिक समाज का यह डर वर्तमान सरकार के सामान्य रूप से स्वतंत्र जांच के डर से ही जुड़ा है। यही वजह है कि असाधारण और अभूतपूर्व तरीके से प्रधानमंत्री ने अपने दो कार्यकालों में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित नहीं की है। इसीलिए प्रेस के उन वर्गों पर सरकार के हमले होते हैं, जो अब भी अपेक्षाकृत स्वतंत्र हैं। इसीलिए पत्रकारों और छात्र कार्यकर्ताओं को घिनौने यूएपीए के तहत जेल भेजा गया, इसीलिए (अप्रिय) सीएए और कृषि कानूनों के खिलाफ हुए सराहनीय शांतिपूर्ण विरोधों के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया। इसीलिए विदेशी विद्वानों को अनुसंधान वीजा देने से इनकार, और भारतीय विश्वविद्यालयों में भारतीय नागरिकों द्वारा चलाए जा रहे सेमिनारों पर अंकुश लगाया जा सकता है।


पुनः, निष्पक्षता से स्वीकार करना चाहिए कि भाजपा के अलावा अन्य दलों द्वारा संचालित कई राज्य सरकारें भी अपनी नीतियों के स्वतंत्र मूल्यांकन की ज्यादा सराहना नहीं करती हैं। यह बात पश्चिम बंगाल में माकपा शासन में सच थी और अब टीएमसी के समय भी, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के समय सच थी और अब द्रमुक के समय भी, आंध्र प्रदेश में वाईआरएस कांग्रेस शासन और तेलंगाना में टीआरएस शासन में भी यही सच है। बहरहाल, भाजपा ने नागरिक समाज और स्वतंत्र विचार के प्रति इस शत्रुता को एक बिल्कुल नए स्तर पर पहुंचा दिया है।


1830 के दशक में लिखते हुए, फ्रांसीसी विचारक, एलेक्सी दे तोक्यूविले ने तर्क दिया कि अमेरिकी लोकतंत्र को इसके फलते-फूलते स्वैच्छिक संघों द्वारा पोषित किया गया था। उस समय, कुलीन यूरोप भले ही सुस्त रहा हो, लेकिन 19वीं शताब्दी के अंत तक इसके अपने स्वयं के कई संपन्न स्वैच्छिक संघ थे। ये दो तरह के थे, आलोचनात्मक और रचनात्मक। पहले ने अपने नागरिकों को अभाव या भय से मुक्ति दिलाने में राज्य की विफलताओं पर प्रकाश डालने की कोशिश की; दूसरे ने स्वयं स्कूल, अस्पताल आदि स्थापित करके इन विफलताओं की भरपाई करने की मांग की।


तोक्यूविले के लगभग दो सदियों बाद लिखते हुए, मैं उनके इस विचार का समर्थन करता हूं कि किसी देश के नागरिक समाज का स्वास्थ्य समग्र रूप से उसकी राजनीतिक व्यवस्था के स्वास्थ्य के सूचकांक के रूप में काम कर सकता है। इस संबंध में, आपातकाल समाप्त होने के बाद के दशकों में भारत शायद सबसे अधिक लोकतांत्रिक था। फिर भी, 2014 से, राज्य ने स्वायत्तता से काम करने वाले समूहों और संगठनों के खिलाफ अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी। बेंगलुरू में सिविल सोसाइटी फोरम की हाल की बैठक में भाजपा के अपना प्रतिनिधि न भेजने के पीछे भूल या चूक नहीं थी, बल्कि सोच-विचार कर ऐसा किया गया। भाजपा स्वतंत्र प्रेस और एक सशक्त नागरिक समाज को अपनी विचारधारा के प्रचार और अपने शासन को बनाए रखने के लिए विरोधी के रूप में देखती है।

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