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Kargil War: युद्ध के 25 साल बाद भी सुरक्षा के मोर्चे पर निरंतर सतर्कता की जरूरत

महेंद्र वेद
Updated Fri, 03 May 2024 07:45 AM IST

सार

पच्चीस साल पहले ठीक आज के दिन पाकिस्तान ने कारगिल में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था, जिसमें हर बार की तरह फिर से उसकी पराजय हुई। उसके बाद भारत ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा में कई तरह के सुधार किए, लेकिन आज भी भारत को अपनी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला


भारत को घुसपैठियों के बारे में अचानक पता लगा। ताशी नामग्याल नामक चरवाहा जब अपनी गुम हुई भेड़ों को खोज रहा था, तो उसने पठानी शूट में पाकिस्तानियों को देखा, जो बाल्टिक पर्वत शृंखला पर बंकर खोद रहे थे। नब्बे डिग्री की खड़ी चट्टान पर चढ़ाई करने वाले युवा सैन्य अधिकारियों और जवानों ने बहादुरी से पाकिस्तानी गोलियों का सामना किया और अपने भारतीय नेतृत्व को गर्व करने का अवसर प्रदान किया। इस युद्ध में ज्यादातर 22-35 वर्ष के युवा जवान शहीद हुए। आधिकारिक रूप से भारत के 527 जवान शहीद हुए, जबकि पाकिस्तान के 357 से 453 के बीच जवान मारे गए। पाकिस्तान ने अपने 600 अन्य जवानों की लाशों पर दावा न करके उन्हें अपमानित किया। नतीजतन भारत को ही उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा।


वस्तुतः यह भारत के लिए कठिन कार्य था। पाकिस्तानियों के कड़े प्रतिरोध का सामना करते हुए भारत ने अपनी वायु सेना और बोफोर्स तोप को तैनात कर अपनी रक्षा की। उसी साल एक भारतीय यात्री विमान का अपहरण हुआ, जिसे पहले लाहौर, फिर कांधार ले जाया गया। भारत को विमान, चालक दल और यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के लिए चार कश्मीरी आतंकवादियों को रिहा करना पड़ा।


पच्चीस वर्ष बाद भी इन विफलताओं पर भारत में बहुत कम चर्चा हुई है। पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक नजम सेठी कहते हैं, ‘भारत के साथ पाकिस्तान ने जितने भी युद्ध किए, सभी में हार गया, हालांकि उसी ने इसकी योजना बनाई थी, पर कुछ हासिल न कर सका।’

पहले सर्दियों में कारगिल क्षेत्र की ऊंचाइयों वाली चौकियों को दोनों देशों के सैनिक खाली कर देते थे और फिर वसंत के मौसम में वहां तैनात हो जाते थे। 1999 की सर्दी में पाकिस्तानी फौज ने भारतीय सेना से पहले ही कारगिल द्रास एवं बाल्टिक की सामरिक ऊंचाइयों पर स्थित अग्रिम चौकियों पर आतंकियों के सहयोग से कब्जा कर लिया। हालांकि उसने ऐसा भारतीय इलाके पर कब्जे के लिए नहीं, बल्कि भारत पर सामरिक बढ़त पाने के लिए किया था। यदि वह सफल हो जाता, तो राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक को अवरुद्ध करके कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच संपर्क खत्म कर सकता था। पाकिस्तानी योजनाकार चाहते थे कि भारत को सियाचिन ग्लेशियर छोड़ने और कश्मीर पर बातचीत करने के लिए मजबूर किया जाए। लेकिन 1984 में सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जे के बाद से आज तक भारत उस पर कब्जा जमाए हुए है। कारगिल युद्ध के बाद दोनों में से कोई भी पक्ष दुनिया के इस सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र को छोड़ना नहीं चाहता है।


पाकिस्तानी लेखक तारिक अकील के अनुसार, सैन्य मामलों की सीमित जानकारी होने के कारण नवाज शरीफ भारतीय सेना की पलटवार करने की क्षमता से वाकिफ नहीं थे। ‘वह इस भ्रम में थे कि घुसपैठिये सफल हो जाएंगे और कारगिल पर कब्जा कर लेंगे, जिससे भारत को कश्मीर पर अंतिम समझौता करने के लिए मजबूर किया जा सकेगा और वह इतिहास में कश्मीर विजेता के रूप में जाने जाएंगे।’


पाकिस्तानी योजनाकारों ने मान लिया था कि चूंकि पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न है, इसलिए भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कोई बड़ा कदम नहीं उठाएगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय प्रारंभिक चरण में ही हस्तक्षेप करेगा, जिससे नियंत्रण रेखा के पार मिली बढ़त पर पाकिस्तान का कब्जा हो जाएगा तथा चीन पाकिस्तान का पक्ष लेगा और भारतीय सेना ऊंचाई पर लड़ने के लिए प्रशिक्षित पर्याप्त सैनिक नहीं जुटा पाएगी। लेकिन ये सारी बातें गलत साबित हुईं। किसी ने भी पाकिस्तान की इस बात को नहीं माना कि कश्मीरी स्वतंत्रता के लिए भारतीय सेना से लड़ रहे हैं और उनमें पाकिस्तानी सेना शामिल नहीं है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने नवाज शरीफ को आदेश दिया कि वह सभी पाकिस्तानी सैनिकों की भारतीय चौकियों पर से वापसी सुनिश्चित करें।
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हालांकि कारगिल युद्ध ने छोटे पैमाने पर और सीमित भौगोलिक सीमाओं के साथ ही दोनों देशों में गहन सामरिक विश्लेषण को प्रेरित किया। भारत ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की कमियों पर चर्चा की। वाजपेयी सरकार ने के. सुब्रमण्यम के नेतृत्व में पाकिस्तानी हमलों के लिए जिम्मेदार घटनाओं तथा सशस्त्र घुसपैठियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा के रक्षा उपायों की सिफारिश के लिए कारगिल रिव्यू कमेटी गठित की। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राजनीतिक, नौकरशाही, सैन्य और खुफिया प्रतिष्ठानों ने यथास्थिति बनाए रखने में अपना निहित स्वार्थ खोज लिया है। उसने जोर देकर कहा कि कारगिल युद्ध, पाकिस्तान की ओर से चल रहे छद्म युद्ध और परमाणु सुरक्षा वातावरण को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जरूरत है।


युद्ध के बाद के मूल्यांकन की गंभीरता को रेखांकित करते हुए, खुफिया तंत्र, आंतरिक सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और रक्षा प्रबंधन का मूल्यांकन करने के लिए चार कार्यबलों की स्थापना की गई। दो रिपोर्टों के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रबंधन में कई बदलाव हुए। केंद्रीकृत संचार और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस को संभालने के लिए 2004 में राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन का गठन किया गया था। सेना की विशिष्ट खुफिया जरूरतों को पूरा करने के लिए रक्षा खुफिया एजेंसी का गठन किया गया। बेहतर अंतर-एजेंसी सूचना-साझाकरण और समन्वय को बढ़ावा देने के लिए एक बहु-एजेंसी केंद्र स्थापित किया गया। रक्षा प्रतिष्ठान को भी कुछ हद तक पुनर्गठित किया गया। आज भारत आर्थिक और सैन्य रूप से मजबूत है, लेकिन आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए निरंतर सतर्कता की जरूरत है।

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