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बेबो से बेगम तक

Sat, 20 Oct 2012 07:48 PM IST
शोभा डे
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आखिरकार अपनी बेबो अपने आकर्षक नवाब की बेगम बन ही गईं। इस तरह बॉलीवुड के एक और रोमांस का परीकथानुमा सुखद अंत हुआ। एक के बाद एक हिट फिल्म देने वाला प्रतिभाशाली संवाद लेखक भी ऐसी शानदार पटकथा नहीं लिख सकता था, जिसकी शुरुआत पहाड़ पर एक फिल्म की शूटिंग से हुई थी और जिसका अंत पटौदी के ऐतिहासिक महल में हुआ है। लेकिन उस करीना के लिए यह आश्चर्यजनक कतई नहीं है, जो हमेशा ही एक राजकुमारी की तरह पली हैं। उनकी पहली फिल्म से ही उनके साथ ऐसा व्यवहार होता रहा है।
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कभी खुशी कभी गम में उन्होंने एक राजकुमारी जैसी भूमिका निभाई थी, जिसमें कई तरह से उनकी वास्तविक जिंदगी की झलक भी दिखती थी। एक बार करण जौहर ने करीना को शाही तरीके से दर्शकों के सामने पेश कर दिया, तो फिर कभी उन्होंने पलटकर नहीं देखा। करीना वस्तुतः एक वैभवशाली जीवन की प्रतीक हैं। इसीलिए एक शाही खानदान की बेगम की भूमिका में तमाम तड़क-भड़क को उन्होंने सहज-स्वाभाविक तरीके से जज्ब कर लिया है। कुछ दशक पहले उनकी सास शर्मिला टैगोर ने भी इसी तरह अपने अंदर के रिंकू को खोए बगैर तमाम गरिमा के साथ खुद को आयशा बेगम की नई भूमिका में ढाल लिया था।

ये समानताएं यहीं खत्म नहीं होतीं। उम्मीद है कि पटौदी विरासत की परंपराओं को निभाने के साथ-साथ करीना पहले की ही तरह फिल्मी परदे पर नजर आती रहेंगी। आखिरकार वह नए जमाने की बेगम हैं। वह एक कामयाब महिला हैं, जो करियर के साथ-साथ अपनी तरह ही व्यस्त रहने वाले नवाब साहब की देखभाल कर सकती है। यह 21वीं सदी की उन शादियों में एक थी, जिसका आकर्षण लंबे समय तक बरकरार रहेगा। मुबारक हो।
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बॉलीवुड की रानी मेरा मतलब रानी मुखर्जी की एक घटिया फिल्म देखकर मैं चकित हूं। बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस अभिनेत्री ने आखिर ऐसी फिल्म का चुनाव कैसे कर लिया? क्या उन्हें इस बारे में पहले किसी ने सुझाव नहीं दिया था? उनकी फिल्म के नायक को एक प्रभावशाली और समझदार ब्वायफ्रेंड/मंगेतर/एक अच्छा दोस्त जिस तरह बताया गया है, उसका क्या मतलब है?

गौर कीजिए, यहां मैं उसे पति तो कह ही नहीं रही हूं। सिर्फ यही नहीं कि इस फिल्म की कहानी अस्वाभाविक है, जिसमें एक औरत अजीब किस्म के आदमी के शरीर की गंध के पीछे पागल है, बल्कि यह अधकचरी भी है। अपनी सामान्य भूमिका में दक्षिण भारतीय फिल्मों के स्टार पृथ्वीराज बेहद कमजोर नजर आए हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें किसी दोपहिया वाहन में पेट्रोल भरने के लिए कहा गया है, वह पेट्रोल भरने वाली नली को अपने बगल में दबाकर टंकी के पूरी तरह से भर जाने का इंतजार करते हैं और फिर इसे रानी मुखर्जी के चेहरे पर उड़ेल देते हैं। कोरियोग्राफी भी फूहड़ तरीके लुंगी चढ़ाते पृथ्वी की तरह ही बेकार है। रानी मुखर्जी जैसी ऊंची शख्सियत को ऐसी लचर भूमिका निभाने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इतना ही नहीं, उन्होंने फिल्म के आइटम नृत्यों में अब तक के सबसे फूहड़ नृत्य का प्रस्तुतीकरण किया है।

मुंबई एकेडमी ऑफ मूविंग इमेज (मामी) ने हाल ही में 14वें मुंबई फिल्म समारोह का आयोजन किया, और वह भी सोबो जैसे नजदीकी मल्टीप्लेक्स में। मायानगरी से दूर होने के कारण पिछले एक दशक की बेहतरीन फिल्मों की स्क्रीनिंग में शामिल न हो पाने वाले फिल्मप्रेमी अब अपने नजदीक के मल्टीप्लेक्स में इन फिल्मों का आनंद उठा सकते हैं। इस शानदार आयोजन के लिए श्याम बेनेगल और मामी की पूरी टीम को बधाई।
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