भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ओर से सर्वाधिक तीन शतक लगाने वाली मिताली राज 2005 के विश्व कप सेमी फाइनल को आज भी नहीं भूल सकी हैं। न्यूजीलैंड के खिलाफ उस मैच में उन्होंने 91 रनों की नाबाद पारी खेली थी, और उनका मानना था कि कुछ गेंदें और मिलतीं, तो वह शतक लगाने में कामयाब हो जातीं।
यह वह सपना था, जिसे डायना इडुलजी, शांता रंगास्वामी, पूर्णिमा राव, प्रमिला भट्ट जैसी खिलाड़ियों के साथ ही क्रिकेटप्रेमी भी तब से देख रहे थे, जब भारत ने 1978 में पहली बार विश्व कप की मेजबानी की थी। एक अदद शतक के उस इंतजार को अब मद्रासी बाला तिरुष कामिनी ने खत्म किया है। यह सुखद संयोग ही है कि उन्होंने यह उपलब्धि टीम इंडिया के 200वें मैच में हासिल की है।
तिरुष की आंखों में नीली जर्सी में खेलने का सपना तभी से पलने लगा था, जब वह महज नौ वर्ष की थी। उनके पिता हॉकी खिलाड़ी थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि बेटी क्रिकेट का बल्ला पकड़ना ज्यादा पसंद करती है, तो उन्होंने उसे क्रिकेट का प्रशिक्षण देना शुरू किया। पुरुष वर्चस्ववादी इस खेल की तरफ पिता शुरू में थोड़े उदासीन थे, लेकिन जब बेटी ने बल्ला थामने की जिद की, तो पिता उसे पैड पहनाने के लिए खुद आगे आ गए।
तिरुष ने क्रिकेट की बारीकियां तमिलनाडु के खेल और विकास प्राधिकरण में सीखीं, जहां बिताए पल आज भी उन्हें याद हैं। तिरुष कहती हैं, चूंकि कैंप में महिला खिलाड़ी कम ही थे, इसलिए वह लड़कों के साथ अभ्यास करती थीं, और जब उन्हें विकेट मिलने लगे, तो उनका रुझान लेग स्पिन की तरफ बढ़ने लगा। गेंद को उंगलियों पर नचाने का ही नतीजा था कि अपने पहले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट (एशिया कप- 2006/07) में ही वह 'प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट' चुनी गईं, और उस समय उनकी उम्र महज 16 वर्ष थी।
अब टीम इंडिया के लिए ओपनिंग करने वाली तिरुष अपना एक और सपना पूरा करना चाहती है, और वह है, टीम को विश्व कप जिताना। हालांकि पुरुषों की तरह स्टारडम नहीं मिलने का दुख तो उन्हें है, पर जैसा कि वह मानती हैं, लोगों का साथ मिले और मीडिया आगे आए, तो बात बन सकती है। वर्ष 1983 में जब भारत ने पहला विश्व कप जीता था, तो उसमें कपिल देव विश्व कप में शतक जड़ने वाले पहले भारतीय बने थे, तो क्या पहला शतक का यह संयोग इस बार महिलाओं के लिए भी शुभ होगा? तिरुष इसके लिए आशान्वित हैं।