गोकक आंदोलन कर्नाटक के इतिहास के बेहद चर्चित भाषा अधिकार आंदोलनों में से एक है, जो कन्नड़ को पहली भाषा का दर्जा दिलाने के लिए लड़ा गया था। कमल हासन के बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से गर्म हो गया है और कर्नाटक के विपक्षी व सत्तारूढ़ दोनों दलों के नेताओं ने इस मुद्दे को कन्नड़ लोगों के स्वाभिमान से जोड़ते हुए इसकी निंदा की है। अच्छा होता कि कावेरी नदी जल बंटवारे और भाषा संबंधी विवादों को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों के मद्देनजर दिग्गज अभिनेता अपनी सार्वजनिक हैसियत को देखते हुए इस तरह के बयान को देने से पहले थोड़ी सावधानी बरतते। खासकर तब, जब दोनों ही राज्य भाषा के मामले में बेहद संवेदनशील हैं और एक छोटी-सी चिंगारी भी बड़ी आग लगा सकती है।
बेलगावी, मैसूर, हुबली और बंगलूरू जैसी कई जगहों पर पहले ही विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। दूसरी तरफ, डीएमके, पीएमके, वीसीके, एनटीके जैसे तमिलनाडु के मुख्यधारा के राजनीतिक दलों ने कमल हासन का यह कहते हुए खुलकर समर्थन किया कि अभिनेता ने केवल ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला दिया है और कुछ पार्टियों ने तो दो कदम और आगे बढ़ते हुए यह दावा भी कर दिया कि ‘तमिल सभी द्रविड़ भाषाओं की जननी है।’ इसने आग में और घी डालने का काम किया है।
इस संदर्भ में यह समझने के लिए कि क्या कमल हासन के बयान का कोई महत्व है या नहीं, इसे इतिहास की कसौटी पर परखना होगा। दशकों तक चले कठिन शोध के बाद भाषाविदों ने पांच द्रविड़ भाषाओं की पहचान की है, जिनमें तमिल, तेलुगू, तुलू, मलयालम और कन्नड़ शामिल हैं। इन्हें ‘पंच द्रविड़’ कहा जाता है। भाषाविदों के बीच एक बड़ी सहमति है कि लगभग चार हजार वर्ष पूर्व, ये पांच द्रविड़ भाषाएं एक ही भाषा थी, जिसे प्रोटो-द्रविड़ कहा जाता था। हालांकि, इस प्रोटो-द्रविड़ भाषा ने समय के साथ अपना महत्व खो दिया और विलुप्त हो गई। इसकी वजह यह थी कि इस भाषा के बोलने वाले अलग-अलग क्षेत्रों में चले गए और वहां अपनी व्यक्तिगत पहचान स्थापित की। इसी प्रक्रिया में कन्नड़ और तमिल जैसी भाषाएं, जो द्रविड़ परिवार की प्रमुख भाषाएं हैं, एक मूल पूर्वज, यानी प्रोटो-द्रविड़ से अलग शाखाओं के रूप में विकसित हुईं। उल्लेखनीय है कि कन्नड़ भाषा, जहां 2,500 वर्ष पुरानी, तो तमिल उससे भी पुरानी मानी जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि कन्नड़ की उत्पत्ति तमिल से हुई है।
यह कोई पहली बार नहीं, जब कमल हासन ने इस तरह की टिप्पणी की हो। इससे पहले भी उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के हिंदी विरोधी रुख का समर्थन किया था और ऐसे बयान दिए थे, जिनसे हिंदी पट्टी के लोगों की भावनाएं आहत हुई थीं। अब ऐसा लगता है कि उनकी मेहनत निष्फल नहीं गई है और स्टालिन के साथ इस जुड़ाव का पुरस्कार उनकी पार्टी को डीएमके द्वारा आवंटित राज्यसभा सीट के रूप में मिल चुका है। कन्नड़ पर हालिया विवाद और हिंदी पर पहले के विवाद, दोनों में कमल हासन का केंद्र में होना उनके खेल और मंशा दोनों को ही दर्शाता है। दरअसल, कमल हासन जो भी करते हैं, उसे लेकर वह पूरी तरह से स्पष्ट होते हैं। इसे समझने के लिए उनकी राजनीतिक यात्रा को समझने की जरूरत है।
कमल हासन ने 2018 में अपनी पार्टी मक्कल नीधि मय्यम (एमएनएम) की शुरुआत की, दो चुनाव भी लड़े, लेकिन उन्हें ज्यादा राजनीतिक सफलता नहीं मिली। लेकिन 2021 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के दौरान एमएनएम प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में वोट काट सकती थी, और यहीं से डीएमके के कमल हासन के प्रति आकर्षित होने की शुरुआत हुई। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों में गठबंधन भी हुआ। डीएमके गठबंधन का हिस्सा होने के नाते कमल हासन 2026 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन के लिए स्टार प्रचारक हो सकते हैं।
कमल तमिल आबादी के अपनी भाषा के प्रति भावनात्मक झुकाव को जानते हैं और यही कारण है कि उन्होंने अपने फिल्म प्रचार कार्यक्रम की शुरुआत ‘उइरे उरावे तमीज’ (मेरा जीवन और मेरा परिवार तमिल है) से की। यहां तक कुछ गलत नहीं था, लेकिन इसके बाद भाषाई इतिहास और कन्नड़ लोगों की भावनाओं को अनदेखा करते हुए सिर्फ तमिल आबादी को खुश करने के लिए एक अनुभवी कन्नड़ अभिनेता के सामने उन्होंने तमिल भाषा की श्रेष्ठता दिखाने वाला जो बयान दिया, समस्या वहीं से शुरू हो गई।
उनके जैसे एक अनुभवी अभिनेता और परिपक्व इन्सान से ऐसी उम्मीद बिल्कुल भी नहीं की जा सकती। तब तो और भी, जब वह वैकल्पिक राजनीति के वादे के साथ मैदान में उतरे थे। केवल कमल हासन ही बता सकते हैं कि इस तरह के गैर-जरूरी और अनुत्पादक विवादों को हवा देकर वह किस तरह का वैकल्पिक शासन प्रस्तुत करना चाहते हैं।
हैरत की बात यह भी है कि शुरुआती दौर में उन्होंने खुद को द्रविड़ राजनीति के खिलाफ बताया था, लेकिन विशुद्ध द्रविड़ पार्टी को ही गठबंधन के लिए चुना। राजनीति में गठबंधन का बदलना आम है, लेकिन अगर किसी की निष्ठा पर सवाल उठता है, तो इसे ठीक नहीं कहा जा सकता। कमल हासन का एक तर्कसंगत अभिनेता और विचारशील राजनेता से आम नागरिकों की भावनाएं भड़काने वाला एक आम राजनेता में बदल जाना, कुछ ऐसा है, जो शायद उनके धुर प्रशंसकों को भी पसंद नहीं आएगा।