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कल्याणदेव जी की अनूठी प्रेरणा

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पौराणिक कथाओं में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो हमें शांति-सद्भाव के साथ जीवन बिताने का संदेश देते हैं। उसमें बताया जाता है कि जो व्यक्ति मेल-मिलाप से रहता है और एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देता है, वह देश-समाज में ऊंचा स्थान तो पाता ही है, मोक्ष का भी अधिकारी बन जाता है।
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परम विरक्त संत 'पद्मभूषण' स्वामी कल्याणदेव जी महाराज एक उद्योगपति के आमंत्रण पर उनके निवास स्थान पर गए। उद्योगपति ने उनसे भोजन करने की प्रार्थना की। स्वामी जी ने कहा कि मेरा नियम है कि मैं गरीबों के घर से मांगी गई रोटी खाता हूं। मैं धनिकों के पास गरीबों व असहायों की सेवा की प्रेरणा देने जाता हूं, भोजन के लिए नहीं।

उन्होंने आग्रह किया, महाराज, भोजन न सही, दूध या जल ग्रहण करने की कृपा करें। यह सुनकर स्वामी जी बोले, सेठ जी, मुझे पता है कि आपका अपने भाई के साथ संपत्ति का विवाद चल रहा है। मुकदमा भी दायर हो चुका है। आपने हाल ही में अपने खर्च से श्रीराम कथा का आयोजन कराया था। यदि आपको भगवान श्रीराम के प्रति आस्था है, तो राम-भरत के अनूठे भ्रातृ-प्रेम से प्रेरणा लेकर आपको अपने भाई पर दायर मुकदमा खत्म कर देना चाहिए।
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आप इस काम को करें, तो मैं आपके घर का दूध-जल ग्रहण कर लूंगा। और वास्तव में अगले ही दिन दोनों भाइयों के बीच का विवाद समाप्त हो गया।
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