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कालियाचक ममता की राजनीति का नमूना है

Wed, 13 Jan 2016 07:05 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
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पश्चिम बंगाल में मालदा के कालियाचक में हुई हिंसा और आगजनी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कमजोर कामकाज, ध्रुवीकरण की राजनीति और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर लापरवाही का ज्वलंत सुबूत है। यह ठीक है कि कालियाचक में मुस्लिम समूह एक अचर्चित हिंदूवादी नेता कमलेश तिवारी की आपत्तिजनक टिप्पणी के खिलाफ एकजुट हुआ था। खुद कमलेश तिवारी ने वह टिप्पणी सपा नेता आजम खान के उतने ही आपत्तिजनक एक वक्तव्य की प्रतिक्रिया में की थी। हमारा असहिष्णु राजनीतिक वर्ग इतना भी नहीं समझता कि धर्म विशेष के खिलाफ उनकी टिप्पणियों की समाज में कैसी प्रतिक्रिया हो सकती है। लेकिन कानून-व्यवस्था को निशाना बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई न करना तो और भी गंभीर है।
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ममता बनर्जी का कहना सही है कि कालियाचक की हिंसा सांप्रदायिक नहीं थी। मालदा राज्य के उन सीमांत जिलों में है, जहां 2011 की जनगणना के मुताबिक, मुुस्लिम बहुसंख्यक हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा और उससे सटे बिहार के पूर्णिया में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण मुस्लिम आबादी निरंतर बढ़ती गई है। कमलेश तिवारी की टिप्पणी के खिलाफ कालियाचक के अलावा पूर्णिया के बायसी में हुई मुस्लिम लामबंदी को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। कालियाचक पोस्त की खेती, नकली नोटों के केंद्र और आपराधिक गतिविधियों के तौर पर दशकों से कुख्यात है। चूंकि कच्चे पोस्तदाना का इस्तेमाल बंगाल में मसाले के तौर पर होता है, इसलिए भी वहां चोरी-छिपे इसकी खेती होती है। स्थानीय प्रशासन ने कुछ समय पहले ही वहां पोस्त की खेती के खिलाफ अभियान चलाया था। उससे नाराज समाज-विरोधियों ने हिंदूवादी नेता की टिप्पणी को एक मौके की तरह लिया, और भीड़ के साथ पुलिस थाना और बीडीओ ऑफिस में आग लगा दी, ताकि उनके अपराध से जुड़े दस्तावेज राख हो जाएं।

कालियाचक की हिंसा दो और कारणों से बेहद गंभीर है। इतिहास बताता है कि अशांत क्षेत्र होने के बावजूद वहां ऐसी हिंसा कभी नहीं हुई। लेकिन चुनाव का साल होने के बावजूद राज्य के खुफिया तंत्र को ऐसे जमावड़े की यदि कोई पूर्व सूचना नहीं थी, तो यह गंभीर मामला है। दूसरा यह कि कालियाचक में जो समाज विरोधी गिरफ्तार हुए हैं, उनमें बांग्लादेशी भी हैं। अक्तूबर, 2014 में वर्धमान बम विस्फोट में मारे जाने वालों में बांग्लादेशी थे, और तब ढाका ने यह आशंका जताई थी कि बांग्लादेश के अतिवादी तत्वों को पश्चिम बंगाल में शरण मिल रही है। तृणमूल कांग्रेस के एक राज्यसभा सदस्य की नागरिकता और उनके आपराधिक-आतंकवादी अतीत के बारे में जब-तब बात होती रहती है। हिंदू ध्रुवीकरण के जवाब में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम ध्रुवीकरण की पुरानी राजनीति तो जारी है ही; पहले की वाम मोर्चा सरकार भी इसी लाइन पर चलती थी। कोलकाता में राष्ट्रगान सिखाने पर एक मदरसा शिक्षक की कुछ महीने पहले हुई पिटाई और वीरभूम के एक गांव के बहुसंख्यक हिंदुओं को दुर्गापूर्जा न करने देने की घटना इसी के सुबूत हैं। उससे भी खतरनाक यह कि ध्रुवीकरण की इस राजनीति में आंतरिक सुरक्षा की परवाह नहीं की जा रही। राज्य के सीमांत इलाके तेजी से अपराधियों-अलगाववादियों के गढ़ बनते जा रहे हैं।
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