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काफ्का, कॉकरोच और कोलाहल: युवाओं को असहमति जताने का सही तरीका सीखना बाकी है

एस प्रसन्नराजन
Updated Thu, 18 Jun 2026 06:47 AM IST

सार

कॉकरोच आंदोलन काफ्का के किसी उपन्यास की नहीं, बल्कि कोलाहल की वह कहानी है, जिसका संदर्भ युवा ढूंढ ही रहे थे। डिजिटल फ्री-फॉर-ऑल के युग में यह लोकतंत्र की तरफ से उन युवाओं को मिली छूट है, जिन्हें अभी असहमति जताने का सही तरीका सीखना बाकी है।
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कॉकरोच जनता पार्टी - फोटो : ANI


लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच में ऐसा है? विरोध के प्रतीक के रूप में अमर कॉकरोच की कल्पना भारत के कई लोगों को आकर्षित कर सकती है। आखिर कौन ऐसा नहीं बनना चाहेगा, जो किसी फिल्मी नायक की तरह व्यवस्था की गंदगी साफ करने के लिए आगे आ सके, जबकि अधिकांश लोग अपने साफ-सुथरे हाथ गंदे करने से कतराते हैं? एक समय आम आदमी पार्टी (आप) को शहरी मध्यम वर्ग का जो व्यापक समर्थन मिला था, उसके पीछे भी तो कुछ हद तक यही मानसिकता काम कर रही थी। आमतौर पर माना जाता है कि व्यंग्य विरोध का एक प्रभावी हथियार होता है। हंसी निश्चित रूप से एक प्रतिक्रिया हो सकती है, और साहित्य तथा राजनीति, दोनों में इसकी समृद्ध परंपरा रही है। परंतु, जब हंसी के पीछे कोई नैतिक आधार न हो और वह तर्क-वितर्क का स्थान लेने लगे, तो वह गंभीर प्रतिरोध नहीं रह जाती, बल्कि केवल एक सतही और गैर-जिम्मेदार गतिविधि बनकर रह जाती है। आखिरकार, कॉकरोच हमेशा अंधेरे कोनों में ही रेंगते हैं।


यहां शायद आज के समय को समझने के लिए एक छोटे-से फुटनोट की जरूरत है, भले ही वह थोड़ा मजाकिया हो। बैरिकेड्स तोड़ने और सड़कों पर विरोध के जोश के रोमांच को महसूस करने के लिए हमें साठ के दशक में वापस जाने की जरूरत नहीं है। हाल के वर्षों में गाजा ने यही भूमिका निभाई है। उसने युवाओं को कक्षाओं की सीमाओं से बाहर निकालकर विरोध के चौराहों तक पहुंचा दिया, और लगातार बमबारी झेल रहे फलस्तीन को आजादी व न्याय की वैश्विक आवाज का प्रतीक बना दिया।


इस्राइल को लेकर दुनिया के बदलते रुख और नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार से दूरी बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति उस नैतिक माहौल का परिणाम है, जिसे उस युवा पीढ़ी ने आकार दिया है, जिसे कभी आलोचकों ने ‘स्नोफ्लेक्स’ कहकर कमजोर और अत्यधिक संवेदनशील बताकर खारिज कर दिया था। यह सच है कि कहीं-कहीं छिपे यहूदी-विरोधी पूर्वाग्रहों ने नैतिक बहस को धुंधला किया है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि युवाओं के इस पीढ़ीगत गुस्से ने दुनिया भर में बहस और विमर्श की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


पीछे मुड़कर देखें, तो मिस्र के तहरीर स्क्वायर और दुनिया के कई अन्य स्थानों पर हुए युवा आंदोलनों की ताकत भीड़ की नैतिक ऊर्जा से ही पैदा हुई थी। और तियानमेन में, नारों का जवाब टैंकों से दिया गया था, और हमें आज भी नहीं पता कि शहादत की ओर बढ़ने वाला वह अकेला व्यक्ति कौन था। लेकिन, केवल भीड़ जुट जाने से कोई आंदोलन सफल नहीं हो जाता। जब चौराहे खाली हुए और जेलें भर गईं, तब अपेक्षित आजादी नहीं आई। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि गुस्से से भरी भीड़ तो थी, लेकिन उसे दिशा देने वाला कोई ऐसा नेतृत्व नहीं था, जो बेहतर कल का वादा कर रहा हो। इसके बावजूद, इन आंदोलनों ने तानाशाही व्यवस्थाओं के भीतर भय पैदा किया और कुछ मामलों में शासकों को अपनी कठोर छवि छोड़कर अधिक मानवीय चेहरा दिखाने के लिए मजबूर भी किया।


जब गैर-राजनीतिक आंदोलनों में नैतिक एकजुटता और भविष्य को लेकर स्पष्टता होती है, तो वे व्यवस्था को चुनौती देने वाली राजनीति में बदल जाते हैं। आजादी और बदलाव की हर बड़ी लड़ाई में कोई न कोई ऐसा चेहरा उभरा है, जो लोगों की नाराजगी को सही ढंग से पेश करता रहा है। गैर-राजनीतिक राजनीति के सबसे प्रेरक उदाहरणों में 1989 की वेलवेट क्रांति प्रमुख है, जहां वाक्लाव हावेल ने केंद्रीय भूमिका निभाई। उस दौर में ‘वी द पीपल’, यानी ‘हम लोग’ का विचार तानाशाही के खिलाफ एक शक्तिशाली जवाब बनकर उभरा। प्राग के ‘मैजिक लैंटर्न’ थिएटर में एक शौकिया व्यक्ति के संकल्प के रूप में शुरू हुआ यह आंदोलन आगे चलकर साम्यवादी शासन के खिलाफ एक सफल जनतांत्रिक तर्क और संघर्ष में बदल गया। यह आंदोलन इसलिए सफल हो सका, क्योंकि विरोध की नैतिकता को आकार देने, गैर-राजनीतिक राजनेता होने का मतलब समझाने और सच्चाई के साथ जीने का अनुभव दिखाने के लिए हावेल जैसा एक नेता मौजूद था। भारत में भी शुरुआत में आम आदमी पार्टी (आप) की कहानी में एक नई राजनीतिक शुरुआत वाली वही गैर-राजनीतिक भावना दिखाई दी थी। लेकिन सत्ता ने उस आदर्श को खत्म कर दिया।


क्या डिजिटल फ्री-फॉर-ऑल के युग में असहमति को कॉकरोच ही मिलते हैं? जब किसी तर्क को खारिज करने के लिए सोशल मीडिया पर एक तीखा हमला ही पर्याप्त हो, और गुमनामी की आड़ में की जाने वाली ट्रोलिंग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को शोर-शराबे में बदल दे, तब डिजिटल दुनिया में असहमति एक नैतिक तमाशा बनकर रह जाती है।
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इसी परिदृश्य में उभरी 'कॉकरोच जनता पार्टी', जिसका नाम भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक चर्चित टिप्पणी से प्रेरित बताया जाता है, एक अपमानजनक उपमा को विरोध के प्रतीक में बदलने की कोशिश करती है। उनका संदेश न तो पूरी तरह स्पष्ट है और न ही हमेशा सुसंगत। उनकी संक्षिप्त मांगें अपने आप इस डिजिटल अभियान को गंभीरता नहीं देतीं। असली मुद्दा यह है कि डिजिटल इको-चैंबर में बिखरी हुई ये आवाजें लोकतंत्र के भीतर अपनी जगह और पहचान कैसे तलाश रही हैं।


उनकी नजर में ऐसा भारत, जहां न्याय की कमी हो, वहां लोकतंत्र केवल एक दिखावा है। और जब किसी वजह को संदर्भ की तलाश होती है, तो देश की ऐसी तस्वीर सामने आना स्वाभाविक है। और अगर संदर्भ मौजूद न हो, तो उसे गढ़ भी लिया जाता है। बिना न्याय वाली जमीन पर 'वी द कॉकरोचेस' (हम तिलचट्टे) कोई जंग का नारा नहीं है। शायद यह लोकतंत्र की तरफ से उन डिजिटल रूप से लैस युवाओं को मिली छूट है, जिन्हें अभी असहमति जताने का सही तरीका सीखना बाकी है।

edit@amarujala.com
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