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सिर्फ आरोप लगाना काफी नहीं

Fri, 09 Nov 2012 09:30 PM IST
नागेंद्र राय से पीयूष पांडेय की बातचीत
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राजनीतिक पार्टियां टीम केजरीवाल के निशाने पर हैं। अब केजरीवाल ने काले धन के बारे में खुलासा कर सरकार को घेरा है। राजनीतिक पार्टियों और उनके सदस्यों पर रोजाना लगाए जा रहे आरोपों पर पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश नागेंद्र राय से पीयूष पांडेय ने बातचीत की।
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:- क्या राजनीतिक पार्टियों और उनके सदस्यों पर लग रहे आरोपों को हवा में छोड़ दिया जाना उचित है?

:- स्वयंसेवी संगठनों और सभ्रांत नागरिकों की ओर से राजनीतिक पार्टियों पर रोजाना आरोप लगाने के बाद उसे अंजाम तक न पहुंचाया जाना घातक है, क्योंकि भ्रष्टाचार के या दूसरे तरह के आरोप लगाने तक सीमित रहने से लोगों का रुझान इस ओर से हट जाएगा। जनता रोज आंदोलित नहीं होती, यदि उसे कोई परिणाम नहीं देखने को मिलेगा। इसलिए भ्रष्ट राजनेताओं और उनके संबंधियों के खिलाफ आरोप लगाने वालों के लिए जरूरी यह है कि वे सक्षम प्राधिकरण में शिकायत करें, जब वह न सुने, तो अदालत का दरवाजा खटखटाएं।

:- राजनेताओं का कहना है कि कुछ लोग महज अपने फायदे के लिए राजनीतिक पार्टियों पर आरोप लगा रहे हैं।

:- देखिए, राजनेता अपने बचाव में क्या-क्या नहीं कहते। मौजूदा दौर में राजनीति गर्त में पहुंच गई है, जहां आरोप-प्रत्यारोप में भी भाषा का पतन हुआ है। जहां तक कुछ लोगों का सवाल है जब एक पार्टी पर आरोप लगे, तो कई पार्टियों ने उसका समर्थन किया। लेकिन जब उन पर आरोप लगे, तो उन्हें आरोप लगाने के तरीके पर आपत्ति होने लगी। हालांकि आरोप लगाने वाला यदि राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखता है, तो आरोपों के पीछे उसका निजी स्वार्थ भी हो सकता है, क्योंकि वह भी राजनीति की दौड़ में दूसरे को पछाड़ना चाहता है।
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:- अदालतें नीतिगत मामले में हस्तक्षेप से इनकार करती रही हैं, ऐसे में संभ्रात नागरिक अपने आरोपों को लेकर कहां जाए?

:- सुप्रीम कोर्ट या फिर हाई कोर्ट नीतिगत मामले में तभी हस्तक्षेप करती हैं, जब सांविधानिक नियमों का उल्लंघन हुआ हो या अनियमितता या छल हुआ हो या वह नीति जनहित में न हो या फिर भ्रष्टाचार के लिए नीति का सहारा लिया गया हो। 2 जी स्पेक्ट्रम का मामला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने 122 कंपनियों के लाइसेंस रद्द कर दिए। लेकिन यदि किसी मामले में अदालत को खामी नहीं लगती,तो उसमें वह नीति के खिलाफ कोई आदेश क्यों जारी करेगा?

:- भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में माहौल बना हुआ है, क्या अदालतें ऐसे में आरोप लगाने वालों के साक्ष्यों पर स्वतः संज्ञान लेकर सरकार को जांच कराने का आदेश नहीं दे सकतीं?

:- अदालतें जनहित के मामलों पर स्वतः संज्ञान लेती हैं। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल में अभी तक आरोप लगाकर चुप बैठने वाले लोग ही सामने आए हैं। न कोई अदालत गया है, न ही अदालत को भ्रष्टाचार के साक्ष्य किसी ने भेजे हैं। मौखिक तौर पर लगने वाले हर आरोप पर अदालत विचार नहीं कर सकती। यह जिम्मेदारी आरोप लगाने वाले की है कि वह दूसरों पर लगाए गए आरोपों को सिद्ध करे।

:- क्या ऐसे में चुनाव लड़ने के मानदंड और सख्त किए जाने की जरूरत नहीं है?

:- चुनाव लड़ने के मानदंड आजादी के बाद से लगातार सुधार की ओर हैं। हमेशा वक्त के हिसाब से कानून, नियमों और प्रावधानों में संशोधन की जरूरत होती है। लेकिन भ्रष्टाचार सिर्फ राजनीति में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में है। भ्रष्टाचार और अपराध में इतना फर्क है कि अपराध सीमित लोगों के खिलाफ होता है, जबकि भ्रष्टाचार पूरे समाज को गंदा करता है। यह गंदगी दूर करने के लिए देश के हर नागरिक को आगे आना होगा।
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