कोरोना महामारी के खिलाफ जंग के लिए केंद्र सरकार ने जब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की, तो मई, 2020 में भुखमरी के कगार पर खड़े लाखों मजदूर पैदल ही हजारों किलोमीटर दूर अपने-अपने गांवों की तरफ लौट पड़े। इसने सरकार को प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए प्रतिदिन 400 ट्रेनों की व्यवस्था करने को मजबूर किया।
प्रत्येक ट्रेन के लिए विशिष्ट मार्ग तैयार किया गया। ये स्पेशल श्रमिक ट्रेनें पश्चिमी और दक्षिणी भारत से पूर्वी भारत के लिए चलती थीं और निर्धारित समय से देर से पहुंचती थीं, जिसके चलते मीडिया में इन 'खोई हुई ट्रेनों' से संबंधित रिपोर्टें छपीं।
हालांकि रेल अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि ये गाड़ियां खोई हुई नहीं हैं, बल्कि मध्य भारत के एक अल्पज्ञात शहर मानिकपुर में भीड़भाड़ के कारण या तो उन्हें रोककर रखा गया या उनका रूट दोबारा निर्धारित किया गया। मानिकपुर रेलवे जंक्शन बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले में स्थित है।
प्रयागराज से सौ किलोमीटर पश्चिम में स्थित मानिकपुर अपनी 16,000 की आबादी के कारण भारतीय रेल के लिए कोई खास महत्व नहीं रखता, इस स्टेशन पर दर्जन भर एक्सप्रेस ट्रेनों के ठहराव की तो बात ही छोड़ दें। मानिकपुर इस व्यवस्थागत संकट में क्यों अड़चन बन गया, इसे भारतीय विकास के भूगोल के ऐतिहासिक झुकाव से समझा जा सकता है, जिसने संकट को और बढ़ाया।
यह स्टेशन औपनिवेशिक युग के इंडियन मिडलैंड कंपनी द्वारा निर्धारित मार्ग पर स्थित इकलौता मुख्य रेलमार्ग है, जो उत्तरी भारतीय मैदानों को उत्तरी और दक्षिणी पठारों से अलग करता है। मानिकपुर की दो 'अप' और 'डाउन' लाइनें भारत के पश्चिमी और दक्षिणी इलाके के प्रयागराज और इससे आगे गंगा के मैदानी इलाके से बंगाल डेल्टा की तरफ जाने का एकमात्र प्रवेश द्वार हैं, जहां जनसंख्या का घनत्व दुनिया में सर्वाधिक है।
फिर भी घनी आबादी वाले गंगा के निचले मैदानी इलाके में शहरीकरण की दर न्यूनतम है और यह अन्य इलाकों की तुलना में पिछड़ा है, जो अपने प्राकृतिक संसाधनों से धन सृजन में सक्षम नहीं माना जाता। जनसंख्या घनत्व और शहरीकरण के बीच यह विरोधाभास तब और गहरा जाता है, जब हम बाजार गठन के अन्य प्रेरक बिंदुओं पर विचार करते हैं, जो यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जैसे कि औपनिवेशिक युग के प्रारंभिक रेलवे नेटवर्क के साथ एक प्रमुख नदी गलियारा, भारी वर्षा, और उपजाऊ मिट्टी। उच्च जनसंख्या घनत्व और अविकास निचली गंगा के मैदानी इलाकों से देश के अन्य हिस्सों में श्रमिकों के पलायन का प्रमुख कारण है।
इसके अलावा इस पहेली का एक हिस्सा वे क्षेत्र हैं, जहां प्रवासी मजदूर काम की तलाश में जाते हैं। शहरीकरण के प्रमुख केंद्र देश के अपेक्षाकृत सूखे इलाकों में स्थित हैं। यानी गंगा के पूर्वी मैदानी इलाके के लोग उत्तर, दक्षिण और पश्चिम में काम करने आते हैं, जो वस्तुतः उन्हीं के श्रम से अस्तित्व में आए हैं। वास्तव में कोई भी गंगा के मैदानी इलाकों में ही इस आर्थिक असमानता को देख सकता है।
मसलन, गंगा के निचले मैदानी इलाके का आर्थिक भूगोल प्रयागराज के ऊपरी क्षेत्र से बिल्कुल अलग है-गंगा और यमुना के बीच के दोआब से उत्तरी पंजाब की तरफ जनसंख्या का घनत्व अपेक्षाकृत कम है, जो भारतीय कृषि के बोलचाल में ‘नहर जिलों’ के रूप में जाने जाते हैं। शहरीकरण के इन असमान भूगोलों को औपनिवेशिक युग के नहर सिंचाई नेटवर्क से जोड़कर देखा जा सकता है।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक प्रशासकों ने ऊपरी गंगा के मैदान में नहरों का जाल बिछाया। अर्ध सिंचित और आंशिक रूप से खेती किए जाने वाले गंगा के दोआब और पंजाब इन नई नहरों के सबसे बड़े लाभार्थी बने।
इससे लाभान्वित मध्यवर्गीय किसान समूहों द्वारा राज्य के संसाधनों पर कब्जा किए जाने के कारण गंगा के ऊपरी मैदानी इलाकों का रूपांतरण हो गया और आज वे देश के ज्यादा शहरीकृत इलाके हैं। तटवर्ती क्षेत्र में भरोसमंद वर्षा के चलते निचले गंगा के मैदानी इलाकों की औपनिवेशिक काल के राज्यों द्वारा भारी उपेक्षा की गई। यह पैटर्न भारत की आजादी के बाद तेजी से बढ़ा और हरित क्रांति के दौरान भी दोहराया गया।
जैसा कि हमारे शोध से पता चलता है, कृषिविदों और अर्थशास्त्रियों को गहन कृषि विकास कार्यक्रम के लिए जिलों के चयन का काम सौंपा गया, जिन्होंने अपने औपनिवेशिक पूर्ववर्तियों की आपूर्ति केंद्रित सोच को फिर दोहराया, जिसका उद्देश्य कृषि समस्या का समाधान करने के बजाय किसी तरह कृषि उत्पादन बढ़ाना था।
उत्तरी भारत के 'पानी की सुनिश्चित आपूर्ति’ वाले क्षेत्र फोर्ड फाउंडेशन की ‘पैकेज योजना’ के पहले लाभार्थी बने। एक बार जब इन उपायों से भारत के खाद्य आपूर्ति संकट का समाधान निकाल लिया गया, तो भारतीय राज्य अन्य कृषि क्षेत्रों में सार्थक हस्तक्षेप करने से दूर हट गए। महंगाई और कीमतों के परिदृश्य में इन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए मध्य किसान समूहों ने 1980 के दशक के बाद से राष्ट्रीय चुनावी मंच पर धमाका करना शुरू किया। इन कृषि समूहों ने राजनीति के अखाड़े और राज्य के संसाधनों पर कब्जा कर लिया।
हमारे शोध से पता चलता है कि जो क्षेत्र औपनिवेशिक युग की नहर सिंचाई के प्रमुख लाभार्थी थे, वही दोबारा संपन्न हरित क्रांति क्षेत्र बन गए, और वही अब रियल एस्टेट के स्थल बन गए हैं। लॉकडाउन ने इस भौगोलिक असमानता को ही दर्शाया है।
जिन राज्यों में ज्यादा शहरीकृत क्षेत्र हैं, वहां की सरकारों पर रियल एस्टेट क्षेत्र का भारी दबाव था कि वे श्रमिकों को अपने गांव जाने से रोकें, ताकि लॉकडाउन खत्म होने पर तुरंत उत्पादन शुरू किया जा सके। और तभी अचानक मानिकपुर ने इन दो भूगोलों के बीच, जिन्होंने अब असमानता के भूगोल के रूप में एक दूसरे को आच्छादित कर लिया है, एक अनिवार्य कड़ी के तौर पर खुद को प्रकट किया। (साई बालकृष्णन हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ डिजाइन में अर्बन प्लानिंग विभाग में एसिस्टेंट प्रोफेसर हैं तथा अरिंदम दत्ता एमआईटी में आर्किटेक्चुअल हिस्ट्री के प्रोफेसर हैं।)