नरेंद्र दामोदर दास मोदी के बारे में माना जाता है कि उन्होंने काफी कठोर जीवन जिया है और वर्षों तक जमीनी स्तर पर काम किया है। पर 1.3 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रधानमंत्री के रूप में वह बड़े सपने देखते हैं, बड़ी बातें सोचते हैं और बड़े काम करते हैं!
कभी-कभी हैरानी होती है कि एक सामान्य-सी घटना को बड़े आयोजन में बदलने और बड़े मंच पर एक रॉक स्टार के रूप में उभरने की कला उन्होंने कहां से सीखी! सितंबर, 2014 में ग्लोबल सिटिजन फेस्टिवल में न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में एच जैकमैन के साथ मंच पर उनकी मौजूदगी याद है, जिसमें उन्होंने स्वच्छ भारत की बात कही थी! ह्यूस्टन के एमआरजी स्टेडियम में हाउडी मोदी कार्यक्रम में एक साथ 50,000 से ज्यादा की मोदी के उत्साही प्रवासियों भारतीयों की प्रचंड भीड़ जुटी, जो किसी भी निर्वाचित विश्व नेता की सबसे बड़ी सभा थी। लगता है, 'मोदी है तो मुमकिन है' विदेशी धरती पर भी काम कर रहा है। यह समृद्ध, प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से तेजी से सक्रिय भारतीय अमेरिकी समुदाय में मोदी की अचूक लोकप्रियता और चुंबकीय अपील है, जिसने डोनाल्ड ट्रंप को मोदी के साथ मंच साझा करने के लिए प्रेरित किया।
हाउडी मोदी कार्यक्रम ने शोर, संगीत, नृत्य और भाषणों के साथ एक विशाल रॉक कॉन्सर्ट के सभी सम्मोहक तत्वों के कारण आकर्षित किया-(1) छह साल से भी कम समय में ब्रांड मोदी को मान्यता मिली और प्रवासी भारतीयों के बीच उनकी लोकप्रियता अजेय और अपार है। (2) प्रमुख विश्व शक्ति के रूप में भारत की सार्थकता को पहचान मिली, लिहाजा भारत के बारे में मीडिया में दिखाई जाने वाली तमाम नकारात्मकता के बावजूद अमेरिका उसके साथ रिश्ते मजबूत करेगा। (3) अमेरिका की घरेलू चुनावी राजनीति में भारतीय- अमेरिकी समुदाय की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत को मान्यता। (4) मोदी के साथ ट्रंप की मौजूदगी के बाद अनेक दर्शकों द्वारा अगले साल होने वाले चुनाव में ट्रंप को वोट देने की संभावना। (5) भारतीय अमेरिकी समुदाय को उम्मीद है कि मोदी के साथ ट्रंप की निकटता की वजह से उनके साथ गलत व्यवहार नहीं किया जाएगा। ट्रंप के साथ मोदी की राजनीतिक जुगलबंदी वैश्विक नेता के रूप में मोदी के आभामंडल को और मजबूत बनाएगी, जिसका भाजपा आगामी चुनाव में इस्तेमाल करेगी। मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ रिश्ते में जिस अनौपचारिकता, गर्मजोशी, मिलनसारिता और व्यक्तिगत स्तर पर तालमेल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया, जापान के प्रधानमंत्री या फ्रांस और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपतियों के साथ उनके संवाद में वैसी ऊष्मा नहीं हो सकती।
भारतीय प्रधानमंत्री बहुत सारे काम की योजना बनाकर चलते हैं। ह्यूस्टन पहुंचने के कुछ ही घंटे के भीतर उन्होंने ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों के साथ बातचीत की। प्रति वर्ष 50 लाख टन एलएनजी के आयात के लिए पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड द्वारा अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी टेलुरियन इंक के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर ट्रंप के 'व्यापार असंतुलन' वाली खीझ को शांत करने का प्रयास हो सकता है। उन्होंने माना कि भारतीय कंपनियां अब अमेरिका में निवेश कर रही हैं। देखना यह है कि क्या यह आगे एक लघु मुक्त व्यापार समझौते का मार्ग प्रशस्त करेगा, जो अमेरिका से इलेक्ट्रॉनिक्स, स्वास्थ्य उपकरण, चेरी और पोर्क आयात तथा सेब, बादाम और पिस्ता जैसे अमेरिकी वस्तुओं पर भारत द्वारा शुल्क हटाने और भारतीय उत्पादों के लिए जीएसपी की बहाली पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की प्रशंसा की। मोदी ने ट्रंप की मजबूत नेतृत्व क्षमता, अमेरिका को फिर से महान बनाने के संकल्प और आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खड़े रहने, भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने और हमेशा उनके मैत्रीपूर्ण और सुलभ रहने के लिए प्रशंसा की। मोदी ने 'हाउडी मोदी' को दो देशों की महान साझेदारी की धड़कन बताया और पाकिस्तान का नाम लिए बिना उन्होंने उसे आतंकवाद का प्रमुख केंद्र और राज्यनीति के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल करने का संकेत दिया। अनुच्छेद 370 हटाने का जिक्र कर उन्होंने परोक्ष रूप से ट्रंप का समर्थन प्राप्त कर लिया कि यह भारत का आंतरिक मामला है।
कठिन मुद्दों पर बातचीत होना अभी शेष है, पर दो सख्त और चतुर सौदेबाजों को पारस्परिक लाभकारी मुद्दों पर सौदा करने में सक्षम होना चाहिए। अमेरिका द्वारा अतार्किक सीएएटीएसए (प्रतिबंधों के माध्यम से अमेरिकी विरोधियों का मुकाबला) ऐक्ट लागू करना बेहद आपत्तिजनक है, क्योंकि रूस और ईरान पर प्रतिबंध का सीधा असर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है।
अफगानिस्तान को सत्ता और सुरक्षा के शून्य में छोड़कर वहां से बाहर निकलने की ट्रंप की उत्सुकता अफगानिस्तान को तालिबान के सामने थाली में परोसने जैसा है। पाक भागीदारी के साथ वहां तालिबान का सत्ता में आना हिंसा और भारत के खिलाफ आतंकी हमलों को खुला निमंत्रण है। पूंजीवाद की सभी कसौटियों की उपेक्षा कर ट्रंप व्यापार बाधाएं खड़ी कर रहे हैं और भूमंडलीकरण व बहुपक्षवाद का विरोध कर रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वह भारत के साथ नहीं हैं। साझा मूल्यों और साझा आदर्शों के दावे कर्णप्रिय भले लगते हों, पर जब तक ठोस आर्थिक रास्ते नहीं अपनाए जाते, द्विपक्षीय रिश्ते बहुत आगे नहीं जाते। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत सख्त अमेरिकी गिरफ्त में फंसता जा रहा है। दोनों देशों के बीच आर्थिक और सैन्य विषमता को देखते हुए यह भारत के लिए सुविधाजनक नहीं है। वैश्विक मामलों में निर्णय लेने की भारत की स्वायत्तता खत्म हो रही है।
मोदी और ट्रंप के बीच मौजूदा गर्मजोशी का स्वागत है, पर यह कब तक चलेगा? कम से कम नवंबर, 2020 तक? 'अबकी बार ट्रंप सरकार' का मोदी का नारा ट्रंप को संगीत की तरह लगा होगा। अगर वह फिर निर्वाचित होते हैं, तो उसका फायदा होगा। पर उन्हें व्हाइट हाउस से बाहर जाना पड़ा, तो यह खुला समर्थन हमें परेशानी में डाल सकता है।