राजनीति में अपराधीकरण सहित अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर न्यायपालिका के फैसलों पर दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आरएस सोढ़ी से पीयूष पांडेय ने बातचीत की-
- दोषी करार दिए जाने के साथ ही राजनेताओं की सदस्यता खत्म करने का फैसला कितना कारगर होगा?
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला राजनीति में अपराधीकरण पर अंकुश लगाने में अत्यधिक कारगर होगा। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) के अलावा कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें दोषी करार दिए जाने के बावजूद राजनेता की कुर्सी बची रह सके। फैसले में भी अदालत ने साफ किया है कि सीमा से परे जाकर इस कानून को लागू किया गया, जो समानता के अधिकार का भी उल्लंघन था।
- क्या इस फैसले को पलटने के लिए पार्टियां नया कानून ला सकती हैं?
बिल्कुल, ऐसा किया जा सकता है, और इसकी पूरी संभावना है कि सत्ताधारी पक्ष का साथ इस मामले में सभी पार्टियां देंगी, क्योंकि राजनेताओं को संरक्षण प्रदान करने वाले आधारों को शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में सिरे से खारिज कर दिया है। हालांकि पहले सरकार पुनर्विचार की मांग अदालत से जरूर करेगी। इस पर कोई राहत नहीं मिली, तो संसद के पास सर्वोच्च साधन नया कानून बनाने का है। उन्हें कानून बनाने का अधिकार है और अदालत के पास उसकी समीक्षा करने का। यदि कोई नया कानून बना, जिसके प्रावधान संविधान के मुताबिक नहीं हुए, तो उसे समाज का कोई रहनुमा फिर चुनौती देगा।
- क्या जेल से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय निर्दोष लोगों के अधिकार पर अतिक्रमण है?
जेल से चुनाव लड़ने के अधिकार पर प्रतिबंध के अच्छे और बुरे, दोनों ही पहलू हैं। आज के दौर में अपराधियों का जेल में रहते हुए राजनीति में प्रवेश करना या चुनाव लड़ना आम बात है। लेकिन एक ऐसा भी दौर था, जब आपातकाल के दौरान तमाम लोगों ने इस अधिकार के जरिये नई सरकार खड़ी की थी। फिर भी इस फैसले को मौजूदा दौर के समूचे परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए देखा जाए, तो यह सही है।
- नीतिगत और राजनीतिक मामलों में न्यायपालिका का बढ़ता हस्तक्षेप क्या न्यायिक सक्रियता नहीं है?
नहीं। यदि राजनेता अपने हक में कानून बनाएंगे, तो न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह ऐसे मामले में हस्तक्षेप करे। यदि कोई प्राधिकार खुद सुधार का प्रयास करता है तो उस मामले में न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं करती। लेकिन जहां पर कानून संविधान सम्मत नहीं होता या कोई नीति कानून के मुताबिक नहीं होती या उसका उल्लंघन होता है, तो अदालत का हस्तक्षेप करना जायज है।
- क्या जातिगत रैलियों पर रोक लगाने का इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला राजनीतिक स्वतंत्रता पर अंकुश है?
इसके सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पहलू हैं, पर यह फैसला मूल अधिकार को प्रभावित करता है। मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचेगा, जहां अंतिम फैसला आएगा। हाई कोर्ट की ओर से लगाई गई रोक नागरिकों को संविधान की ओर से दिए गए अधिकार पर सीधा प्रभाव डालती है। यदि कोई जाति, समुदाय किसी मुद्दे पर रैली निकालना चाहे, तो उसे रोका नहीं जा सकता।
- चुनावी घोषणापत्र पर निर्वाचन आयोग को दिया गया सुप्रीम कोर्ट का निर्देश क्या राजनीतिक हथकंडों पर रोक लगा सकेगा?
देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर आयोग की ओर से क्या कदम उठाया जाता है। लैपटॉप या अन्य कोई चीज बांटने का चुनावी घोषणापत्र में वायदा किया जाना सीधे तौर पर जनता को रिश्वत देने जैसा है। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे, यदि आयोग की ओर से इस पर सही कदम उठाया जाए।