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एक यात्रा प्रकृति के नाम: नेपाल में सात राज्यों के सफर की पहल; विनोबा भावे और गांधी जयंती से क्या कनेक्शन?

डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
Updated Thu, 01 Oct 2026 05:46 AM IST

सार

कल गांधीजी की जयंती है। उन्होंने और विनोबा भावे ने कई यात्राएं लोगों को जोड़ने के लिए कीं। इसी तर्ज पर दो अक्तूबर से हाल ही में पर्यावरणीय त्रासदी झेल चुके नेपाल से सात राज्यों की यात्रा शुरू हो रही है, ताकि लोगों को प्रकृति से जुड़ने के लिए प्रेरित किया जा सके।
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देश-दुनिया में यात्राएं परंपराओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा रही हैं। ऋषि-मुनियों ने इन्हें हमेशा यज्ञ के रूप में माना, ताकि वे जनहित में संदेश देने के साथ-साथ अपने लिए दुनिया की समझ भी जुटाएं। यात्राएं चाहे कोलंबस से जुड़ी हों या वास्को डि गामा से या फिर चीन के यात्रियों का विश्व भ्रमण हो, ये शुरुआती शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं और नई दुनिया की खोजें भी इनसे ही जुड़ी रही हैं। ये यात्राएं दुनिया को जानने और बदलती परिस्थितियों को समझने का माध्यम भी होती हैं। इनसे जिज्ञासा और सौहार्द को जमीनी बल मिलता है।

विनोबा भावे और महात्मा गांधी ने बहुत-सी यात्राएं लोगों को जोड़ने के लिए की थीं। यह भी विदित है कि इन यात्राओं के जरिये उन्होंने समाज की बेहतरी का संदेश दिया और लोगों को सही दिशा भी दिखाई। इसी क्रम में हमने और हमारे साथियों ने मिलकर देश की कई यात्राएं कीं। 2008 में एक बड़ी यात्रा कन्याकुमारी से कश्मीर तक, दूसरी यात्रा सिलीगुड़ी से उत्तराखंड तक और तीसरी मुंबई से उत्तराखंड तक। इसी तर्ज पर वर्तमान में एक और महत्वपूर्ण यात्रा प्रस्तावित है, जिसका मूल उद्देश्य प्रकृति और प्रभु को जोड़कर देखने की आवश्यकता पर केंद्रित है।



लोग प्रभु को तो मानते हैं, लेकिन इसे प्रकृति से नहीं जोड़ते। यह यात्रा नेपाल के जनकपुर से शुरू होकर सात राज्यों से होते हुए सैकड़ों गांवों और हजारों लोगों से संपर्क-संबंध बनाकर चलेगी। यात्रा का उद्देश्य प्रकृति के व्यवहार को समझना और बदलती पारिस्थितिकी के कारणों पर चर्चा करना है। यात्रा का शुभारंभ कल, यानी दो अक्तूबर को जनकपुर, नेपाल से होगा, क्योंकि नेपाल एक ऐसी आपदा का हिस्सा बना, जिसे भारत ने भी झेला है।

अब पारिस्थितिकी व प्रकृति के मुद्दे किसी एक स्थान विशेष के या देश के नहीं, बल्कि सारी दुनिया का विषय बन चुके हैं। हमारी पुरानी सभी यात्राओं के पीछे भी हमेशा यही उद्देश्य रहे। 2008 में कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा किसानों, मिट्टी, पानी और वनों से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित थी। एक यात्रा 2013 में सिलीगुड़ी से शुरू हुई थी, जो गांवों और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को समर्पित थी। 2022 की यात्रा मुंबई से शुरू हुई थी, जो प्रगति और प्रकृति को साथ लेकर चलने से जुड़ी थी।

वर्तमान प्रस्तावित यात्रा देश-दुनिया को एक संदेश देने को समर्पित है और यह समझने के लिए भी कि पारिस्थितिकी और प्रभु या प्रकृति तथा प्रभु में कोई अंतर नहीं है। सभी धर्मों में प्रकृति का स्थान है, लेकिन इन सभी धर्मों ने उस हिस्से को ज्यादा अपनाया, जो मनुष्यों के हित में था। प्रकृति के उपकारों को हमने कभी भी उसके वास्तविक रूप में नहीं पहचाना। यात्रा के दौरान हमारी कोशिश वर्तमान बदलती परिस्थितियों के बारे में जानकारी जुटाने और यह समझाने की होगी कि प्रकृति के बिना कुछ भी संभव नहीं। पहाड़ से मैदान और फिर पहाड़ तक की यह यात्रा उस माला को पिरोने की है, जो प्रकृति ने रची है। यात्रा नेपाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली होते हुए उत्तराखंड पहुंचेगी। यात्रा का पहला और बड़ा उद्देश्य यह है कि बदलती परिस्थितियों के प्रति जनमानस को जोड़ना, सचेत करना और उसमें अपने ही दोषों को ढूंढना। प्रकृति के प्रति सिर्फ सरकार या वर्ग विशेष का दायित्व नहीं होता। सरकारें तो समाज की बेहतरी के लिए होती हैं। इसलिए, पहला दायित्व समाज का ही होना चाहिए कि वह प्रकृति के प्रबंधन में क्या योगदान दे सकता है।

हम में से कोई भी ऐसा नहीं है, जो किसी न किसी धर्म से न जुड़ा हो, जबकि प्रकृति समान रूप से सभी से जुड़ी है। आखिर ऐसा कौन है, जिसको हवा, मिट्टी, जंगल और पानी नहीं चाहिए? कोई किसी धर्म, जाति या किसी भी आर्थिक स्तर का हो, प्रकृति सभी का समान रूप से उपकार करती है। इन्हीं बातों को समझने-समझाने के लिए यह यात्रा की जा रही है। जिस तरह से हमारे बीच में पारिस्थितिकीय बदलाव हो रहे हैं, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में बड़ी चुनौती आर्थिक नहीं, पर्यावरणीय ही होगी। यात्रा यह बताने के लिए भी है कि हम सभी प्रकृति की संतान हैं। जैसे माता-पिता और गुरु के प्रति हमारे कर्तव्य होते हैं, उसी तरह प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों को भी गंभीरता से निभाना है।
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यह बात भी समझनी होगी कि प्रकृति में आने वाले बदलाव से, इसका कुछ नहीं बिगड़ेगा, बुरा होगा, तो हमारा ही होगा। हमने लंबे समय से जिस जीवनशैली को जिया और हमारे चारों तरफ का सुविधा-संपन्न जीवन जिस तरह से प्रकृति पर निर्भर है, उसे देखते हुए समझा जा सकता है कि अगर इसमें बिगाड़ हुआ, तो सब कुछ खत्म होना तय है। इसलिए, जरूरी है कि हम अपने दायित्वों को समझते हुए प्रभु के ही समान प्रकृति को भी समझें। यह भी मान कर चलें कि सभी धर्मों के ऊपर प्रकृति ही सबसे बड़ा धर्म भी है। यह यात्रा यह समझने के लिए भी है कि हम प्रकृति से पैदा हुए हैं, प्रकृति हमसे नहीं। जब तक यह भाव समझ में नहीं आएगा, तब तक सब कुछ सुधारना मुश्किल होगा। वैसे भी प्रकृति का स्वभाव सदियों से बदलता आया है। अब इसके अधिक तेजी से बदलने से भविष्य में संकट और बढ़ सकता है।

एक समय था, जब हम आर्थिक लड़ाइयों से जूझ रहे थे। आज देश-दुनिया बड़े आर्थिक आयामों को छू चुकी है। ऐसे में, अब दुनिया को प्रकृति के प्रति भी दायित्व निभाना होगा। ठीक उसी तर्ज पर, जिस पर बेहतर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ललक रही है, वैसे ही सकल पर्यावरण उत्पाद जैसे मुद्दे को भी हमें सार्वजनिक तौर पर अपनाना होगा और सरकारों को भी इसमें जोड़ना होगा। ‘प्रकृति को मानें और जानें’-यह महत्वपूर्ण मुद्दा इस पूरी साइकिल यात्रा का होगा। यात्रा के दौरान हजारों लोगों से मिलने के बाद उनकी भावना पर आधारित एक रिपोर्ट  प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को भी दी जाएगी। यह यात्रा करीब 47 पड़ावों से होते हुए मेरठ में समाप्त होगी। यात्रा करीब 52 दिन की होगी और 3,500 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय करेगी। यह यात्रा राज्यों के प्रमुख राजनीतिक दलों, सरकारों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक व वैज्ञानिक संस्थानों इत्यादि, के साथ संवाद करते हुए चलेगी। यह यात्रा सर्वजन सार्वभौमिक और सर्वहित के लिए होगी। अर्थात, सबके लिए, सबके साथ इसकी मूल भावना होगी।

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देश-दुनिया में यात्राएं परंपराओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा रही हैं। ऋषि-मुनियों ने इन्हें हमेशा यज्ञ के रूप में माना, ताकि वे जनहित में संदेश देने के साथ-साथ अपने लिए दुनिया की समझ भी जुटाएं। यात्राएं चाहे कोलंबस से जुड़ी हों या वास्को डि गामा से या फिर चीन के यात्रियों का विश्व भ्रमण हो, ये शुरुआती शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं और नई दुनिया की खोजें भी इनसे ही जुड़ी रही हैं। ये यात्राएं दुनिया को जानने और बदलती परिस्थितियों को समझने का माध्यम भी होती हैं। इनसे जिज्ञासा और सौहार्द को जमीनी बल मिलता है।

विनोबा भावे और महात्मा गांधी ने बहुत-सी यात्राएं लोगों को जोड़ने के लिए की थीं। यह भी विदित है कि इन यात्राओं के जरिये उन्होंने समाज की बेहतरी का संदेश दिया और लोगों को सही दिशा भी दिखाई। इसी क्रम में हमने और हमारे साथियों ने मिलकर देश की कई यात्राएं कीं। 2008 में एक बड़ी यात्रा कन्याकुमारी से कश्मीर तक, दूसरी यात्रा सिलीगुड़ी से उत्तराखंड तक और तीसरी मुंबई से उत्तराखंड तक। इसी तर्ज पर वर्तमान में एक और महत्वपूर्ण यात्रा प्रस्तावित है, जिसका मूल उद्देश्य प्रकृति और प्रभु को जोड़कर देखने की आवश्यकता पर केंद्रित है।

लोग प्रभु को तो मानते हैं, लेकिन इसे प्रकृति से नहीं जोड़ते। यह यात्रा नेपाल के जनकपुर से शुरू होकर सात राज्यों से होते हुए सैकड़ों गांवों और हजारों लोगों से संपर्क-संबंध बनाकर चलेगी। यात्रा का उद्देश्य प्रकृति के व्यवहार को समझना और बदलती पारिस्थितिकी के कारणों पर चर्चा करना है। यात्रा का शुभारंभ कल, यानी दो अक्तूबर को जनकपुर, नेपाल से होगा, क्योंकि नेपाल एक ऐसी आपदा का हिस्सा बना, जिसे भारत ने भी झेला है।

अब पारिस्थितिकी व प्रकृति के मुद्दे किसी एक स्थान विशेष के या देश के नहीं, बल्कि सारी दुनिया का विषय बन चुके हैं। हमारी पुरानी सभी यात्राओं के पीछे भी हमेशा यही उद्देश्य रहे। 2008 में कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा किसानों, मिट्टी, पानी और वनों से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित थी। एक यात्रा 2013 में सिलीगुड़ी से शुरू हुई थी, जो गांवों और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को समर्पित थी। 2022 की यात्रा मुंबई से शुरू हुई थी, जो प्रगति और प्रकृति को साथ लेकर चलने से जुड़ी थी।

वर्तमान प्रस्तावित यात्रा देश-दुनिया को एक संदेश देने को समर्पित है और यह समझने के लिए भी कि पारिस्थितिकी और प्रभु या प्रकृति तथा प्रभु में कोई अंतर नहीं है। सभी धर्मों में प्रकृति का स्थान है, लेकिन इन सभी धर्मों ने उस हिस्से को ज्यादा अपनाया, जो मनुष्यों के हित में था। प्रकृति के उपकारों को हमने कभी भी उसके वास्तविक रूप में नहीं पहचाना। यात्रा के दौरान हमारी कोशिश वर्तमान बदलती परिस्थितियों के बारे में जानकारी जुटाने और यह समझाने की होगी कि प्रकृति के बिना कुछ भी संभव नहीं। पहाड़ से मैदान और फिर पहाड़ तक की यह यात्रा उस माला को पिरोने की है, जो प्रकृति ने रची है। यात्रा नेपाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली होते हुए उत्तराखंड पहुंचेगी। यात्रा का पहला और बड़ा उद्देश्य यह है कि बदलती परिस्थितियों के प्रति जनमानस को जोड़ना, सचेत करना और उसमें अपने ही दोषों को ढूंढना। प्रकृति के प्रति सिर्फ सरकार या वर्ग विशेष का दायित्व नहीं होता। सरकारें तो समाज की बेहतरी के लिए होती हैं। इसलिए, पहला दायित्व समाज का ही होना चाहिए कि वह प्रकृति के प्रबंधन में क्या योगदान दे सकता है।

हम में से कोई भी ऐसा नहीं है, जो किसी न किसी धर्म से न जुड़ा हो, जबकि प्रकृति समान रूप से सभी से जुड़ी है। आखिर ऐसा कौन है, जिसको हवा, मिट्टी, जंगल और पानी नहीं चाहिए? कोई किसी धर्म, जाति या किसी भी आर्थिक स्तर का हो, प्रकृति सभी का समान रूप से उपकार करती है। इन्हीं बातों को समझने-समझाने के लिए यह यात्रा की जा रही है। जिस तरह से हमारे बीच में पारिस्थितिकीय बदलाव हो रहे हैं, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में बड़ी चुनौती आर्थिक नहीं, पर्यावरणीय ही होगी। यात्रा यह बताने के लिए भी है कि हम सभी प्रकृति की संतान हैं। जैसे माता-पिता और गुरु के प्रति हमारे कर्तव्य होते हैं, उसी तरह प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों को भी गंभीरता से निभाना है।

यह बात भी समझनी होगी कि प्रकृति में आने वाले बदलाव से, इसका कुछ नहीं बिगड़ेगा, बुरा होगा, तो हमारा ही होगा। हमने लंबे समय से जिस जीवनशैली को जिया और हमारे चारों तरफ का सुविधा-संपन्न जीवन जिस तरह से प्रकृति पर निर्भर है, उसे देखते हुए समझा जा सकता है कि अगर इसमें बिगाड़ हुआ, तो सब कुछ खत्म होना तय है। इसलिए, जरूरी है कि हम अपने दायित्वों को समझते हुए प्रभु के ही समान प्रकृति को भी समझें। यह भी मान कर चलें कि सभी धर्मों के ऊपर प्रकृति ही सबसे बड़ा धर्म भी है। यह यात्रा यह समझने के लिए भी है कि हम प्रकृति से पैदा हुए हैं, प्रकृति हमसे नहीं। जब तक यह भाव समझ में नहीं आएगा, तब तक सब कुछ सुधारना मुश्किल होगा। वैसे भी प्रकृति का स्वभाव सदियों से बदलता आया है। अब इसके अधिक तेजी से बदलने से भविष्य में संकट और बढ़ सकता है।

एक समय था, जब हम आर्थिक लड़ाइयों से जूझ रहे थे। आज देश-दुनिया बड़े आर्थिक आयामों को छू चुकी है। ऐसे में, अब दुनिया को प्रकृति के प्रति भी दायित्व निभाना होगा। ठीक उसी तर्ज पर, जिस पर बेहतर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ललक रही है, वैसे ही सकल पर्यावरण उत्पाद जैसे मुद्दे को भी हमें सार्वजनिक तौर पर अपनाना होगा और सरकारों को भी इसमें जोड़ना होगा। ‘प्रकृति को मानें और जानें’-यह महत्वपूर्ण मुद्दा इस पूरी साइकिल यात्रा का होगा। यात्रा के दौरान हजारों लोगों से मिलने के बाद उनकी भावना पर आधारित एक रिपोर्ट  प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को भी दी जाएगी। यह यात्रा करीब 47 पड़ावों से होते हुए मेरठ में समाप्त होगी। यात्रा करीब 52 दिन की होगी और 3,500 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय करेगी। यह यात्रा राज्यों के प्रमुख राजनीतिक दलों, सरकारों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक व वैज्ञानिक संस्थानों इत्यादि, के साथ संवाद करते हुए चलेगी। यह यात्रा सर्वजन सार्वभौमिक और सर्वहित के लिए होगी। अर्थात, सबके लिए, सबके साथ इसकी मूल भावना होगी।
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