इन दिनों जिस तरह की बहस की जा रही है, उससे ऐसा लगता है कि देश में मुद्दों का अभाव हो गया है। जिधर देखो, इधर-उधर की बातें हो रही हैं। आम आदमी परेशान है कि इन बातों से उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का क्या ताल्लुक? इनसे किसे लाभ हो रहा है? जो लोग ऐसी बातें कर रहे हैं, क्या उन्हें आम आदमी की जमीनी स्थिति पता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि असली जनमुद्दों से ध्यान हटाने के लिए पूरे विमर्श को गंदी राजनीति की ओर मोड़ा जा रहा है? सिर्फ नेता ही नहीं, मीडिया और विशेषज्ञ भी अनावश्यक बहसों में उलझे हुए हैं।
गरीब आदमी का खाना पांच रुपये में होता है, 12 रुपये में या 20 रुपये में। जब देश के अर्थशास्त्रियों ने अपने अध्ययनों से बार-बार यह सिद्ध कर दिया है कि देश की बड़ी आबादी की रोजाना कमाई औसतन 20 रुपये प्रति व्यक्ति से ज्यादा नहीं है, तो सोचने वाली बात यह है कि ऐसा व्यक्ति एक बार में कितना रुपया भोजन पर खर्च करने की हालत में होगा। जो लोग दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के बाजारों में जाकर खाने की थाली के दाम पूछकर इन बयानों का मजाक उड़ा रहे हैं, लगता है उन्होंने देहाती इलाकों में जाकर असली आम आदमी की हालत का जायजा ही नहीं लिया। अगर लिया होता, तो वे समझ पाते कि देश का गरीब आदमी एक वक्त में पांच-सात रुपये से ज्यादा अपने भोजन पर खर्च ही नहीं कर पाता।
इसी तरह यह देखकर सिर धुनने को मन करता है कि चुनाव का कोई अता-पता नहीं, पर चुनावी परिणामों पर बहसें चालू हो चुकी हैं। अभी राजनीतिक दलों ने न तो घोषणा पत्र जारी किए हैं, न ही उम्मीदवारों का ठिकाना है। आम जनता रोजमर्रा की जद्दोजहद में है, उसे चुनाव के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है। ऐसे में बहसें की जा रही हैं कि सरकार किसकी बनेगी। ऐसे विषयों का चुनाव करने वालों को तो छोड़ें, पर विशेषज्ञों को क्या हो गया है, जो इन मुद्दों पर अपनी टिप्पणियां दर्ज करा रहे हैं? यह ठीक वैसा ही है कि सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा।
लगे हाथ अब बटला हाउस कांड को भी परख लें। जब सब कुछ तय हो चुका था और केवल अदालत का फैसला आना बाकी था, तो फिर इस कांड की शुरू से आखिर तक की कहानी दोहराने से क्या मकसद हासिल हो रहा था। एक-दो बार नहीं, बल्कि बीसियों बार, जबकि अदालत का फैसला वही आया, जैसा पुलिस के रिकॉर्ड में तथ्य दर्ज किए गए थे। अगर चर्चा ही करनी थी, तो इस कांड के आरोपियों को मिलने वाली सजा और उसके कानूनी पेचों पर चर्चा की जा सकती थी, जैसी पिछले दिनों कसाब और अफजल गुरू की फांसी के दौरान चर्चाएं की गईं। उससे इस तरह के अपराधों के कानूनी, सामाजिक और नैतिक पक्ष को समझने में दर्शकों और पाठकों को मदद मिलती।
पिछले दिनों बिहार में ‘मिड-डे मील’ में 23 बच्चों की मौत बड़ा मुद्दा बना। बनना भी चाहिए था, आखिर गरीब के बच्चे जहरीला खाना खाने के लिए तो स्कूल भेजे नहीं जाते। मगर बात बिहार तक सीमित नहीं है। जब हमारा संवाददाता कैमरा या कलम लेकर देश के अलग-अलग प्रांतों में मिड-डे मील कार्यक्रम की पड़ताल करने निकलता है, तो वह पाता है कि कमोबेश यही हाल हर प्रांत के मिड-डे मील का है। यानी अकेले बिहार को कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। जैसे ही इस बात का अंदाजा लगा, यह गंभीर मुद्दा बहसों से गायब हो गया। क्यों? क्या इस मुद्दे पर बाकी प्रदेशों में गहरी पड़ताल कर शोर मचाने की जरूरत नहीं है?
बीच-बीच में कुछ मुद्दे बाढ़, भू-स्खलन व जमीन धंसने जैसी प्राकृतिक आपदाओं के आते ही रहते हैं। उत्तराखंड की विपदा सामान्य आपदा से कहीं अधिक प्रलंयकारी घटना थी। इसलिए मीडिया को सक्रिय भी होना पड़ा और महीने भर तक उसका कवरेज भी करना पड़ा, क्योंकि इस प्रलय से देश के हर हिस्से का परिवार जुड़ा था और विजुअल्स की दृष्टि से यह दिल दहलाने वाला कवरेज था। जब यह मुद्दा उठा, तो जाहिर है कि आपदा प्रबंधन, प्रशासनिक अकुशलता व विनाशोन्मुख विकास के मॉडल पर चर्चा की जाती। देश में इस प्रबंधन-हीनता के खिलाफ एक माहौल बनता और देशभर में दबाव समूह सक्रिय होते, तो बदलाव की दिशा भी दिखने लगती। लगता है, नए-नए मुद्दे तलाशने की हुलहुलाहट में हमने एक बड़ा मौका खो दिया।