हालांकि, एआई शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का यह कहना वैश्विक परिदृश्य में भारत के बढ़ते कद को ही दर्शाता है कि भारत प्रतिभा का भंडार है और इसकी इंजीनियरिंग क्षमताएं इस गठबंधन को मजबूत ही बनाएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि पैक्स सिलिका में भारत का प्रवेश महज प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक और आवश्यक भी है। नहीं भूलना चाहिए कि दुर्लभ खनिजों के वैश्विक उत्पादन में 90 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला चीन पिछले कुछ वर्षों में एआई और सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला के मामले में एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है, जिसे अमेरिका अपने लिए एक बड़ी चुनौती मान रहा है।
गौरतलब है कि आज ये दुर्लभ खनिज कंप्यूटर चिप से लेकर कार व मिसाइल बनाने तक काम आते हैं और यही वजह है कि इस मामले में चीन पर निर्भरता को भारत समेत कई देश अपनी सामरिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंता का विषय मान रहे हैं। खासकर, भारत के लिए यह भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे देश के तकनीकी और आर्थिक भविष्य से जुड़ी कुछ सबसे बड़ी चुनौतियों व अवसरों का सीधा समाधान हो सकेगा।
उल्लेखनीय है कि भारत ने चिप डिजाइन, निर्माण तथा एआई शोध को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वाकांक्षी मिशन शुरू किए हैं और इससे जुड़ी परियोजनाओं के लिए काफी निवेश भी आकर्षित किया है। एक अंतरराष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा होने से भारत को अधिक निवेश, तकनीक सहयोग और संयुक्त अनुसंधान साझेदारी को आकर्षित करने में तो मदद मिलेगी ही, उसके तकनीक बुनियादी ढांचे में पूंजी लगाने पर विचार कर रही वैश्विक कंपनियों का भी भरोसा बढ़ेगा।
कुल मिलाकर, यह भारत को अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय साझेदारों जैसी प्रमुख तकनीक शक्तियों से घनिष्ठता से जोड़ेगा। लिहाजा, यह कदम वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को दर्शाता है। देखने वाली बात होगी कि चीन इस पर क्या रुख अपनाता है, जिसके साथ भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। हालांकि, ट्रंप जिस तेजी से अपनी योजनाएं बदलते रहते हैं, उसे देखते हुए पैक्स सिलिका की कामयाबी उनके रुख के साथ इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इसके साझेदार केवल बातचीत पर निर्भर न रहकर एक ठोस व सुरक्षित तकनीकी नेटवर्क के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।