अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के यूनियन हॉल में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर 1938 से भले लगी हो, लेकिन जब यह मुद्दा उठाया गया, तो बारूद के ढेर पर चिंगारी बन गया। जिन्ना की फोटो वह भी एएमयू में! जिन्ना की शख्सियत इतनी विभाजक है कि ज्यादातर लोग भिन्न विचार सुनना ही नहीं चाहते।
लिखत-पढ़त में जिन्ना को सेक्युलर बताने पर भाजपा के शिखर नेता लालकृष्ण आडवाणी तक को कीमत चुकानी पड़ी थी। जसवंत सिंह सिंह संघ परिवार में अछूत हो गए थे। और अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरुष घोषित किया, तो उनके इस्तीफे की मांग हो गई है।
इतिहास की विडंबना देखिए, एएमयू, उसके संस्थापक सर सैयद अहमद खान और जिन्ना- ये तीनों विवादास्पद रहे हैं, मगर उनकी सार्वजनिक और सर्व स्वीकृत छवि के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है। दरअसल मानव विकास यात्रा की प्रक्रिया का एक अनिवार्य पहलू यह है कि व्यक्ति हो या संस्था, उसके वर्चस्ववादी रूप को ही देखा जाता है, क्योंकि समाज को प्रभावित करने वाली घटनाएं उसी से जुड़ी होती हैं।
एएमयू और उसके पूर्ववर्ती, मोहम्मडन एंग्लो-ओरियंटल कॉलेज की स्थापना में हिंदुओं का भी योगदान था। आजादी की लड़ाई के दौरान कैंपस में कमजोर ही सही, लेकिन एक धारा कांग्रेस से निकलती थी। अलगाववादी नारों के साथ जोश मलिहाबादी और मजाज की शायरी के लिए भी गुंजाइश रहती थी। लेकिन सभी सच्चाइयों पर भारी यह सच्चाई है कि लियाकत अली खान ने 1945-46 के चुनाव में मुस्लिम लीग की सफलता का श्रेय एएमयू को दिया था और उसके बाद जिन्ना ने अलीगढ़ को 'मुस्लिम भारत के अस्त्रागार' के रूप में तसलीम किया था।
शुरुआती दौर में सर सैयद हिंदू-मुस्लिम एकता के इस हद तक हिमायती थे कि लिखा, 'ये भारत की दो आंखें हैं। एक को चोट पहुंचाओ तो दूसरी को भी लगेगी। हमें दिल और आत्मा से एकजुट होना चाहिए। ऐसा न होने पर दोनों का पतन और विनाश होगा।' स्वशासन की ज्योति जलने के साथ फारसी का हटना तय था। बहुसंख्यक वर्ग हिंदी की मांग करने लगा। उन्नीसवीं सदी के तीसरे चरण में सर सैयद के विचार भी बदलने लगे। चौधरी रहमत अली और जिन्ना से पहले उनके दिल में दो राष्ट्रों के सिद्धांत ने जन्म ले लिया।
12 जनवरी 1883 को उन्होंने वायसरॉय की विधायी परिषद में एलान किया कि भारत के मुसलमान प्रतिनिधि संस्थाओं को मंजूर नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा कि भारत विभिन्न राष्ट्रीयताओं की एक विशाल भूमि है। यह कोई मुल्क नहीं, बल्कि महाद्वीप है। उन्होंने जिन्ना से बहुत पहले कांग्रेस को चुनौती दी कि वह मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा नहीं कर सकती।
शुरू में जिन्ना प्रखर कांग्रेसी थे, सरोजिनी नायडू ने उन्हें हिंदू-मुसलिम एकता का दूत बताया था, वह राजनीति में धर्म के प्रवेश के विरोधी थे, अंगड़ाई ले रहे हिंदू समाज के पुरोधा लोकमान्य तिलक के वकील और मित्र थे- ये सब कौन याद रख पाता है।
ये सारी बातें पहले की हैं। भारत की अधिसंख्य जनता के स्मृतिपटल पर तो यह अमिट इबारत है कि कोलकाता का कुख्यात डायरेक्ट एक्शन उनकी इस घोषणा के साथ हुआ था, 'हमने भी पिस्टल ढाल ली है', कि दो अलग कौम होने के कारण हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। मनकी के पीर को लिखी गई उनकी चिट्ठी के ये हरूफ भी हमेशा अमिट रहेंगे कि पाकिस्तान मुकम्मिल तौर पर शरीयत को लागू करेगा।
15 अगस्त, 1947 से पहले से ही कांग्रेस का नेतृत्व इतिहास के इन ज्वलनशील मुद्दों से जद्दोजहद कर रह था। इसीलिए डॉ जाकिर हुसैन को एएमयू का कुलपति बना कर भेजा गया था। इसीलिए आजादी के करीब पांच महीने बाद जवाहरलाल नेहरू एएमयू के दीक्षांत समारोह को संबोधित करने पहुंचे। नेहरू ने ऐतिहासिक संबोधन में विनाशकारी अलगाववाद से दो टूक रूबरू होते हुए छात्रों से सवाल किया, 'मुझे अपनी विरासत और पुरखों पर नाज है, जिन्होंने भारत को बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रमुखता दी।
क्या आप इस अतीत को महसूस करते हैं ? क्या आप इस विरासत में भागीदारी महसूस करते हैं? इस विराट थाती के वारिस और ट्रस्टी हैं, यह महसूस करते हैं? मैं यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं कि हालिया वर्षों में कई ताकतें लोगों को गुमराह करने और इतिहास की प्रक्रिया को विकृत करने में सक्रिय रही हैं।' पिछले 70 वर्षों में एएमयू के स्वरूप और मिजाज में बेशक बदलाव आए हैं। लेकिन अब नए सवाल उठने लगे हैं।
आज जब एएमयू हिंसा की चपेट में है, देश के व्यापक हित में कुछ प्रश्नों के उत्तर ईमानदारी से ढूंढ़ने होंगे। हम किस-किस का सिर फोड़ेंगे, किस-किस का बुत तोड़ेंगे, किस-किस का नाम मिटाएंगे और उसके परिणाम क्या होंगे? पाकिस्तान का समर्थन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी ने भी किया था। भारत का एक पूंजीपति वर्ग भी देश की एकता का हिमायती नहीं था। नेहरू के साथ ही सरदार पटेल ने भी पाकिस्तान का अनुमोदन किया था।
देश में ऐसे लोगों के बुतों की संख्या सैकड़ों में होगी, जिनकी राष्ट्र की अवधारणा भिन्न थी या थी ही नहीं। अमृतसर और श्रीनगर से लेकर कन्याकुमारी तक कितनी तस्वीरें और प्रतिमाएं हटाएंगे? यह कोशिश दहकते अंगारों के पथ पर धकेल सकती है। बेहतर होगा, उन पर धूल और मिट्टी की मोटी परतें जम जाने दें।