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आतंकियों से जनतंत्र को बचाते पंच

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जम्मू-कश्मीर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला

अभी छह अगस्त को खबर थी कि जम्मू और कश्मीर के कुलगाम में भाजपा के एक सरपंच सज्जाद अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना अनुच्छेद 370 हटाने के करीब एक साल बाद हुई। इससे पहले इसी वर्ष आठ जून को कांग्रेस के सरपंच अजय पंडिता की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।



कुछ आहत पंचों और सरपंचों का कहना था कि मृत सरपंच बार-बार अपनी सुरक्षा की मांग करते रहे, परंतु अंतिम क्षणों तक वह उन्हें नहीं मिली। उनके मुताबिक, मृत सरपंच आतंकवादी हिंसा का शिकार होने वाला 19वां पंचायत प्रतिनिधि था। इस घटना के बाद कई चुने गए पंचायत प्रतिनिधियों ने त्यागपत्र देने की पेशकश भी की थी। उनका कहना था कि आतंकवादियों की धमकियों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अच्छी पहल पर हमने चुनाव में भागीदारी की थी।


घाटी में पहले भी पंचायत प्रतिनिधियों पर आतंकी हमले होते रहे हैं। छह अगस्त, 2020 की दुखद घटना जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रशासन के उस निर्णय के एक माह पूरे होने के पहले ही हुई है, जिसमें तय किया गया था कि लोकतंत्र रक्षार्थ नगर निकायों व ग्राम पंचायतों में चुने गए प्रतिनिधियों को पच्चीस लाख रुपये की जीवन बीमा सुरक्षा दी जाएगी। इससे किसी अनहोनी की स्थिति में आतंकवादियों के हाथों मृत होने पर परिवार की आर्थिक सुरक्षा तथा शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण की जरूरतें पूरी हो सकेंगी।


इससे पहले सितंबर, 2019 के पहले सप्ताह में भी जब जम्मू क्षेत्र व कश्मीर घाटी के पंचायत प्रतिनिधियों के प्रतिनिधि मंडल ने गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर उनसे अपनी सुरक्षा पर चिंता जताई थी, तो उनको आश्वस्त किया गया था कि जोखिम झेलते प्रत्येक पंच व सरपंच को आतंकवादियों के खिलाफ पुलिस सुरक्षा दी जाएगी तथा उनका दो लाख रुपयों का जीवन सुरक्षा बीमा भी होगा।


जम्मू और कश्मीर में सात सालों के अंतराल के बाद 2018 में पंचायत चुनाव हुए थे। 2011 में हुए चुनावों की खास बात यह थी कि कई ग्राम पंचायतों में अस्सी प्रतिशत तक मतदान हुआ था। किंतु पंचायत कार्यकाल 2016 में समाप्त होने के बावजूद अशांति के चलते नियत समय पर नए चुनाव नहीं हो पाए थे।


2018 के पंचायत चुनावों की अलग-अलग स्तर की चुनावी प्रक्रिया लंबी खिंची। किंतु चुने गए प्रतिनिधियों के लिए जोखिम भी गहराते गए। अलगाववादियों ने इन चुनावों के बहिष्कार का एलान किया था। चुने जाने के बाद पिछले दो साल से पंचायत प्रतिनिधि आतंकियों से सुरक्षा का मुद्दा उठाते रहे हैं। जम्मू और कश्मीर में चार हजार के करीब पंचायतें हैं।


2011 में संपन्न पंचायत चुनावों के एक साल के भीतर ही दस से ज्यादा पंचायत प्रतिनिधियों को आतंकी हिंसा का शिकार होना पड़ा था। जबकि कहा गया था कि लगभग तीन दशकों के बाद उन पंचायती चुनावों के माध्यम से जमीनी लोकतंत्र को मजबूत करने के प्रयास हुए थे।
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निस्संदेह केंद्रीय सुरक्षा बल सब पंचों को सुरक्षा देने के लिए, कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकते हैं। परंतु यदि पंचायतों को वास्तविक पंचायत सरकार चलाने के लिए पर्याप्त अधिकार, विभाग, वित्त, कर्मचारी और ग्राम सुरक्षा दल दे दिए जाएं, तो जनता ज्यादा मन व ताकत से अपने पंचों की ढाल बनती दिखेगी।


जम्मू और कश्मीर में भी अधिकांश राज्यों की ही तरह पंचों व पंचायतों को वे सभी अधिकार और योजना निर्माण की स्वतंत्रता नहीं दी गई है, जिसके वे हकदार  हैं। जम्मू और कश्मीर की बदली हुई परिस्थिति में पंचायतों को अधिक अधिकार दिए जाएं, तो गांवों में अलगाववाद को कम करने और कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास में मदद मिल सकती है।


पंचायती राज को आमजन को आतंकपरस्ती से विमुख करने का प्रमुख औजार बनाया जा सकता है। पंच और सरपंचों की सुरक्षा का सवाल आज आतंकवादियों के कारण ही नहीं, बल्कि अन्य कारणों से भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है।


खासकर उन ग्राम सभाओं में, जहां प्राकृतिक संसाधनों का बाहुल्य है, जहां की जमीनों की व्यावसायिक कीमतें बढ़ रही हैं, जहां गैर कानूनी तरीके से रेत, बजरी या खनिजों का खनन हो रहा है या जहां बड़ी-बड़ी परियोजनाओं  के लिए लोक सुनवाई कर स्वीकृति लेनी होती है। यहां प्रलोभन भी दिए जाते हैं और धमकियां भी।

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