दो नरसंहारों का इस तरह का राजनीतिक और घोर धार्मिक आधार पर विश्लेषण आपको विचलित कर सकता है। आप को होना भी चाहिए। आपको पूछना चाहिए कि तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लूटा। मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। यही बात दोनों जगह अदालत ने पूछी है। मलियाना के लिए तो बताया जा रहा है कि पुलिस ने एफआईआर ही गलत लिखी थी, लिहाजा कथित हत्यारों का बचना तय था। हां, इसमें 36 साल लग गए, यह हैरानी की बात है। आखिर मरे हुए लोगों को ही अगर आरोपी बना दिया जाता है, तो अदालत क्या इंसाफ कर पाएगी? अगर 93 आरोपियों में से 31 कभी पकड़े ही नहीं गए, तो हर तीसरे आरोपी के पकड़े नहीं जाने पर अदालत का रुख क्या होगा? इसी तरह जयपुर में अगर खरीदी हुई साइकिल और बम धमाकों में चिथड़े-चिथड़े हो चुकी साइकिल का फ्रेम ही एक नहीं होगा, छर्रे एक जैसे नहीं होंगे, शिनाख्त परेड में गवाहों के साथ जाकर जांच अधिकारी जांच के विधि-विधान का मजाक बना देंगे, ई-मेल प्राप्त करने वालों की गवाही नहीं होगी, साइबर कैफे के मालिक की गवाही नहीं होगी, तो अदालत किस आधार पर आरोपियों को सजा सुनाएगी?
दोनों मामलों में अदालत के फैसलों का जिक्र करना जरूरी है, क्योंकि यह जांच को लेकर पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जयपुर बम धमाकों में कम से कम पुलिस ने जांच तो की, लेकिन मलियाना में तो जांच तक ठीक से नहीं हुई। मलियाना में पुलिस की एफआईआर दस साल तक गायब हो गई। आरोपियों में दो ऐसे नाम भी थे, जिनकी 1976 और 1977 में ही मौत हो चुकी थी। 36 लोग मारे गए, लेकिन आठ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अदालत में पेश की गई। कोई हथियार बरामद नहीं हुआ, यहां तक कि बुलेट का एक भी खोका बरामद नहीं किया जा सका। एक भी पीएसी जवान को एफआईआर में नामजद नहीं किया गया। ऐसे में अदालत सबूतों के अभाव में आरोपियों को रिहा नहीं करती, तो क्या करती।
जयपुर बम धमाकों में जांच हुई, लेकिन ढंग से सबूत पेश नहीं किए गए। दरअसल धमाकों के चार महीनों बाद तक पुलिस अंधेरे में थी। तभी दिल्ली का बाटला हाउस कांड हुआ। उसमें पकड़े गए चार आरोपियों को पुलिस ने जयपुर बम धमाकों का मुख्य आरोपी बनाया। बीस हजार पन्नों का आरोप पत्र पेश किया गया, लेकिन कोई यह तो देख लेता कि जिस साइकिल पर बम रखा गया था, उसका फ्रेम नंबर उस साइकिल के फ्रेम नंबर से मिल रहा है कि नहीं? आरोपी दिल्ली से बस में जयपुर आए, लेकिन एक भी सहयात्री गवाह के रूप में पेश क्यों नहीं किया गया? तो फिर ऐसा हुआ क्यों? यह जानने के लिए ओटीटी पर अदालती दांव पेचों से आरोपियों को बचाने वाली दो-चार सीरीज देख लीजिए।
अलबत्ता जयपुर बम धमाकों के आरोपियों को बचाने का काम नेशनल लॉ स्कूल से जुड़े प्रोजेक्ट 39ए समूह के युवा वकीलों ने बेहद पेशेवराना अंदाज में किया। पुलिस की तरफ से पेश की गई बातों में कमियां निकालीं और आरोपियों को इसका लाभ मिला। कुल मिलाकर दो घटनाओं में करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए, लेकिन इन्हें किसने अंजाम दिया, पता नहीं। ऐसे में क्या नए सिरे से जांच इसका हल है?