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भैया की जय-जय

Sun, 10 Jan 2016 06:55 PM IST
मूलचंद गौतम
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जब से भैया ने घोषणा की है कि प्रदेश में सिपाहियों की भर्ती में लिखित परीक्षा नहीं होगी, तब से गांवों में रोज दिवाली हो रही है। पिछली बार कुछ लोगों ने पुलिस भर्ती में फर्जीवाड़े की जांच करा दी थी, तो अनेक लोगों की लाखों की जमीनें कौड़ियों में बिक गई थीं।
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भैया को मालूम है कि प्रदेश में खुशहाली सिर्फ मास्टरों और सिपाहियों के नसीब में है। इसमें भी सिपाहियों की तनख्वाह मास्टरों से कम जरूर है, पर ऊपरी आमदनी ज्यादा है। शादी के मार्केट में भी मास्टरी का भाव ज्यादा है। इसमें संतुलन बनाने के लिए सिपहियों के अभिभावक शादी के लिए मास्टरनियों को पहला प्रिफरेंस देते हैं और जिंदगी भर ऐश करते हैं। एसी में सफर करने से लेकर फ्री बिजली, रिक्शा, टैंपो, शाम को सब्जी-फलों से डेली उगाही, हफ्तावारी अलग से। जब सब कुछ नीलामी और ठेके पर चल रहा है, तो उन्होंने सत्य हरिश्चंद्र बनने का ठेका थोड़े न लिया है।

इस मौके का फायदा हताश शिक्षामित्र भी उठा सकेंगे, जो बिना लिखित परीक्षा के सरकारी मजे ले रहे थे, लेकिन कोर्ट ने उसमें बाधा डाल दी। अब भैया ने इसीलिए तो प्रदेश में सरकारी स्कूलों में ठेके पर खुल्लमखुल्ला सामूहिक नकल की व्यवस्था करा दी है, ताकि मेरिट की दिक्कत किसी को न हो। अब कोई बिल्कुल ही करम का हेठा है, तो भैया के बस की बात नहीं। बहती गंगा में भी अगर हाथ न धो पाए, तो फिर कोई क्या मदद करेगा! चलनी में छाने और करम टटोले? अब कोई क्या खाकर भैया को सत्ता में आने से रोकेगा? ये सिपहिये और मास्टर ही तो भैया के सुदर्शन चक्र का काम करेंगे। महाभारत में भी भीष्म पितामह इसी ट्रिक से हारे थे। वह घूस और नकल के विरोधी थे, जबकि दुर्योधन इस कला में पारंगत था। ऊपर से शकुनि मामा के बेमिसाल हथकंडे थे। पांडवों के बस का नहीं था महाभारत जीतना, अगर सोलह कलाओं के अवतार उनके साथ न होते। साम, दाम, दंड, भेद एक साथ होने पर ही जीत की गारंटी पक्की होती है। इनमें से कोई एक अकेला चुनाव नहीं जितवा सकता।
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