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रथ पर अवतरित लोकनाथ: रथयात्रा में क्यों निकलते हैं भगवान जगन्नाथ? नंदीघोष, तालध्वज और देवदलन की कहानी

शास्त्री कोसलेंद्रदास Published by: Devesh Tripathi Updated Thu, 16 Jul 2026 06:44 AM IST

सार

आज से शुरू हो रही जगन्नाथ रथयात्रा आस्था, भक्ति और कला का वह अनूठा समागम है, जहां स्वयं सृष्टि के स्वामी भक्तों से मिलने धरा पर आते हैं।
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जगन्नाथ रथ यात्रा - फोटो : Adobe Stock




भगवान जगन्नाथ के रथ महोत्सव को रथयात्रा, गुंडिचा यात्रा एवं घोष यात्रा भी कहते हैं। महोत्सव की शुरुआत में देवताओं को मंदिर के गर्भगृह से निकालकर पारंपरिक धार्मिक विधान से रथों तक लाया जाता है। सबसे पहले चक्रराज सुदर्शन, फिर हलधर बलभद्र व सुभद्रा और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ। जिस रथ में भगवान जगन्नाथ विराजते हैं, उसे ‘नंदीघोष’, भगवान बलभद्र के रथ को ‘तालध्वज’, सुभद्रा के रथ को ‘देवदलन’ रथ कहा जाता है। चक्रराज सुदर्शन के विग्रह को सुभद्रा के साथ रथ में विराजमान किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के प्रतिरूप में मदन मोहन भगवान को जगन्नाथ के रथ में स्थान दिया जाता है। धातु से बने श्रीराम और श्रीकृष्ण के दो छोटे विग्रह बलभद्र के रथ में बिठाए जाते हैं। इस प्रकार सात देवता-जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा, सुदर्शन, मदनमोहन, श्रीराम और श्रीकृष्ण को तीन रथों पर बैठा कर उन्हें ‘गुंडिचा घर’ ले जाया जाता है। बलभद्र का रथ सबसे पहले खींचा जाता है, बाद में सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ का।


सप्ताहभर गुंडिचा घर में विराजने के बाद नौवें दिन देव विग्रह फिर से जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार क्षेत्र में लाए जाते हैं। पांचवें दिन एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान होता है, हेरा पंचमी। यह पर्व अपने भाई-बहन के साथ रथारूढ़ होकर मंदिर छोड़ आए भगवान से नाराज माता लक्ष्मी से जुड़ा है। महाप्रभु से नाराज महालक्ष्मी सखियों संग शरधा बाली (श्रद्धावलि) तक आती हैं। लक्ष्मी जी की प्रतिमा को वाद्यों के साथ गुंडिचा मंदिर तक लाया जाता है, जहां नाराज लक्ष्मी नंदिघोष रथ का एक हिस्सा तोड़ देती हैं। बारहवें दिन भगवान जगन्नाथ को ‘आराधना भोग’ भेंट किया जाता है, जिसमें उन्हें मीठे पेय चढ़ाए जाते हैं।


रथों का निर्माण हर साल वंशानुगत लोगों द्वारा नई लकड़ी से किया जाता है। 45 फीट ऊंचे व इतने ही चौड़े भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए होते हैं। यह रथ लाल और पीले कपड़ों से अलंकृत होता है। प्रभु रथ में सुनहरे पीले वस्त्र धारण कर विराजमान होते हैं। भगवान बलभद्र के रथ पर लगे झंडे में वृक्ष की आकृति होती है और चौदह पहिये होते हैं। 44 फीट ऊंचा रथ लाल और नीले कपड़े से ढका होता है। बारह पहियों वाला सुभद्रा का रथ 43 फीट ऊंचा होता है। इस रथ को लाल और काले कपड़े से सुसज्जित किया जाता है, जिसे लोग शक्ति और मातृका देवी से जोड़ते हैं। प्रभु जगन्नाथ के सारथी मातलि हैं, बलभद्र के दारुक व सुभद्रा के अर्जुन।


वसंत पंचमी के दिन से ही रथ निर्माण के लिए लकड़ियों का आना शुरू होता है। रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है। हर साल नए रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बारह वर्षों में एक बार बनाई जाती है, जिस अनुष्ठान को नवशरीर-उत्सव कहा जाता है।


विश्वावसु नामक वनवासी व्यक्ति भगवान नीलमाधव की पूजा करता था। इस बारे में सुनकर राजा इंद्रद्युम्न ने इनके शास्त्रीय स्वरूप का पता लगाने के लिए अपने पुरोहित विद्यापति को वहां भेजा। इंद्रद्युम्न को ज्ञात हुआ कि नीलमाधव साक्षात श्रीकृष्ण हैं। फिर, उन्होंने जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाया, जो कालांतर में जीर्ण हो गया। अभी जो मंदिर है, उसका निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा अनंतवर्मन ने शुरू किया, जो उनके वंशज अनंगभीम देव (तृतीय) के समय पूरा हुआ। जगद्गुरु शंकराचार्य ने पुरी में गोवर्धन मठ को स्थापित किया।
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स्कंद पुराण के उत्कल खंड से लेकर अनेक ग्रंथों में भगवान जगन्नाथ पर प्रचुर मात्रा में लिखा गया है। 12वीं शताब्दी में महाकवि जयदेव ने यहीं गीतगोविन्दम लिखी। पुरी के राजा पुरुषोत्तमदेव ने नीलाद्रिविलास:, मुक्तिचिंतामणि एवं गोपालार्चन-पद्धति ग्रंथ लिखे। हलधर मिश्र का वसन्तोत्सव महाकाव्य, नरसिंह कवि का अभिनवजगन्नाथ-प्रस्तावम, नीलांबर आचार्य का चंदनयात्रा-चंपू, विश्वनाथ महापात्र का कांचीविजय महाकाव्य, गणेश्वर रथ वाचस्पति का श्रीपुरुषोत्तमचरित और नित्यगुप्तचूडामणि प्रसिद्ध हैं। मंदिर में वैष्णव एवं तांत्रिक विधा से पूजा होती है और ‘नीलाद्रिनाथ-पूजाविधि’ के अनुसार भगवान की सेवा की जाती है।

edit@amarujala.com
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