एक मित्र ने कान में कहा, साधो, कल मेरी पार्टी की सभा है। ज्यों ही मैं माइक पर बोलने जाऊं, तुम मुझ पर स्याही फेंक देना।
ऐसा अनर्थ मुझसे नहीं हो सकता, मैंने तर्क किया।
वह कहने लगे, इस काम के लिए किसी और से नहीं कह सकता। मीडिया भाव नहीं दे रहा। जबकि मैं पब्लिक में हीरो बनना चाहता हूं। राजनीति में साफ-सुथरे रहने का कोई मतलब नहीं। दस-बीस दाग हों, तभी वैल्यू है। मुझे वोटरों की सहानुभूति चाहिए।
मैं मना नहीं कर सका। सभा में भीड़ थी। स्याही की शीशी कुर्ते की जेब में खोंसे मैं मंच के पीछे ही खड़ा था। नारेबाजी के बीच मैंने शीशी उछाली, तो वह पार्टी अध्यक्ष को जा लगी। वह चीखे, पकड़ो-पकड़ो।
लोगों ने मुझे दबोच लिया। थप्पड़, लात, घूंसों से मेरी पड़ताल होने लगी। अध्यक्ष जी बोले, इस आदमी को सांप्रदायिक ताकतों ने बरगलाया है। पर इस भोले आदमी को मैं माफ करता हूं।
घर आया, तो दर्द से कराह रहा था। थोड़ी देर में मरहम के साथ मित्र सामने खड़े थे। वह बोले, सब गड़बड़ हो गई। तुम्हारा लक्ष्य क्या चूका कि अध्यक्ष जी हिट हो गए। मैं कहीं का नहीं रहा। सब चैनल वालों ने अध्यक्ष जी को घेर लिया।
मित्र के साथ एक और पार्टी सदस्य खड़े थे। उनके चेहरे और कपड़ों पर कालिख पुती थी। मैंने कहा, यह क्या? वह बोले, अपने आप किया है। दो घंटे बाद दूसरे कस्बे में सभा के लिए निकलना है। किसी दूसरे से चूक हो जाए, इससे अच्छा है कि खुद ही अपने को काला-पीला कर लूं। वहां पहुंचते ही कह दूंगा कि रास्ते में गाड़ी रोककर विरोधियों ने हरकत की। प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाऊंगा। देखना, कैसी धांसू रिपोर्ट बनती है। मैं मित्र और उनके साथी को देखता रह गया।
मेरे एक और परिचित राजनीतिक मित्र अपने ऊपर खुद ही हमले प्रायोजित करवाते हैं। वोट मांगने निकलते हैं, तो उनके किसी हाथ या पैर पर प्लास्टर चढ़ा होता है। कई बार वह व्हीलचेयर पर होते हैं या उन्हें मंच पर कार्यकर्ता सहारा देकर चढ़ाते हैं। नतीजा होता है, उनके नाम पर जनता की जय-जयकार और चुनाव में वोटों की बरसात। अपने पुतले जलवाने का दायित्व भी वह खुद ही संभालते हैं।
मैं एक ऐसे नेता को भी जानता हूं, जो अपने घर पर पत्थर फिंकवाने में माहिर हैं। एक-दो बार चुनाव से ऐन पहले अपनी गाड़ियों के शीशे उन्होंने खुद तुड़वा दिए। वह तो गनीमत थी कि कोई हताहत नहीं हुआ।