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लोकतंत्र है, तानाशाही नहीं

तवलीन सिंह Updated Sun, 08 Jul 2018 05:56 PM IST
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तवलीन सिंह

नरेंद्र मोदी पर दो आरोप लगाए जाते हैं, जो मेरी राय में गलत हैं। पहला यह कि उनका स्वभाव इतना तानाशाही है कि वह आलोचना बिल्कुल नहीं सह सकते हैं। और दूसरा यह कि पिछले चार साल में उन्होंने लोकतंत्र की संस्थाओं को कमजोर करने का लगातार प्रयास किया है। दिल्ली में आजकल जहां भी राजनीति की चर्चा होती है, कोई न कोई बुद्धिजीवी, विरोधी राजनेता या पत्रकार के मुंह से ये दोनों या इनमें से एक आरोप सुनने को मिलते हैं। लेकिन इन आरोपों का विश्लेषण ईमानदारी से किया जाए, तो साफ दिखता है कि इनमें सच्चाई कम है और पूर्वाग्रह ज्यादा।



मोदी से पहले देश की असली प्रधानमंत्री सोनिया गांधी थीं। उन्हें आलोचना से इतनी तकलीफ थी कि अगर मेरे जैसा कोई आलोचना करने की हिम्मत दिखता था, तो फौरन उनके किसी समर्थक का संदेश आया करता था कि मुझे सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए। इस तरह के संदेश औरों को भी गए होंगे, सो सोनिया गांधी की आलोचना कभी हुई ही नहीं। यहाँ तक कि जब उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप किया, तब भी आलोचना नहीं हुई। यह परिषद नीतियां बनाया करता था, लेकिन कोई नीति या योजना अगर नाकाम रहती, तो दोष उस बेचारे डॉक्टर साहब पर लगता था, जो प्रधानमंत्री निवास में विराजमान थे। क्या सोनिया गांधी का स्वभाव मोदी से कम तानाशाही था? रही बात लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की, तो सलाहकार परिषद के पास मंत्रिमंडल से अधिक शक्ति थी। और प्रधानमंत्री से अधिक शक्ति थी सोनिया गांधी के पास। ऐसा होने से क्या ये अति महत्वपूर्ण संस्थाएं कमजोर नहीं हुईं?


मोदी की आलोचना इस वर्ष की शुरुआत में सर्वोच न्यायालय के न्यायाधीशों ने पत्रकारों को बुलाकर स्पष्ट शब्दों में की थी। आरोप उनका यह था कि प्रधान न्यायधीश सरकार के कहने पर पीठों में जजों की नियुक्ति करते हैं, जिससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। माननीय न्यायाधीशों ने इसका कोई सुबूत नहीं पेश किया, पर इनकी बातों का प्रचार मीडिया में इतना हुआ कि विदेशों में खबर फैल गई कि मोदी लोकतंत्र को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। अखबारों में इस मुद्दे पर उन पत्रकारों ने लेख लिखे, जिन्होंने सोनिया गांधी की कभी आलोचना नहीं की, बावजूद इसके कि सब जानते थे कि बिना औपचारिक जिम्मेदारी लिए देश की असली प्रधानमंत्री वही थीं। पिछले दिनों जब भी मोदी के तानाशाह होने की बात छिड़ी है, भाजपा प्रवक्ताओं ने ऊंचे स्वर में इंदिरा गांधी की आलोचना की। पर समझना मुश्किल है कि उन्हें कभी सोनिया गांधी क्यों नहीं याद आती। उन्हें याद क्यों नहीं रहता कि सोनिया के विदेशी मूल को लेकर जिन्होंने भी सवाल उठाए, उनको कांग्रेस छोड़कर जाना पड़ा? क्यों नहीं याद रहता कि तानाशाहों की खोज में उनको पुराने इतिहास में जाने की जरूरत नहीं है?


मोदी की आलोचना कई चीजों को लेकर हो सकती है। उनकी आर्थिक नीतियां ऐसी हैं कि देश के आम आदमी को लगने लगा है कि अच्छे दिन निकट भविष्य में नहीं आने वाले। मेरी राय में मोदी को अगले चुनाव में नुकसान होने वाला है, क्योंकि उन्होंने अपने अधिकारियों पर भरोसा ज्यादा और अपने राजनीतिक साथियों पर विश्वास कम किया है। गलतियां और भी बहुत सारी हुई हैं, पर यह कहना झूठ है कि उनके दौर में तानाशाही आ गई है। लोकतंत्र जितना सुरक्षित सोनिया के दौर में था, उतना सुरक्षित आज भी है। सुबूत चाहिए तो इसी को देख लें कि आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी के हारने की बातें अब जगह-जगह हो रही हैं।

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