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यह व्यापार का मामला है

Thu, 20 Oct 2016 06:12 PM IST
मरिआना बाबर
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मरिआना बाबर
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पाकिस्तान में केबल ऑपरेटरों या लोगों को छतों पर उन छोटे डिश एंटीना को हटाते देखना इन दिनों आम बात है, जो घरों में भारतीय कंपनी एयरटेल की सेवाएं देते हैं। दरअसल पाकिस्तान ने भारतीय डीटीएच टेलीविजन सेवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन डीटीएच सेवाओं के नियमित दर्शकों में सेनाधिकारियों की बीबियां भी हैं, जो सास-बहू वाले सीरियल देखे बिना एक दिन नहीं गुजार सकतीं। जब तक कैंटोनमेंट एरिया में डीटीएच सेवाएं चालू थीं, तब तक हर आदमी यही सोचता था कि पाक स्थानीय केबल ऑपरेटरों के जरिये करोड़ों रुपये भारत को भेजना गैरकानूनी नहीं है, क्योंकि ये रुपये सिर्फ भारतीय कारोबारियों को ही फायदा नहीं पहुंचा रहे, बल्कि हजारों पाकिस्तानी केबल ऑपरेटर को भी रोजगार मुहैया करा रहे हैं। हाल ही में मुंबई फिल्म समारोह के आयोजकों ने पाकिस्तान की फिल्म जागो हुआ सवेरा को, जो ऑस्कर के लिए भेजी गई पहली पाकिस्तानी फिल्म थी, प्रतिबंधित कर दिया है। इस पर पाकिस्तान के लोग दुखी और उदास हैं।
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पाक टेलीविजन पर भारत से जुड़ी चीजों पर प्रतिबंध और यहां के सिनेमा हॉलों में भारतीय फिल्मों पर रोक से दोनों ही देशों को भारी आर्थिक नुकसान होने वाला है। इस प्रतिबंध से बॉलीवुड को कितना नुकसान होगा, भारत को इसका एहसास है, क्योंकि पाकिस्तान भारतीय फिल्मों का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत शायद इस घाटे की भरपाई कर भी ले।

लेकिन पाकिस्तान में जहां हजारों केबल ऑपरेटर बॉलीवुड की फिल्मों पर निर्भर हैं, वहीं सिनेमा हॉल मालिकों के लिए भी भारतीय फिल्में उनके बढ़ते कारोबार की गारंटी हैं। ये लोग अब पुरानी पाकिस्तानी फिल्में दिखाकर काम चला रहे हैं। पाकिस्तान के सिनेमा हॉलों की कुल आमदनी में पचास से साठ फीसदी हिस्सेदारी भारतीय फिल्मों की है। प्रतिबंध से पहले फिल्म निर्देशक साकिब मलिक ने कहा था, 'अगर भारतीय फिल्में न होतीं, तो अपने यहां सिनेप्लेक्स न होते। पाकिस्तान का फिल्मोद्योग तो लगभग बंदी के कगार पर पहुंच चुका था। इसलिए यहां भारतीय फिल्में दिखाने की इजाजत दी गई। और उसके बाद ही हमारी अपनी फिल्मों का भी स्तर सुधरना शुरू हुआ।'
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फिल्मों के एक दूसरे विशेषज्ञ बताते हैं, 'एक साल में बावन हफ्ते होते हैं। एक फिल्म एक हफ्ता चलती है, अगर वह ब्लॉकबस्टर हुई, तो दो हफ्ते चलती है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल पाकिस्तान में कुल पंद्रह फिल्में रिलीज हुईं। जबकि इस साल अब तक छह फिल्में रिलीज हुई हैं, जिनमें से तीन ही चल पाईं। बाकी फिल्में फ्लॉप हो गईं। अगर ये छह फिल्में दो-दो हफ्ते भी चलीं, तब भी साल में चालीस-बयालीस हफ्ते दिखाने के लिए कुछ नहीं है। इस दौरान सिनेमा हॉल क्या करेंगे?'

ऐसे में, मुद्दा यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जारी राजनीतिक तनावों को देखते हुए क्या दोनों देशों के कलाकारों को भी इसमें शामिल हो जाना चाहिए या उन्हें पहले की ही तरह कारोबार जारी रखना चाहिए। आतंकवाद इन देशों को आर्थिक रूप से पीछे ही ले जाएगा। इसलिए फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय बेहतर होता कि दोनों देशों के कलाकार बैठकर यह तय करते कि अपनी कलाओं के जरिये वे कैसे आतंकवाद के खिलाफ जनमत तैयार कर सकते हैं। कलाकार सरकारों और आतंकवादियों को बताते कि वे अपनी मंशा में सफल नहीं सकेंगे।

फवाद खान और माहिरा खान ने, जिनका भारतीय फिल्मोद्योग में बहुत कुछ दांव पर लगा है, आपसी प्यार और समझदारी बरकरार रखने की बात कही है। यह याद रखना चाहिए कि पाकिस्तानी और भारतीय फिल्म कलाकारों को अपनी बातचीत में संजीदगी का परिचय देना होगा, क्योंकि उन्हें अपने देशों में रहना होगा, लिहाजा वे दूसरे देश के हित में बोलना गवारा नहीं कर सकते। माहिरा खान ने कहा, 'एक पाकिस्तानी नागरिक होने के नाते मैं आतंकवाद और इस कारण होने वाली मौत की, चाहे वह किसी भी जमीन पर होती हो, सख्त निंदा करती हूं। मुझे खूंरेजी और जंग से खुशी नहीं होगी। मैं एक ऐसी दुनिया का सपना देखती हूं, जहां मेरा बच्चा इस हिंसा के बिना रह सके, और मैं हमेशा लोगों को एक शांतिपूर्ण दुनिया के बारे में सोचने को कहती हूं।' इसी तरह फवाद खान ने कहा, 'दो छोटे-छोटे बच्चों के पिता होने के नाते मैं कहता हूं कि एक साथ मिलकर हम एक शांतिपूर्ण दुनिया बना सकते हैं। मेरा मानना है कि हमें उन बच्चों के बारे में सोचना चाहिए, जो हमारा भविष्य गढ़ेंगे।'

भारत में कुछ लोग करण जौहर की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल का प्रदर्शन रोकने चाहते हैं, क्योंकि इसमें फवाद खान की महज चार मिनट की मौजूदगी है। उन्हें यह सोचना चाहिए कि इस फिल्म में सैकड़ों भारतीयों की मेहनत लगी है, जबकि पाकिस्तानी तो मात्र एक है। इसके लिए भारतीय फिल्मोद्योग को खामियाजा क्यों भुगतना चाहिए? पाकिस्तान को डपटने के लिए फवाद खान की चार मिनट की भूमिका को हटा भी तो दिया जा सकता है। दोनों देशों के कलाकारों में इसका भी डर है कि यदि उन्होंने अपनी-अपनी सरकारों का समर्थन नहीं किया, तो उन पर राष्ट्र-विरोधी होने का तमगा लग सकता है।

पुराने दिनों में जब भारतीय फिल्मों पर रोक लगती थी, तब पाकिस्तान में लोग चोरी-छिपी हिंदी फिल्में वीसीआर पर देखते थे, फिर सीडी से देखने लगे, और अब वे कंप्यूटर पर देखते हैं। यानी आधुनिक तकनीक के दौर में फिल्मों पर सरकारी प्रतिबंध से कुछ होने वाला नहीं है। पाकिस्तानी सिनेमा का स्तर सुधारने वाले नदीम मंडवीवाला कहते हैं, उद्योग संगठन रिश्ते सुधारने के लिए होते हैं, बिगाड़ने के लिए नहीं। भारत-पाकिस्तान के मौजूदा रिश्ते नाजुक हैं, लिहाजा उद्योग संगठनों को इन्हें और नहीं बिगाड़ना चाहिए। इसका भारत और पाकिस्तान, दोनों को नुकसान होगा। चूंकि चोरी-छिपे फिल्में देखी ही जा रही हैं, ऐसे में नुकसान फिल्म निर्माताओं को होगा।
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