भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में वर्ष 2024 में भीषण गर्मी ने तबाही मचाई। 50 डिग्री सेल्सियस तक की जानलेवा गर्मी हमने झेली, और 2025 में यह स्थिति इतनी सामान्य हो गई कि किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ। इसके बाद दुनिया भर में आई बाढ़ों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। यही नहीं, सऊदी अरब जैसे देश (जहां बर्फ की कल्पना भी नहीं की जा सकती) के कुछ क्षेत्रों में भारी हिमपात हुआ। यह किसी के लिए भी आश्चर्यजनक था, किंतु कथित ‘रोमांटिक एन्वॉयरनमेंटलिज्म’ ने इसे ‘विंटर वंडरलैंड’ कहकर प्रस्तुत किया। इसे कुदरत का करिश्मा कहा जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि यह कुदरत की मार है। इन दोनों के बीच का अंतर समझना आज अत्यंत आवश्यक है।
यदि हम पिछले दस वर्षों के आंकड़े देखें, तो चाहे पर्वतीय क्षेत्र हों या मैदानी इलाके (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड या केरल) हर जगह कुछ न कुछ ऐसा अवश्य हुआ है, जो बताता है कि मौसम अब हमारे नियंत्रण में नहीं रहा। यह प्रकृति का अंतिम संदेश है कि अब भी समझने व संभलने का वक्त है। प्रकृति किसी देश के अच्छे या बुरे व्यवहार में भेद नहीं करती। चाहे विकसित देश हों या अविकसित, प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम सबको झेलना पड़ेगा। अब सवाल प्रकृति को नहीं, स्वयं को बचाने का है। आज दुनिया की सबसे बड़ी दौड़ आर्थिक विकास की होड़ है। यह सब बेहतर जीवन की कल्पना के लिए किया जा रहा है, सुख-सुविधाओं से भरे संसार के लिए। लेकिन क्या यह वास्तव में संभव है? जिस तरह से हमने प्रकृति के साथ व्यवहार किया है, ये ही सुख आगे चलकर बड़े दुख में बदलने वाले हैं और शायद हम उन्हें झेल भी न सकें।
इतिहास गवाह है कि लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले और फिर 6.5 करोड़ वर्ष पहले प्रकृति में ऐसे बड़े परिवर्तन आए, जिनसे समूचा जीवन समाप्त हो गया। मानव सभ्यता के इतिहास में भी, चाहे सिंधु घाटी सभ्यता हो, प्राचीन मिस्र का पुराना साम्राज्य हो या माया सभ्यता, सभी के पतन में प्रकृति की भूमिका निर्णायक रही है। पिछले 40 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि सबसे अधिक प्राकृतिक आपदाएं अमेरिका में, फिर चीन में और तीसरे स्थान पर भारत में हुई हैं, जबकि ये तीनों देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं के लिए जाने जाते हैं।
आर्थिक विकास का विरोध नहीं है, न ही आपत्ति। पर यदि हम अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी को साथ लेकर चलें, तो एक बेहतर, सुरक्षित व संतुलित समाज का निर्माण संभव है। अपने देश में भी कई तरह के विरोध-बहस जारी हैं। इसके बजाय, एक राष्ट्रीय बहस क्यों संभव नहीं है, जो यह तय करे कि प्रकृति व पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं चाहिए और अगर चाहिए, तो उसकी सीमा क्या हो। एक तरफ प्रकृति संवेदनाएं जता रही है, तो दूसरी तरफ सरकारों को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में, मिलकर विकास रेखा तय कर ली जाए, जिसे सब मान्यता दें। विकास और विनाश के बीच यह लक्ष्मण रेखा ही होगी, जिसे पार करना किसी के हित में नहीं होगा।