भारत की एक बेटी के बलात्कार ने पहली बार सारे देश को हिला दिया है इतना कि दिल्ली में सिंहासन हिल गया है। प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री के निवास के सामने इतना आक्रोश जाहिर किया कि पुलिस को उनको रोकना पड़ा। इंडिया गेट पर प्रदर्शन हो रहे हैं और संसद के अंदर तक गूंजी दुहाई की गुहार।
उन आला पुलिस अफसरों से जवाब मांगे गए, जो अक्सर अपने को जवाबदेही से ऊपर मानते हैं। प्रदर्शनकारियों का गुस्सा देखकर सोनिया गांधी खुद गईं उस बच्ची से मिलने, जो सफदरजंग अस्पताल के आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं।
उसकी कहानी टीवी पर सुनाते लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार की आंखों में आंसू थे, जब उन्होंने बताया कि इस बच्ची के मजबूर मां-बाप ने अपनी जमीन बेचकर उसे दिल्ली भेजा था डॉक्टर बनाने। उन्होंने कहा, 'हमने कई बार सुना है कि जमीन बेचकर मां-बाप अपने बेटे को डॉक्टर बनाने का प्रयास करते हैं या बेटी की शादी करवाने का, लेकिन पहली बार सुना है कि बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए किसी मां-बाप ने जमीन बेची है।'
इस बच्ची की कहानी इतनी दर्द भरी, इतनी शर्मनाक है कि स्वाभाविक है कि कई लोगों के दिल को छू गई है, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह की कहानियां रोज सुनने को मिलती हैं अपने भारत देश में। काश कि ऐसे हर मामले में देश इसी तरह हिल जाए।
पिछले सप्ताह एक ही दिन के अखबार आपने पढ़ें हों, तो पता चलेगा कि बीदर में एक पांच वर्ष की लड़की का बलात्कार इतनी बुरी तरह हुआ कि वह बेहोश पड़ी है अस्पताल में। बंगलुरू में एक 14 वर्ष की लड़की के साथ अनजान लोगों ने बलात्कार किया। केरल के किसी अदालत ने उसी दिन एक ऐसे बाप को सात वर्ष की सजा सुनाई, जिसने अपनी बेटी के साथ बलात्कार करने के बाद उसे बेचने की कोशिश की थी। शर्म आती है कहने में, लेकिन यथार्थ है कि भारत की बेटियां अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।
हम इस बात को जानते हुए भी कुछ नहीं करते, क्योंकि इस बात को हम अपनी सभ्यता का हिस्सा मानते हैं। इतनी आसानी से स्वीकार करते हैं हम भारत की बेटियों पर अत्याचार कि दिल्ली वाली घटना के बाद जब पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगा गया, तो कइयों ने कहा कि यह 'सामाजिक समस्या है', पुलिस की नहीं। मैंने क्योंकि पत्रकारिता की ट्रेनिंग ब्रिटेन में ली थी, इसलिए ऐसे मामलों में मेरी सोच शुरू से अलग थी।
भारत वापस आने के बाद बहुत तकलीफ होती थी, जब बलात्कार की घटनाओं को मेरे पत्रकार बंधु मामूली स्टोरी मानते थे। खबर अगर छपती, तो इतनी छोटी कि न छपती, तो बेहतर होता। लाख कोशिश की मैंने कहने की कि बलात्कार को उतना ही बड़ा जुर्म माना जाना चाहिए, जितना हत्या को माना जाता है, लेकिन 70 के उस दशक में कोशिशें नाकाम रहीं।
तो अगर आज हम बलात्कार की एक घटना को कई दिन तक राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना सकते हैं, बहुत बड़ा परिवर्तन है, लेकिन असली परिवर्तन तब तक नहीं आएगा, जब तक हम बलात्कार की हर घटना को अहमियत नहीं देंगे। कुसूर सिर्फ पुलिस का नहीं है, हम पत्रकारों का भी है। हम भूल गए हैं कि जिस देश में औरतें सुरक्षित नहीं होती हैं, उस देश को कभी अपने आपको सभ्य कहने का अधिकार नहीं होता है।
हमारे देश में अक्सर हमारी प्राचीन परंपराओं के ठेकेदार कहते हैं कि ऐसे विचार पश्चिम से आए हैं हमारी शुद्ध भारतीय सभ्यता में खोट डालने। गलत कहते हैं ये लोग। इसलिए कि कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिखा है कि सुरक्षा ऐसी होनी चाहिए महिलाओं की कि एक तवायफ भी सड़क पर चलते हुए अपने आप को सुरक्षित समझ कर चल सके।
काश कि उन दरिंदों को यह सीख पढ़ाई गई होती, जिन्होंने अपने मजे के लिए एक 23 वर्ष की लड़की के साथ ऐसा किया, जो जानवर भी अपने शिकार के साथ नहीं करते हैं। काश, उन पुलिस अधिकारियों को यह सीख दी गई होती, जिन्होंने सारा दोष समाज पर डालकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की। दोष सिर्फ मर्दों पर डालना गलत होगा, क्योंकि अगर भारत के मर्द औरतों को वस्तु समझ कर इस्तेमाल करते हैं,तो उन्होंने यह बात सीखी है अपनी माताओं से।
बचपन से भारत के बेटों को सिखाती हैं उनकी माएं कि उनका दर्जा उनकी बहनों से ऊपर है।ऊपर से इस प्राचीन देश में मजबूत खंभों पर स्थित है जातिवाद की प्राचीन परंपरा, जिसके तहत नीची जातियों की बेटियों को वह सुरक्षा का अधिकार नहीं मिलता है ग्रामीण भारत में, जो ऊंची जातियों की बेटियों का जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। जो लोग अभी आंसू बहा रहे हैं, उन्हें थोड़े से आंसू दलित बेटियों के लिए भी बचा के रखने चाहिए, जो सदियों से शिकार बनती आई हैं सवर्ण जाति के लड़कों की।