प्रधानमंत्री जिम्मेदारी से बच निकलने और सुर्खियों में बने रहने का कौशल जानते हैं। इक्कीस दिनों में कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई जीत लेने के वादे और फिर लॉकडाउन एक और दो लगाने के बाद उन्होंने आगे के लॉकडाउन से खुद को चुपचाप अलग कर लिया।
लॉकडाउन के समापन के नजदीक पहुंचने के साथ ही उन्होंने चुपचाप जिम्मेदारियां राज्य सरकारों और मुख्यमंत्रियों की ओर सरका दी। तब तक उनके शब्द कठोर नियम की तरह होते थे और अब जब संक्रमित लोगों की संख्या दो लाख के पार हो गई है और 'पीक' अब भी काफी दूर है, यह गृह सचिव पर छोड़ दिया गया है कि वह अस्पष्ट अधिसूचनाएं जारी करें और आईसीएमआर घोषणाएं करे।
20 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज श्री मोदी के दिमाग की उपज थी। कोई भी अर्थशास्त्री अधिक तरलता, विशाल पांच वर्षीय योजनाओं और वास्तविक धन के अभाव से बनी खिचड़ी पर, जिसे प्रोत्साहन पैकेज कहा जा रहा है, दस्तखत नहीं करता। उम्मीद के मुताबिक पैकेज के धड़ाम होने के बाद श्री मोदी ने 'ब्यौरों को भरने' की जिम्मेदारी वित्त मंत्री पर डाल दी।
प्रधानमंत्री ने खुद को दूर किया
श्री मोदी अब जम्मू-कश्मीर के बारे में नहीं बोलते; यह जिम्मेदारी श्रीनगर के नौकरशाहों पर छोड़ दी गई है। वह सीमा पार से की जाने वाली हिंसा या फिर जवानों की जिंदगियों को हो रहे नुकसान के बारे में नहीं बोलते; इसे जनरलों पर छोड़ दिया गया है। उन्होंने चीन से टकराव के बारे में अब तक कुछ नहीं कहा है; उन्होंने सैन्य मुख्यालय की विज्ञप्तियों को पढ़ने की जिम्मेदारी रक्षा मंत्री पर छोड़ दी और चीन से बात करने की जिम्मेदारी विदेश मंत्री पर।
श्री मोदी ने प्रवासी मजदूरों के बड़ी संख्या में हो रहे 'रिवर्स माइग्रेशन' (घर लौटना) पर पूरे अप्रैल महीने में कुछ नहीं कहा। जब हालात विस्फोटक रूप से बेकाबू हो गए, तब यह रेल मंत्री थे, जो सामने आए और उन्होंने भी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय राज्य सरकारों पर आरोप लगाए। हजारों प्रवासी मजदूर अब भी रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड्स पर फंसे हुए हैं और उन्हें पता नहीं है कि कब उन्हें सार्वजनिक परिवहन मिलेगा।
प्रधानमंत्री ने सुर्खियों में रहने का मौका तलाशते हुए सीआईआई (भारतीय उद्योग परिसंघ) की आम सभा को संबोधित करने के लिए मिला निमंत्रण लपक लिया। मैं समझता हूं कि इससे पहले किसी और प्रधानमंत्री ने उनकी आम सभा को संबोधित नहीं किया था, इसलिए मुझे बहुत हैरत हुई।
मुश्किल नहीं, सही हो या गलत?
आम सभा में उन्होंने जो कुछ कहा, उससे हैरत नहीं हुई है। यदि आमंत्रित किया भी जाए, तो प्रधानमंत्रियों को उत्साह बढ़ाना चाहिए, जबकि मोदी का भाषण खुद पर केंद्रित था। प्रधानमंत्री ने कहा, 'मुझ पर भरोसा रखिए, वृद्धि की राह पर लौटना मुश्किल नहीं।' क्या यह सही है?
यदि वृद्धि की राह पर लौटना इतना मुश्किल नहीं था, तो फिर सरकार 2017-18 के दौरान जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर में आ रही गिरावट को रोक क्यों नहीं पाई थी? 2019-20 की चौथी तिमाही तक जब लगातार आठ तिमाहियों से विकास दर ढलान पर थी, तो सरकार बेबस क्यों खड़ी रही?
प्रधानमंत्री पक्के तौर पर जानते हैं कि 2019-20 की चौथी तिमाही की 3.1 फीसदी की विकास दर 2002-03 की तीसरी तिमाही के बाद से सबसे न्यूनतम है, जब केंद्र में भाजपा की ही सरकार थी। साथ ही, वर्ष 2019-20 की 4.2 की विकास दर 17 वर्षों में सबसे न्यूनतम है।
यहां तक कि 2008 के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट ने भी भारतीय विकास दर को ऐसी चोट नहीं पहुंचाई थी। यूपीए के 2012-13 और 2013-14 के प्रदर्शन का मजाक उड़ाते हुए अक्सर वित्त मंत्री को उद्धृत किया जाता है, जबकि वह जान-बूझकर सीएसओ के आधिकारिक आंकड़ों को नजरंदाज कर देती हैं : 2011-12 में 5.2 फीसदी (एक अगस्त, 2012 को वित्त मंत्री के रूप में मेरी वापसी हुई थी), 2012-13 में 5.5 फीसदी और 2013-14 में 6.4 फीसदी। वित्त मंत्री को याद दिला दूं कि यूपीए ने एनडीए को आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था सौंपी थी।
निष्पक्षता से कहा जाए, तो एनडीए ने 2014-15, 2015-16 और 2016-17 के अधिकांश भाग में तब तक गति बनाए रखी, जब तक कि सरकार ने अहंकार में डूबकर आठ नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा न कर दी। इसी के बाद ढलान शुरू हो गई और, प्रधानमंत्री की इस घोषणा के साथ कि 'वृद्धि की राह पर लौटना मुश्किल नहीं है', एनडीए-एक और एनडीए-दो ने साबित कर दिया है कि यह काम उनकी क्षमता से बाहर है।
जो 'आई' गायब है
उद्योग, व्यापार और वाणिज्य सब जानते हैं। निर्यातकों को पता है। एमएसएमई को पता है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर को पता है। सरकार के अपने अर्थशास्त्रियों को छोड़ अन्य अर्थशास्त्रियों को पता है। यहां तक कि अब रोज कमाने वाले और प्रवासी मजदूरों को भी पता है। उम्मीद रोजाना धुंधली पड़ रही थी; और अब यह उम्मीद पूरी तरह से खत्म हो गई है कि मोदी सरकार आर्थिक विकास को पुनर्जीवित करने में सक्षम होगी।
प्रधानमंत्री ने अच्छी सलाह सुनने के प्रति अनिच्छा दिखाई है, लेकिन मैं भी हार नहीं मानने वाला। प्रधानमंत्री का नया जंतर है 'फाइव आई' (इंटेंट, इनक्लूयशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर, इन्वेस्टमेंट और इनोवेशन, यानी इरादा, समावेश, ढांचा, निवेश और नवोन्मेष) लेकिन इसमें दो नहीं तो एक महत्वपूर्ण 'आई' शब्द गायब है। यह गायब तत्व है 'इन्कम'।
करीब 12.5 करोड़ लोगों ने पिछले तीन महीने के दौरान रोजगार खोया है। एआईएमओ का सर्वे दिखाता है कि 35 फीसदी एमएसएमई और 37 फीसदी स्वरोजगार से जुड़े लोगों ने बहाली की उम्मीद छोड़ दी है और वे अपने कारोबार बंद कर देंगे।
यह प्राथमिक अर्थशास्त्र है कि अकेले आय- लोगों के हाथों में पैसा-ही मांग को पुनर्जीवित करेगी; मांग आपूर्ति और उत्पादन को प्रोत्साहित करेगी; उत्पादन फिर से रोजगार पैदा करेगा और निवेश को प्रोत्साहित करेगा; और यह सब मिलकर वृद्धि को पुनर्जीवित करेंगे।
यह आर्थिक सिद्धांत मंदी के समय दोगुना वैध है, जिसकी ओर भारत 2020-21 में आगे बढ़ रहा है। माननीय प्रधानमंत्री से मैं आखिर में यह कहना चाहता हूं कि अपने मौजूदा आर्थिक सलाहकारों को हटाएं और एक नई टीम लेकर आएं, वह आपको सही सुझाव देगी।