भारत में पांच करोड़ किसान और 50 लाख कुशल एवं अकुशल मजदूर इस उद्योग से अपनी जीविका चलाते हैं। यह उद्योग सालाना 80 हजार करोड़ रुपये की आय पैदा करता है। भारत में 690 चीनी मिलें पंजीकृत हैं, जिनमें से 93 मिलें पांच पेराई सत्र से काम नहीं कर रही हैं अथवा बंद होने के कगार पर हैं। शेष 597 में से अनेक पूरे साल नहीं चलतीं। लगभग 529 पूरे साल चलती हैं। इनमें 30 करोड़ टन सालाना चीनी उत्पादन की क्षमता है। इन कुल चीनी मिलों में ज्यादातर सहकारी, 62 सरकारी और 29 निजी क्षेत्र की हैं। उत्तर प्रदेश में कुल 119 मिलों में से 95 निजी, 23 सहकारी व एक स्टेट शुगर मिल कॉरपोरेशन की हंै। भारत इस समय चीनी उपभोक्ता क्षेत्र में दूसरे स्थान पर है और विश्व में ब्राजील के बाद सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है।
गन्ना उत्पादक किसानों को दो बड़ी समस्याओं से जूझना पड़ता है। गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य और समय पर भुगतान इन किसानों की बड़ी समस्या है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्थान पर इसका नाम ‘फेयर एंड रिमुनरेटिव प्राइस’ (एफआरपी) कर दिया गया। कानून में संशोधन के बाद मूल्य निर्धारण का जो नया फॉर्मूला बनाया गया है, उसके तहत केंद्र सरकार गन्ने का खरीद मूल्य (एफआरपी) सीएसीपी, राज्य सरकार व चीनी मिल संगठनों से राय-मशविरा करके घोषित करती है और यह हमेशा राज्य सरकार द्वारा घोषित मूल्य (एसएपी) से कम होता है। यह पूरे देश के लिए समान होता है, जबकि हर क्षेत्र की प्रति हेक्टेयर गन्ना उत्पादन क्षमता एवं उससे होने वाली रिकवरी अलग-अलग है।
नीति आयोग के कार्यबल की रिपोर्ट ने गन्ना उत्पादकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस कार्यबल की लगभग सभी सिफारिशें चीनी मिल मालिकों के हक में हैं और किसानों की मुसीबतों में इजाफा करने वाली हैं। कार्यबल का निष्कर्ष है कि गन्ना उत्पादक किसान मुनाफे में हैं। दर्जनों किसान संगठनों द्वारा इसका संगठित विरोध शुरू हो चुका है। किसानों का मानना है कि इसमें मूल्य निर्धारण के समय मिल मालिकों का हित हावी होगा और समूची मूल्य निर्धारण प्रक्रिया बाजार के हवाले हो जाएगी। इस प्रावधान में रिकवरी रेट के साथ जुड़ी शर्तें किसानों को परेशान करने वाली है। किसान संगठनों का मानना है कि बिजली, डीजल, उर्वरक और श्रमिकों की मजदूरी में बढ़ोतरी आदि को देखते हुए छोटी-मोटी बढ़ोतरी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। नीति आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद किसान राज्य परामर्श मूल्य से भी हाथ धो बैठेगा।
कहने को गन्ने की फसल ‘नकदी’ कहलाती है। लेकिन किसानों को गन्ने का मूल्य पाने के लिए वर्षों इंतजार और काफी संघर्ष करना पड़ता है। अभी भी उत्तर प्रदेश की कई मिलों के बाहर किसान धरने पर बैठे हैं। गन्ना किसान को जितना समय और मेहनत फसल उगाने पर खर्च करना पड़ता है, लगभग उतना ही संघर्ष उसे उपज का मूल्य पाने के लिए करना पड़ता है। हालांकि शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर, 1966 (जिसे भार्गव फॉर्मूला भी कहते हैं) के अनुसार, गन्ना उत्पादक किसान जिस दिन अपना गन्ना मिल के गेट पर पहुंचा देता है, उसके 14 दिन के अंदर भुगतान मिल मालिक को करना जरूरी है, अन्यथा लंबित भुगतान 15 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देने का प्रावधान है लेकिन मिल मालिकों एवं सरकारी अफसरों की मिली-भगत के कारण इस आदेश पर कभी अमल नहीं होता है।
किसान को एक साल बाद भी अपना पैसा बिना ब्याज के ही मिलता है। नीति आयोग के कार्यबल की अनुशंसा के मुताबिक, गन्ना काफी लाभदायक फसल है। कार्यबल का मानना है कि अगर किसानों को गन्ने की कीमत का छह फीसदी अग्रिम भुगतान किया जाता है, तो यह उनकी पूरी लागत को कवर करेगा और उसी पर थोड़ा लाभ प्रदान करेगा। लखनऊ गन्ना रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, एक क्विंटल गन्ने की लागत 280 रुपये आंकी है, जबकि शाहजहांपुर गन्ना शोध संस्थान के मुताबिक एक क्विंटल गन्ने की लागत 301 रुपये है। ग्रामीण एवं कृषि संकट भी निरंतर बढ़ता जा रहा है। टाटा इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-2020 के बीच खेती से जुड़ी आय में गिरावट आई है। बजट सत्र में कृषि मंत्री ने माना है कि किसान परिवार की मासिक आमदनी 6,426 और मासिक खर्च 6,223 रुपये दर्ज की गई है।