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मुद्दा: औसत से ज्यादा वोटिंग क्यों नहीं होती , इस विडंबना की ये है वजह

इंद्रकांत मिश्र Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Wed, 22 May 2024 06:51 AM IST

सार

यह विडंबना ही कही जाएगी कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पंजीकृत मतदाताओं में से चालीस प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग ही नहीं करते।
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वोटिंग को लेकर महिलाओं के चेहरे पर दिखा उत्साह - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी


निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों की तरफ से मतदाताओं को मतदान के लिए जागरूक करने के तमाम  प्रयास किए जाते हैं। लोगों को अपने मताधिकार का उपयोग करने के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रेरित किया जाता है, लेकिन इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। कुछेक अपवादों को छोड़ दें, तो कभी वोटिंग औसत से ज्यादा नहीं बढ़ी। सिर्फ 2014 और 2019 में मतदाताओं ने उत्साह दिखाया था और औसतन 66 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ था।  


सवाल यह है कि ऐसे में क्या उपाय किए जाएं कि मतदाता मतदान करने के लिए प्रेरित हों। कम वोटिंग भारत ही नहीं, दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के लिए चिंता का विषय है। कई देशों ने मताधिकार का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया, तो कुछ देशों ने मतदान नहीं करने पर अलग-अलग तरह से दंड लगाने के कानून बनाए। हालांकि कुछ देशों ने बाद में व्यावहारिक परेशानियों के चलते इसे रद्द कर दिया।


सबसे पहले बेल्जियम ने 1892 में वोटिंग अनिवार्य करने का कानून बनाया। फिर अर्जेंटीना ने 1914 में और ऑस्ट्रेलिया ने 1924 में ऐसा ही कानून लागू किया। उसके बाद ऑस्ट्रिया, ब्राजील, मिस्र, फिजी, बुल्गारिया, बोलीविया, इटली, ग्रीस, फ्रांस (सिर्फ सीनेट), अमेरिका (कुछ राज्य), मैक्सिको, फिलीपीन, स्विट्जरलैंड, थाईलैंड, स्पेन, तुर्किये, वेनेजुएला, पेरू, पनामा आदि ने भी कानून बनाए। इनमें कुछ देशों ने कानून को आंशिक या पूर्ण रूप से रद्द कर दिया।


भारत की स्थिति कुछ भिन्न है। यहां कई बार वोटिंग अनिवार्य करने को लेकर लोकसभा में चर्चा हुई। यही निष्कर्ष निकला कि ऐसा करना व्यावहारिक नहीं होगा। इस संबंध में सबसे पहले चर्चा 1950 में तब शुरू हुई, जब जनप्रतिनिधित्व अधिनियम लागू किया जा रहा था। डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित संविधान सभा के कई सदस्यों ने इसे सिरे से नकार दिया। 1990 में दिनेश गोस्वामी कमेटी ने वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने के उपायों पर विचार करने के दौरान इसे अनिवार्य किए जाने पर भी गौर किया और अंततः इसे नामंजूर कर दिया। वर्ष 2001 में कंसल्टेशन पेपर ऑफ नेशनल कमीशन रिव्यू द वर्किंग ऑफ द कंस्टीट्यूशन ने इस मुद्दे पर विचार करने के बाद कहा कि वोट नहीं देने पर दंड का प्रावधान रखने से कई जटिलताएं पैदा होंगी। चुनावी खर्च को लेकर गठित तारकुंडे कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि वोटिंग अनिवार्य करने से मतदाताओं में रोष पैदा होगा और इसके दुरुपयोग की आशंका रहेगी। बेहतर होगा कि वोटरों को मतदान के लिए उत्साहित किया जाए।


लोकसभा में 2004 , 2009, 2012 एवं 2014 में प्राइवेट बिल पेश किए गए, लेकिन हर बार प्रस्ताव का विरोध हुआ।  वर्ष 2009 में इस पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका पेश की गई, जिसमें मताधिकार का उपयोग नहीं करने वाले के घर की बिजली, पानी आदि काटने और आर्थिक दंड लगाने की मांग की गई।  कोर्ट ने इसे बेहद अमानवीय बताकर याचिका खारिज कर दी। देश में चुनावों में अशिक्षित और अल्पशिक्षित मतदाताओं में मतदान को लेकर जितना उत्साह दिखता है, उतना प्रबुद्ध वर्ग में नहीं।  प्रबुद्ध वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आलस और अरुचि की वजह से घर से नहीं निकलता। वोटिंग लिस्ट में गड़बड़ी होना भी कम मतदान का एक कारण है। चुनाव से पहले मतदाता सूची को ठीक से अपडेट नहीं किया जाता और किया भी जाता है, तो उनमें कई त्रुटियां दिखती हैं। लोगों को शिकायत रहती है कि नाम शामिल करने, संशोधन आदि का फॉर्म बूथ लेवल अफसर (बीएलओ) को समय पर देने के बाद भी कुछ नहीं होता। यह विडंबना ही कही जाएगी कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पंजीकृत वोटरों में से 40 प्रतिशत वोट ही नहीं देते।

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