अस्सी के दशक तक गांवों में परती और बंजर जमीनें बची हुई थीं। बड़े-बड़े बाग-बगीचे बचे थे, जहां गंवई बच्चों के लिए खेलने-कूदने और दौड़ने की जगहें उपलब्ध थीं। खेती-किसानी के कार्य के लिए हर गांव में खलिहानें थीं, जहां छोटे बच्चे खेला करते थे। बढ़ती आबादी के कारण बाग-बगीचे कट गए। खलिहानें आबादी में बदल गईं।
पट्टे के रूप में बंजर और परती जमीनों के वितरण की अवैज्ञानिक नीतियों ने सार्वजनिक जमीनों को खत्म कर दिया। जिन गांवों में चकबंदी हुईं, वहां के बड़े काश्तकारों ने खेल मैदानों के लिए जमीनें छोड़ने का विरोध किया या कहीं-कहीं गड्ढे और खाइयों में थोड़ी-बहुत जमीनें खेल मैदान के नाम पर आरक्षित हुईं, जो कभी खेल का मैदान न बन सकीं। यही कारण है कि राजस्व अभिलेखों में कुछ गांवों में खेल के मैदान भले दर्ज हैं, जैसे कि बिहार और उत्तर प्रदेश में, मगर खेलने के लिए इनमें से अधिकांश मैदान मौजूद नहीं हैं।
पहले गांव-देहातों के स्कूल-कॉलेजों के पास भी खेल के मैदान थे, लेकिन अपनी आय जुटाने की बाध्यता के कारण खेल मैदानों पर दुकानें या भवन बनवा दिए गए। इस प्रकार हिंदी पट्टी के गांवों में न खेल मैदान बचे हैं और न वहां के स्कूल-कॉलेजों में। इसका परिणाम यह हुआ है कि गांव के बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हुआ है। बची-खुची बर्बादी मोबाइल की लत ने पूरी कर दी है। रील देखने, शराब या अन्य नशे में फंसे युवक गांव की पूरी संवेदना को कुतर रहे हैं। सृजनात्मक संस्कृतियों से उन्होंने किनारा कर लिया है।
विगत कुछ वर्षों में हिंदी पट्टी के तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने गांवों में खेल मैदान या स्टेडियम बनाने की बात कही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 2018 और 2022 में 57 हजार गांवों में खेल मैदान या स्टेडियम बनाने की बात की, तो बिहार के मुख्यमंत्री ने भी 5,681 ग्राम पंचायतों में खेल सुविधाओं को उपलब्ध कराने हेतु 63,827.35 लाख रुपये के बजट का प्रावधान किया, जिससे तीन तरह के खेल मैदान बनने थे। पहले प्रकार के मैदान चार एकड़ तक के, दूसरे प्रकार के एक से डेढ़ एकड़ तक के, और तीसरे प्रकार के मैदान एक एकड़ क्षेत्रफल से कम के बनने थे।
झारखंड के मुख्यमंत्री ने 10,788 गांव पंचायतों में 1.5 से 4 एकड़ जमीन में खेल मैदान बनाने की बात की थी। कहा तो यह जा रहा है कि वहां चालीस प्रतिशत गांवों में खेल मैदान बन चुके हैं, मगर हकीकत कुछ और है? मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 2005 में खेल नीति घोषित करते हुए 52,000 गांवों में खेल मैदान बनाने की बात की थी। यह बात 2009 और 2021 में भी दोहराई गई। अभी तक कागजों पर महज 263 गांवों में खेल के मैदान बने हैं। एक सच्चाई यह भी है कि झाबुआ के खवासा गांव में अस्सी लाख में बना स्टेडियम खिलाड़ियों को सुपुर्द किए जाने के पहले ही जर्जर हो चुका था।
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने 11,307 ग्राम पंचायतों में तीन से पांच एकड़ जमीन में और ब्लॉक स्तर पर छह से आठ एकड़ जमीन में स्टेडियम बनाए जाने की बात कही थी, मगर हकीकत यह है कि सीकर जिले के श्यामपुरा गांव में ग्रामीणों ने 2023 में अपने चंदे से एक स्टेडियम बनाने की शुरुआत की, क्योंकि यहां के युवक सेना में भर्ती की तैयारी के लिए खेल का मैदान चाहते थे।
विभिन्न राज्यों की घोषणाओं की शक्ल गुलाबी होते हुए भी जमीनी हकीकत कोसों दूर है। पूर्वांचल के तमाम गांवों में खेल मैदान नहीं हैं। दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्वी राज्यों को छोड़कर पूरी हिंदी पट्टी में खेल मैदानों का नदारद होना, खेल प्रतिभाओं को उभरने से रोक रहा है, साथ ही हिंदी पट्टी के बच्चों के मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। देखना यह है कि तमाम राज्यों की सकारात्मक घोषणाएं कब तक हकीकत में बदलती हैं।