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यह सिर्फ जेहाद है या फिर कुछ और

Tue, 26 Aug 2014 08:03 PM IST
क्षमा शर्मा
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करीब तीस साल पहले की बात है। मेरे दफ्तर में एक न्यूज एजेंसी में काम करने वाले और कई अखबारों में लिखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार आए हुए थे। उस दिन अपनी पसंद से शादी करने की बात चल रही थी, तो उन्होंने हम जैसे नई सोच के लड़के-लड़कियों का मजाक उड़ाते हुए कहा था, तुम जानते ही क्या हो- शकुंतला देवी से शादी करता है कोई मुसलमान और उनसे पैदा होते हैं शाकिर अली।
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आज वह सज्जन कहां हैं पता नहीं, लेकिन जब से 'लव जेहाद' की बात पर हंगामा शुरू हुआ है, तब से वह लगातार याद आ रहे हैं। यह लड़कियों के ऊपर अघोषित तानाशाही लादने जैसा है। वे किससे शादी करें, न करें, यह वे खुद तय करने का अधिकार नहीं रखतीं। उनके माता-पिता भी नहीं। यह तय करेंगे, राजनीतिक दलों के लोग। प्रमोद मुतालिक की श्रीराम सेना जैसी कोई सेना। आखिर उन लोगों को यह हक किसने दिया? पिछले दिनों केरल में जब चुनाव हुए थे, वहां के पूर्व मुख्यमंत्री और माकपा नेता वी  एस अच्युतानंदन ने हिंदू वोट पाने के लिए हिंदू लड़कियों का मुसलमानों से विवाह और धर्मांतरण का मुद्दा ही उठाया था।

राजनीतिक दलों की ऐसी भूमिका क्या लड़कियों के लिए नई खाप पंचायतें बनाकर धर्म के नाम पर नए सिरे से उनकी ऑनर किलिंग नहीं है? मौजूदा इन्फोटेनमेंट और टेक्नोसेवी युग में किसी को मिलने और बात करने से कैसे रोका जा सकता है? इसीलिए समय-समय पर पंचायतें लड़कियों के लिए फतवे और फरमान जारी करती रहती हैं कि लड़कियां मोबाइल इस्तेमाल न करें। जींस न पहनें। क्या प्यार को सांप्रदायिक रंग देना और धर्म के आधार पर दो संप्रदायों में जहर के बीज बोना ठीक होगा?
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तब क्या भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सिकंदर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी, शहनवाज हुसैन, फिल्मकार सलीम खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, इमरान खान, इम्तियाज अली आदि सभी ने लव जेहाद किया है, क्योंकि इन सभी की पत्नियां हिंदू हैं? भाजपा की नेता हेमा मालिनी वृंदावन की कार्य समिति की बैठक में मंच पर विराजमान थीं। वह शायद भूल गईं कि उन्होंने और धर्मेंद्र ने धर्म बदलकर ही विवाह किया था। तब इनमें से किसी को भी न अपने धर्म की याद आई थी और न पहली पत्नी और उसके बाल-बच्चों के अधिकारों की। आपत्ति थी, तो कुछ महिला संगठनों को, जिनका कहना था कि दूसरी शादी करने के लिए पुरुष अपना धर्म बदल लेते हैं, जो सरासर गलत है।

इन दिनों हमारे समाज में दो तरह की अतिवादी धाराएं दिख रही हैं। एक 'लिव इन' को ठीक मानती है। वह अविवाहित मातृत्व, साथी का चुनाव, पसंद के कपड़े, आना-जाना आदि को लड़की का ही अधिकार मानती है। दूसरी तरफ ऐसी बिरादरी फिर से तेजी से सिर उठा रही है, जो लड़कियों को धकेलकर दसवीं सदी में ले जाना चाहती है। किसी को भी इस दूसरी बिरादरी के मंसूबे पसंद नहीं आएंगे, चाहे पहली बिरादरी की भी कुछ बातों से असहमति हो।
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(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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