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स्वदेशी विमान वाहक क्यों जरूरी : देश की सुरक्षा पर खर्च और संसाधनों की जटिलताओं के मायने समझने होंगे

प्रशांत दीक्षित
Updated Sat, 03 Sep 2022 08:32 AM IST

सार

 भविष्य के आईएसी-II का मतलब होगा सात से ज्यादा वर्षों में 10 अरब डॉलर का खर्च, जबकि नौसेना का अपना पूंजी अधिग्रहण परिव्यय वर्ष 2021-22 के लिए लगभग आधा अरब डॉलर आंका गया है। छह अरब डॉलर आने वाले वर्षों में स्वदेशी पनडुब्बी परियोजना पर खर्च होंगे। 
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INS Vikrant - फोटो : PTI


यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी छलांग है। लड़ाकू विमानों के चयन और कुछ विशेष आत्मसुरक्षा प्रौद्योगिकियों के साथ यह हमारी कल्पनाओं के अनुसार परिचालित होगा। हालांकि अब भी यह मौजूदा मिग 29 लड़ाकू विमान और एएलएच ध्रुव हेलीकॉप्टरों आदि के साथ संचालन करने में सक्षम है। चूंकि हमारे पास रूस से खरीदा गया विमान वाहक पोत विक्रमादित्य (एडमिरल गोर्शकोव) पहले से है और अब आईएनएस विक्रांत भी तैयार हो गया है, इसलिए अब तीसरे विमान वाहक पोत की चर्चा भी गर्माने लगी है। 


हालांकि इसको लेकर दो तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं-मधुर से लेकर कर्कश तक। असल में दो तरह के विचार हैं। एक समूह बहुत गंभीरता से स्वदेशी विमान वाहक-II पर काम शुरू करने की पैरवी कर रहा है, क्योंकि आईएनएस विक्रांत पर काम पूरा हो गया है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में निर्मित स्वदेशी आईएनएस विक्रांत के 2023 में चालू होने की संभावना है, क्योंकि इस विमान वाहक पोत के लिए अभी विमानों का चयन होना बाकी है और अन्य पोतों पर तैनात हथियार प्रणालियों की खबर आगे बढ़ाना बाकी है, लेकिन दृढ़ विश्वास है कि आईएसी-II पर मौजूदा गतिविधियां उपलब्ध सक्रिय चक्र के लिए पर्याप्त होंगी। 


यह रूस से खरीदे गए आईएनएस विक्रमादित्य को पाने के दौरान लागत में भारी वृद्धि, बातचीत की जटिलताएं, देर से वितरण व कमिशनिंग और अब समय-समय पर मरम्मत के कारण हुए दर्दनाक अनुभवों को दूर करने में भी मददगार होगा। इसके अलावा, एक प्रमुख तर्क यह है कि आईएनएस विक्रांत को तैयार करने में कोचीन शिपयार्ड को अपने संतोषजनक कार्य से जो अनुभव प्राप्त हुए हैं, उसे बेकार नहीं जाने देना चाहिए। 


यह आखिरकार 'रणनीतिक प्रौद्योगिकियों के साथ रणनीतिक सामग्रियों को संभालने का रणनीतिक ज्ञान' है, जो चीन द्वारा अपने तीसरे विमान वाहक पोत के उत्पादन को देखते हुए महत्वपूर्ण है। खबरों की मानें, तो कोचीन शिपयार्ड 70,000 टन तक के विमान वाहक पोत को संभाल सकता है। यह सब अपने समुद्री क्षेत्र में नियंत्रण और वर्चस्व के लिए भारत की सर्वोपरि चिंता से उपजा है। 


स्वतंत्र भारत को यह बताने में आधी सदी से भी अधिक समय लगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य और मलक्का के बीच हिंद महासागर का इलाका उसकी सामरिक चिंताओं का क्षेत्र है। हालांकि, इसे औपनिवेशिक ब्रिटिश अर्थव्यवस्था और ब्रिटिश राज की रणनीतिक अखंडता के लिए महत्वपूर्ण माना गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति और भारत द्वारा बाजार-अर्थव्यवस्था को अपनाने से भले ही हमारी नीति में तेजी आई हो, लेकिन संघर्ष मुक्त क्षेत्र के रूप में समुद्र की अवधारणा और संचार के समुद्री मार्गों के जरिये समुद्र की स्वतंत्रता हमेशा गंभीर सुरक्षा मुद्दे थे। 


और यह स्थिति चीनी शासन द्वारा बंगाल की खाड़ी में बंदरगाहों पर प्रभावी नियंत्रण हासिल करने, अफ्रीका के हॉर्न में एक सैन्य अड्डे का निर्माण करने, हिंद महासागर में अपने आक्रमण जारी रखने और सबसे बढ़कर दक्षिण चीन सागर में बेहद प्रतिकूल आचरण जारी रखने से काफी बढ़ गई है। हिंद महासागर को ताकत की होड़ और समुद्री डकैतियों से मुक्त रखना था। 
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दूसरे समूह का दृष्टिकोण ठीक इसके विपरीत है, जो खर्च और संसाधनों पर आधारित है। भविष्य के आईएसी-II का मतलब होगा सात से ज्यादा वर्षों में 10 अरब डॉलर का खर्च, जबकि नौसेना का अपना पूंजी अधिग्रहण परिव्यय वर्ष 2021-22 के लिए लगभग आधा अरब डॉलर आंका गया है। छह अरब डॉलर आने वाले वर्षों में स्वदेशी पनडुब्बी परियोजना पर खर्च होंगे। 


करीब चार अरब डॉलर आईएसी-I यानी आईएनएस विक्रांत के लिए लड़ाकू विमानों की खरीद पर खर्च किए जाने का अनुमान है। इसलिए यह सवाल पूछा जा रहा है कि पैसा कहां से आएगा। यहां तक कि रक्षा एवं सुरक्षा निधि के सभी संसाधनों को एक साथ मिला दिए जाने पर भी भारत के पास पूंजी की कमी हो जाएगी। इस मोड़ पर हम आईएसी-II के अधिग्रहण के संबंध में वांछनीयता और अवांछनीयता पर विचार करने लगते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि यदि ठीक से इसका प्रबंधन करें, तो यह संभव है। 


ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'दुनिया भर में बढ़ रहे क्षेत्रीय विवादों के साथ, विमान वाहक पोत विश्व स्तर पर उच्च मूल्य वाली युद्ध संपत्ति बन गए हैं।' खतरे के स्तर पर एक विमान वाहक पोत को पनडुब्बी वाले समुद्र में ज्यादा असुरक्षित माना जाता है, जिसे अक्सर चीनी पनडुब्बियों के स्वतंत्र विचरण के रूप में सूचित किया जाता है। हालांकि ये आशंकाएं वास्तविक हैं, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के कई उदाहरण हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रौद्योगिकियों के विकास के साथ पनडुब्बियों का सटीक पता लगाने की कला विकसित हुई है। 


ये उपकरण न केवल पनडुब्बियों का मुकाबला करते हैं, बल्कि विमान वाहक के साथ चल रही नौकाओं पर भी नजर रखते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि पनडुब्बी रोधी विमान पी 8-I भारत के समुद्री बल का एक अविभाज्य सहायक है। भारतीय विमान वाहक पोतों पर सबसे तीखी आलोचना इस आधार पर की जाती है कि उन्होंने भारत के युद्ध इतिहास में अनुरूप योगदान नहीं किया। पर यह सच नहीं है। पाकिस्तान ने जब 1971 में युद्ध की घोषणा के बाद उत्तर-पश्चिम के कुछ भारतीय हवाई क्षेत्रों पर हमला किया, तो आवश्यक मरम्मत के बाद पहला आईएनएस विक्रांत तीन दिसंबर की मध्यरात्रि को रवाना हुआ था। 


उसे पूर्वी पाकिस्तान के तट पर बंगाल की खाड़ी में तैनात किया गया था। पनडुब्बी के खतरे के बावजूद ऑपरेशन जारी था और खतरे को बेअसर कर दिया गया। पहले आईएनएस विक्रांत से 10 दिनों में विमानों द्वारा लगभग 300 आक्रामक उड़ानें भरी गईं। कई बाधाओं के बावजूद, पहले आईएनएस विक्रांत और उसके विमानों ने बांग्लादेश की मुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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