नवंबर, 2020 में मिली हार के बावजूद, उन्होंने यह कहना जारी रखा कि चुनाव में धांधली हुई थी और अदालती मामले उनके खिलाफ सुनियोजित साजिश हैं। दो महाभियोग, 24 घोर आपराधिक मामलों के आरोप, सेक्स स्कैंडल, वर्गीकृत दस्तावेजों के अनधिकृत हस्तांतरण के आरोपों के बावजूद, ट्रंप झुके नहीं, उन्होंने तमाम बाधाओं का सामना करते हुए लड़ना जारी रखा और अंततः जीत हासिल की। इन सबसे उनकी लोकप्रियता और उनके कट्टर समर्थकों पर उनकी जादुई पकड़ कम नहीं हुई।
दक्षिण एशियाई देश भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हमारे पास ऐसी महिला नेता रही हैं, जिन्होंने अपने देश का वर्षों तक नेतृत्व किया। पश्चिमी दुनिया में भी कई महिला नेताओं ने अपनी सरकारों की कमान संभाली है, लेकिन अमेरिका में नहीं। कमला हैरिस को दोहरी बाधा का सामना करना पड़ा : एक तो वह महिला हैं, दूसरा अश्वेत, एशियाई और कैरेबियाई मूल की हैं। दस सितंबर को डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई बहस में कमला एकदम विजेता बनकर उभरीं। उन्होंने बिना आपा खोए सभी जवाब बड़ी ही संजीदगी के साथ दिए और ट्रंप की तरह अाप्रवासियों को कुत्ता-बिल्ली और जानवर खाने वाला बताने जैसी अप्रिय भाषा का इस्तेमाल भी नहीं किया। उन्होंने लोकतंत्र को बचाने, विभाजनकारी मानसिकता को नकारने और बेहतर भविष्य के लिए मतदान करने की अपील की। उन्होंने महिलाओं के गर्भपात अधिकार के लिए झंडा उठाया, अति धनाढ्यों पर कर लगाने तथा कम आमदनी वालों, मध्यम वर्ग, छोटे व्यवसायों और दैनिक वेतनभोगियों की मदद करने का वादा किया था। उन्होंने निश्चित क्षेत्रों की यूनियनों का समर्थन भी किया। लेकिन चुनाव परिणामों ने बता दिया कि उनकी आदर्शवादी बातें मतदाताओं को ज्यादा रास नहीं आईं। दूसरी ओर, ट्रंप के समर्थकों ने लोकतांत्रिक मानदंडों पर उनकी सभी गलतियां माफ कर दीं।
कमला की हार में योगदान देने वाले कई कारण रहे। कमला की हार का सबसे बड़ा कारण तो राष्ट्रपति बाइडन थे। वह बेमन से राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर हुए और कमला का समर्थन तब किया, जब काफी देर हो चुकी थी। हैरिस को चुनाव अभियान के लिए करीब तीन महीने का समय मिला, जो एक तरह से समय के विपरीत दौड़ लगाना था। चालीस फीसदी रेटिंग के साथ बाइडन अलोकप्रिय राष्ट्रपति थे। बाइडन की सभी सत्ता विरोधी लहरों ने कमला के जहाज को डुबो दिया। जब उनसे पूछा गया कि वह बाइडन से अलग क्या करेंगी, तो कोई प्रभावी जवाब नहीं दे सकीं। यद्यपि वृहद स्तर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था ज्यादातर यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर कर रही है, महंगाई घटी है, बेरोजगारी बहुत कम है, लेकिन भवन निर्माण लागत और किराने की बढ़ती कीमतों ने जमीनी स्तर पर उनको नुकसान पहुंचाया। दूसरी ओर, ट्रंप द्वारा अाप्रवासियों को दुष्कर्मी, अपराधी और स्थानीय लोगों की नौकरियां छीनने वाला बताया गया, जिससे मतदाताओं के मन में आप्रवासियों को लेकर डर का माहौल निर्मित हुआ।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने सामान्य कमेरे वर्ग की नब्ज पर अपनी पकड़ खो दी। ओपरा विन्फ्रे, लेडी गागा, बियॉन्सी, जेनिफर लोपेज और टेलर स्विफ्ट समेत अन्य हॉलीवुड हस्तियां भी इस वर्ग को प्रभावित नहीं कर सकीं और हैरिस के खिलाफ मतदान किया। जबकि श्वेत और अश्वेत, पुरुष मतदाताओं ने ट्रंप को करीब 54 फीसदी वोट दिए। हैरिस के लिए लातिन और भारतीय अमेरिकियों का समर्थन भी घट गया। इस्राइल-हमास-हिजबुल्ला-ईरान के बीच चल रहे संघर्ष से निपटने में नाकामी, विशेष रूप से गाजा में हजारों फलस्तीनियों की हत्या ने अरब अमेरिकियों को नाराज किया और उन्होंने हैरिस के विरोध में मतदान किया। हालांकि महिलाओं ने उन्हें वोट दिए, लेकिन महिलाओं के प्रजनन अधिकारों पर हैरिस का जोर बाजी पलटने वाला साबित नहीं हुआ।
सभी आयातों पर ट्रंप द्वारा दस से बीस फीसदी टैरिफ लगाने और आप्रवासियों के एच1बी वीजा पर सख्ती से भारत भी प्रभावित हो सकता है। हालांकि भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों और हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ट्रंप के अच्छे रिश्ते यहां काम आ सकते हैं। वहीं, पेरिस जलवायु समझौते से ट्रंप की संभावित वापसी एक झटका होगी। चीन के साथ उनका टैरिफ युद्ध चीन और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बुरा होगा। हालांकि ट्रंप के पहले कार्यकाल को देखते हुए रूस ने कुछ राहत की सांस ली होगी और उम्मीद है कि यूक्रेन के साथ युद्धविराम का रास्ता खुलेगा। लेकिन ट्रंप की इस्राइल समर्थक नीतियों को देखते हुए लेबनान और गाजा में युद्धविराम की संभावना कम दिखती है। लेकिन वह समझते हैं कि उनके द्वारा समर्थित अब्राहम समझौते (अरब-इस्राइल सामान्यीकरण) का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक कि वह पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त नहीं करा देते। अमेरिका प्रथम की नीति के तहत ट्रंप के आने से डब्ल्यूटीओ व नाटो को झटका लग सकता है, तो ईरानी नेतृत्व को बुरे सपने आ रहे होंगे। जीत के बाद दिए गए ट्रंप के भाषण वाले मंच पर एलन मस्क की मौजूदगी कॉरपोरेट जगत पर भी असर डाल सकती है। खैर देखना होगा कि अमेरिका को फिर से महान बनाने के अपने बहुप्रचारित संदेश पर ट्रंप कितने खरे उतरते हैं।