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ईरान की यह मंशा तो पूरी नहीं होगी: दबाव बना सकता है, लेकिन होर्मुज से स्थायी टोल वसूली आसान नहीं

जेनिफर पार्कर, प्रोफेसर, वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 04 Jul 2026 07:45 AM IST

सार

अंतरराष्ट्रीय कानूनों को दरकिनार कर दें, तो भी होर्मुज की भौगोलिक स्थिति स्वेज व पनामा नहरों से अलग है। भले ही ईरान कुछ समय के लिए जहाजों के आवागमन को बाधित कर दे, लेकिन लंबे समय तक होर्मुज जलडमरूमध्य पर स्थायी टोल व्यवस्था लागू कर पाना उसके क्या, किसी के लिए भी संभव नहीं है।
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होर्मुज जलडमरूमध्य - फोटो : hormuztracking.com


यह आशंका इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि संघर्ष शुरू होने के बाद से ईरान लगातार इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर अपना प्रभाव मजबूत करने के संकेत देता रहा है। तनाव को और बढ़ाने वाली बात अंतरिम समझौते की वह शर्त भी बनी, जिसमें 60 दिनों तक व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षित और बिना किसी शुल्क के आवाजाही सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इसी के साथ, भविष्य में ओमान और अन्य खाड़ी देशों के साथ नई समुद्री व्यवस्था पर चर्चा का भी उल्लेख है, जो चिंता का एक और कारण है। इससे यह सवाल उठने लगा कि क्या ईरान भविष्य में किसी प्रकार का टोल लागू करने की योजना बना रहा है।


हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून इस संभावना को लगभग खारिज कर देता है। दरअसल, होर्मुज कोई कृत्रिम नहर नहीं है, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य है। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून के अनुसार भी, होर्मुज जलडमरूमध्य एक वैश्विक समुद्री मार्ग है, जहां सभी देशों के जहाजों को निर्बाध आवाजाही का अधिकार प्राप्त है। कोई भी तटीय देश इस अधिकार को निलंबित नहीं कर सकता। बेशक जलडमरूमध्य का कुछ हिस्सा ईरान के क्षेत्रीय जलक्षेत्र में आता है, लेकिन जहाजों के लिए निर्धारित मुख्य ट्रैफिक सेपरेशन स्कीम (समुद्री यातायात का निर्धारित मार्ग) ओमान के जलक्षेत्र में स्थित है। यह मार्ग अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) द्वारा सुरक्षित और व्यवस्थित समुद्री यातायात के लिए तय किया गया है। यही कारण है कि मौजूदा तनाव और राजनीतिक दावों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ईरान के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर कानूनी रूप से टोल लगाना बेहद कठिन माना जा रहा है।


पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि ईरान द्वारा टोल लगाना संभव है, क्योंकि दुनिया में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं। स्वेज और पनामा जैसी नहरों से गुजरने वाले जहाज तय शुल्क, यानी टोल चुकाते हैं। पर, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति इन नहरों से बिल्कुल अलग है। स्वेज और पनामा जैसी नहरें किसी एक देश के अधिकार क्षेत्र में आती हैं और उनका रास्ता बेहद संकरा तथा पूरी तरह नियंत्रित होता है। उदाहरण के लिए, स्वेज नहर का नौवहन मार्ग सामान्यतः करीब 200 मीटर चौड़ा है। इसके विपरीत, होर्मुज जलडमरूमध्य अपनी सबसे संकरी जगह पर भी लगभग 39 किलोमीटर चौड़ा है और इसका हिस्सा ईरान तथा ओमान, दोनों के समुद्री क्षेत्र में आता है। ऐसे में, इतने बड़े समुद्री क्षेत्र में उन जहाजों को रोकना, उनकी जांच करना और उन पर नियंत्रण रखना आसान नहीं है, जो टोल देने से इन्कार कर दें। टोल घोषित करना एक बात है, लेकिन उसे हर जहाज से वसूल पाना बिल्कुल अलग चुनौती है। स्वेज नहर में प्रवेश करने वाले जहाज उत्तर में पोर्ट सईद या दक्षिण में स्वेज बंदरगाह से प्रवेश करते हैं। इसके बाद स्वेज नहर प्राधिकरण के पायलट जहाज पर सवार होते हैं और सभी जहाज तय नियमों के तहत नियंत्रित काफिले में यात्रा करते हैं। इसी वजह से स्वेज नहर जैसी सीमित और पूरी तरह नियंत्रित व्यवस्था में नियमों का पालन किए बिना या टोल चुकाए बिना किसी जहाज का गुजरना लगभग असंभव होता है। दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय कानून को अलग भी रख दें, तब भी यह संभावना बहुत कम ही है कि शिपिंग कंपनियां और देश किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए स्थायी टोल को स्वेच्छा से स्वीकार करेंगे। यह सिर्फ अतिरिक्त खर्च का मामला नहीं है। असली चिंता समुद्री आवाजाही की आजादी और दुनिया के अन्य अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों के लिए बनने वाली खतरनाक मिसाल की है। ईरान जहाजों से किसी सेवा के बदले शुल्क नहीं लेना चाहता, जैसा स्वेज या पनामा नहर में होता है। वह उस अधिकार के इस्तेमाल पर शुल्क लेना चाहता है, जो जहाजों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पहले से ही जलडमरूमध्य से निर्बाध रूप से गुजरने के लिए प्राप्त है। ओमान और खाड़ी के कई देशों ने भी चेताया है कि यदि ऐसा कदम उठाया गया, तो समुद्र में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही प्रभावित होगी और यह भविष्य के लिए एक गलत मिसाल बन जाएगी। ऐसी स्थिति में, जहाजरानी कंपनियों से जबरन शुल्क वसूलने या उन पर दबाव बनाने की नौबत आ सकती है। पर, स्वेज व पनामा नहरों की तुलना में होर्मुज जलडमरूमध्य कहीं अधिक विशाल और नियंत्रण के लिहाज से कठिन है। इसलिए, वहां इस प्रकार के नियमों को लागू कराना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।


मौजूदा टकराव के दौरान, ईरान ने हथियारों के दम पर जहाजों की आवाजाही को रोका है, जिसमें बेगुनाह नाविक मारे गए हैं और वैश्विक व्यापार में बाधा आई है। कई बार अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया धीमी या सीमित रही है, लेकिन शांति के समय स्थायी टोल व्यवस्था लागू कराने के लिए इस तरह की कार्रवाई कोई टिकाऊ या प्रभावी तरीका नहीं मानी जाती। यदि संघर्ष समाप्त होने के बाद भी ईरान निर्दोष व्यावसायिक जहाजों पर हमले जारी रखता है, तो उसे चीन सहित कई देशों के कड़े कूटनीतिक दबाव, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में, यह संभावना बेहद कम है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ जाकर जहाजों से स्थायी रूप से टोल वसूल सके। ऐसा इसलिए, क्योंकि न तो उसके पास ऐसा करने की पर्याप्त वजह होगी और न ही जहाजों को इस तरह का शुल्क चुकाने के लिए मजबूर करने की प्रभावी क्षमता या प्रवर्तन तंत्र।


असल में, ईरान फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले जहाजों के आवागमन को बाधित करने में मिली अपनी कामयाबी को बातचीत में एक दबाव के हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन, दबाव बनाना और लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना, दोनों अलग बातें हैं। इसलिए, भले ही ईरान कुछ समय के लिए जहाजों के आवागमन को बाधित कर ले, लेकिन लंबे समय तक होर्मुज जलडमरूमध्य पर स्थायी टोल व्यवस्था लागू कर पाना उसके लिए संभव नहीं है। 

-द कन्वर्सेशन
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