मूसलाधार बारिश से सिर्फ किसानों के चेहरे ही नहीं खिल रहे। इस वर्षा से सृष्टि के समस्त प्राणियों के मन अलग-अलग कारणों से मयूर की भांति नाच उठे हैं। प्रशासन द्वारा बाढ़ से निपटने के लिए किए गए पुख्ता इंतज़ामों की कलई शीघ्र ही खुलने की उम्मीद से विपक्षी नेताओं की बांछें खिल गई हैं। सरकारी स्कूलों में जीर्ण-शीर्ण छत के नीचे बैठकर अपना भविष्य संवारने वाले बच्चे इस मौसम में नित्य प्रति होने वाली छुट्टी के रोमांच से अति उत्साहित हैं।
जहां एक ओर कॉलेजों में ज्ञान अर्जित करने वाले नौजवानों के लिए ‘भीगा बदन जलने लगा’ टाइप गीतों की सत्यता जांचने- परखने की चिर प्रतीक्षित घड़ी आ गई है, वहीं भीषण गर्मी में अल्ट्रा वायॅलेट सूर्य किरणों से जैसे-तैसे कमसिन हसीनों के चेहरों को अब तक बचाते आए छातों की मान-प्रतिष्ठा पुनः दांव पर लगी है। इस बार उनका सामना बारिश की तेज बौछारों से है।
बिजली के लंबे-लंबे घोषित-अघोषित कट्स के विरोध में धरना-प्रदर्शन कर रहे जन सामान्य के आक्रोश से त्रस्त विद्युत विभाग के अधिकारियों ने अब जाकर राहत की सांस ली है। इंद्र देवता के मेहरबान होते ही बिजली संकट से जूझ रही विभिन्न राज्य सरकारों की और अधिक फजीहत होने से बच गई है। पिछले काफी समय से प्राकृतिक विपदा के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठी कुछ दुष्ट आत्माओं की कुम्हलाई आशाओं की पौध को बरखा रानी ने पुनः संजीवनी बूटी सुंघा दी है। आइसक्रीम की दुकान पर उमड़ी भीड़ देख मन ही मन जल-भुनकर राख हुआ पकौड़े वाला मौसम के अंगड़ाई लेते ही गुनगुनाने लगा है-दुख भरे दिन बीते रे भैया, ग्राहक आयो रे!
सरकार ने भी राहत की सांस ली है कि मानसून सत्र से पहले देश भर में भरपूर बारिश हो रही है। नहीं तो सूखे के मौसम में संसद के मानसून सत्र की भद नहीं पिट जाती! विभिन्न दलों के सांसद भी खुश हैं कि मानसून सत्र में संसद में भले ही भीषण गर्मी हो, लेकिन बहिष्कार और बर्हिगमन के कारण उन्हें गाहे-बगाहे छुट्टी का आनंद मिलता रहेगा।