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अंतरराष्ट्रीय संबंध: ट्रंप के शासनकाल में लाखों भारतीयों को जूझना पड़ सकता है, उच्च स्तरीय कूटनीति की जरूरत

केएस तोमर
Updated Sat, 01 Feb 2025 05:44 AM IST

सार

राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप की दूसरी पारी ने अवैध आप्रवासन की बेहद ध्रुवीकृत बहस को फिर से गर्मा दिया है। अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीयों को आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है। उम्मीद है कि भारत इस जटिल मुद्दे का कूटनीतिक समाधान निकाल लेगा।
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


अवैध आप्रवासन के मुद्दे की प्रकृति बहुत ही जटिल है। अमेरिका में अवैध आप्रवासी आबादी में मेक्सिको, मध्य अमेरिका, भारत, चीन और फिलीपींस समेत अन्य देशों के लोग शामिल हैं। लैटिन अमेरिका के आप्रवासी अक्सर अवैध रूप से सीमा पार कर आते हैं, जबकि अधिकांश गैर-दस्तावेजी भारतीय अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने के बजाय अपने वीजा की अवधि से अधिक समय तक वहां रहते हैं।


इस मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन का दृष्टिकोण आक्रामक है। इन योजनाओं में लाखों गैर-दस्तावेजी आप्रवासियों को लक्षित करना शामिल है, चाहे वे किसी भी तरह से आए हों। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो वीजा अवधि समाप्त होने के बाद रुके रहे। शरण चाहने वालों को रोकने के लिए सख्त प्रतिबंधित कानून लागू किए जाएंगे, विशेषकर जो अमेरिका-मेक्सिकाे सीमा पार करते हैं। इस नीति के सबसे विवादास्पद पहलुओं में एच-1बी वीजा कार्यक्रम में प्रस्तावित बदलाव हैं, जो मुख्य रूप से भारतीय नागरिकों को प्रभावित करते हैं। इन सुधारों को अमेरिका में कुशल आप्रवासियों के प्रवेश को सीमित करने की खातिर प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग क्षेत्रों को लक्षित करने के लिए तैयार किया गया है, जहां भारतीय कार्यबल बड़ी संख्या में है।


ऐसी नीतियां भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे और तात्कालिक तौर पर प्रभावित करेंगी। अकेले वर्ष 2022 में अमेरिका में रहने वाले आप्रवासी भारतीयों ने 12 अरब डॉलर भारत भेजे थे, जो उनके परिजनों की आय का अहम स्रोत है। इतनी महत्वपूर्ण आबादी के निर्वासन से न केवल भारत में उनके परिवार, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दबाव पड़ेगा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, जो उनके द्वारा भेजे धन पर निर्भर हैं।


इसके अलावा, कई गैर-दस्तावेजी योग्य पेशेवर और विद्यार्थी, जो योग्यता के बावजूद अमेरिका में स्थायी नागरिकता पाने में असमर्थ हैं, खुद को कानूनी उलझनों में फंसा हुआ पाते हैं। ऐसे लोगों के सामूहिक निर्वासन से भारत के उद्योगों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र में, जहां भारत पहले से ही कार्यबल की पर्याप्तता और अल्परोजगार से संबंधित चुनौतियों का सामना कर रहा है। बड़ी संख्या में कुशल लोगों के भारत लौटने से देश में बेरोजगारी और अल्परोजगार में वृद्धि हो सकती है, जो पहले ही चरम पर है।


सामूहिक निर्वासन के त्वरित आर्थिक प्रभाव के अलावा, गंभीर सामाजिक परिणाम भी होंगे। कई परिवारों को अमेरिका में जन्मे बच्चे से विनाशकारी अलगाव का सामना करना पड़ेगा, तथा बच्चे जटिल कानूनी परिस्थितियों में फंसकर रह जाएंगे। अमेरिका में पले-बढ़े इन बच्चों के जीवन और भविष्य पर भयानक व्यवधान पड़ सकता है। इसके अलावा, निर्वासितों को भारतीय समाज में फिर से घुलने-मिलने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।  विशेष रूप से महिलाएं और बच्चे असमान रूप से प्रभावित होंगे।


भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंध काफी मजबूत हैं, जो साझा आर्थिक, रणनीतिक और रक्षा हितों पर आधारित हैं। जब अमेरिका से बड़े पैमाने पर भारतीय नागरिकों को निकाला जाएगा, तो इससे भारत-अमेरिका के संबंधों में तनाव की आशंका है। भारत संभवतः उच्च स्तरीय कूटनीतिक वार्ता में शामिल होगा, ताकि अमेरिकी सरकार को निर्वासन के लिए अधिक संतुलित और चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाने के लिए राजी किया जा सके।
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विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ऐसे सुधारों पर जोर दे सकता है, जिससे बिना दस्तावेज वाले भारतीयों को सामूहिक निर्वासन के बजाय अपने वीजा को नियमित करने में मदद मिलेगी। इसके अतिरिक्त, कुशल श्रमिकों के लिए अधिक शिथिल वीजा मानदंडों की वकालत करना, अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना एक रणनीतिक कदम होगा कि अमेरिका कुशल भारतीय श्रमिकों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना रहे। अगर कुशल भारतीय कहीं और रोजगार तलाशने लगेंगे, तो अमेरिका की वैश्विक प्रतिस्पर्धी स्थिति कमजोर हो सकती है।


हालांकि ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीतियां साहसिक हैं, लेकिन उन पर अमल करना चुनौतीपूर्ण है। पहले से ही अमेरिकी आव्रजन अदालतों में निर्वासन के 18 लाख मामले लंबित हैं। इससे निर्वासन प्रक्रिया में देरी हो सकती है। साथ ही निर्वासन प्रक्रिया की लागत भी बहुत ज्यादा है। इसके अलावा, जो राज्य और शहर शरण नीतियों का समर्थन करते हैं, वे इसका विरोध कर सकते हैं, जिससे अधिकार क्षेत्र संबंधी संघर्ष पैदा हो सकते हैं और कानूनी चुनौतियों में वृद्धि हो सकती है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था अाप्रवासी श्रम पर बहुत अधिक निर्भर है, विशेष रूप से कृषि, निर्माण और आतिथ्य जैसे क्षेत्रों में, जिससे उत्पादकता बाधित हो सकती है और आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव पड़ सकता है।


चूंकि ट्रंप अपने फैसलों पर अडिग हैं, इसलिए भारत को बड़ी संख्या में निर्वासित लोगों की वापसी से संबंधित चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत सरकार को एकीकरण कार्यक्रमों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिससे लौटने वाले प्रवासियों को श्रम बाजार में उपयुक्त रोजगार खोजने में मदद मिलेगी। इस संबंध में भारतीय विदेश मंत्रालय ने सक्रियता दिखाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप से बात कर भारत और अमेरिका के संबंधों को और मजबूत करने की पहल की है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कहा है कि अवैध आप्रवासन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी वही करेंगे, जो सही होगा। इसी महीने प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका जा सकते हैं, जहां अवैध आप्रवासन के मुद्दे पर सकारात्मक बातचीत की संभावना है। भारत हर तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है।    

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