प्रधानमंत्री का आखिरी भाषण था वाशिंगटन में और हम पत्रकार उस शहर के ऐतिहासिक विलार्ड होटल में स्थित 'मीडिया रूम' में बैठकर फैसला कर रहे थे-जाएं या न जाएं। एक अधिकारी ने कहा कि हम आपको वेन्यू तक पहुंचा तो सकते हैं, लेकिन अंदर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी हम नहीं ले सकते, क्योंकि यूएसआईबीसी वालों ने पहले से कह रखा है कि हॉल के अंदर जगह थोड़ी है। इस नसीहत को सुनते ही कई लोगों ने न जाने का फैसला कर लिया।
विशाल एंड्रयू मेलन सभागार तक हमें पहुंचाया गया और किसी न किसी तरह हम खचाखच भरे हॉल के अंदर घुस गए, जहां इकट्ठा हुए थे इस शहर के धनवान। यूएसआईबीसी का पूरा नाम है यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल और इसके सदस्य हैं दोनों देशों के सबसे बड़े उद्योगपति। अंदर पहुंचने के बाद मुझे बरखा दत्त के बगल में खाली कुर्सी मिली और फिर शुरू हुआ दो घंटे का इंतजार। प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम बदलकर मार्टिन लूथर की समाधि पर अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ जाने का फैसला किया था। अंततः जब वह पहुंचे, तो पहले मिलने गए उन वीआईपी उद्योगपतियों से, जो भारत से आए थे। हमारे पीछे टीवी कैमरा वालों की जो टोली थी, उनमें से कइयों ने चूं-चूं करना शुरू कर दिया, क्योंकि वे घंटों से भूखे-प्यासे थे। हमने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री के उपवास का सातवां दिन है। इसी बात को लेकर अमेरिकी अखबारों में कई बार नरेंद्र मोदी सुर्खियों में रहे हैं पिछले दिनों।
आखिर में जब प्रधानमंत्री पहुंचे, तो उन्होंने वह भाषण दिया, जो दौरे का सबसे महत्वपूर्ण भाषण था मेरी राय में। उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक दिशा को बदलने का उनका पक्का इरादा है। भाषण शुरू किया इन शब्दों से, 'भारत का आर्थिक दृष्टि से पीछे रहने का एक भी कारण नजर नहीं आता है मुझे।' उन्होंने स्वीकार किया कि लालफीताशाही और 'टैक्स टेररिज्म' ने निवेशकों के लिए माहौल खराब किया है पिछले कुछ वर्षों में। लेकिन अब 'वक्त बदल चुका है।' आश्वासन दिया प्रधानमंत्री ने एकत्रित उद्योगपतियों को कि अगले छह महीनों में वे देख सकेंगे कि किस तरह आर्थिक दिशा बदलनेवाली है भारत में।
भाषण खत्म होने के बाद 'थैंक्यू अमेरिका' कहकर प्रधानमंत्री सीधे एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। हम लोग अन्य मेहमानों से बातें करने लगे भाषण पर प्रतिक्रिया मालूम करने के लिए। ज्यादातर लोगों ने मुझे कहा कि उनमें भारत के प्रति एक नया विश्वास तो जाग उठा है, लेकिन अभी चिंता है कि जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं, उनके मंत्री समझ नहीं पाए हैं। एक उद्योगपति दोस्त ने मुझे कहा, 'जो भाषण प्रधानमंत्री ने आज यहां दिया है, यही भाषण उनको देना चाहिए अपने मंत्रियों को, क्योंकि उनमें से कई हैं, जो अभी तक अटके हुए हैं पुरानी आर्थिक विचारधारा में।'
इस पुरानी विचारधारा के तहत ही पीछे रह गया है ऐसा देश, जिसके पास सबसे विकसित देशों में होने के सारे साधन मौजूद हैं। यह प्रधानमंत्री समझ गए हैं, पर क्या अपने मंत्रियों को समझा सकेंगे कि देश की आर्थिक दिशा बदलने के लिए उनको अपने तौर-तरीके बदलने होंगे? यह सवाल सता रहा है सबसे ज्यादा उन निवेशकों को, जिन्होंने भारत में निवेश किया था और बाद में बुरी तरह पिटे हैं, क्योंकि पिछली सरकार ने कई बड़ी योजनाएं बीच में रोक दी थीं। मोदी के इरादे नेक हैं, लेकिन माहौल बदलना आसान नहीं।