अगर विस्मयकारी दृष्टि, आकर्षक सपने, ऊर्जावान वक्तृत्व क्षमता तथा ज्ञान के अनुभवी शब्द भारत को बदलने के लिए पर्याप्त हैं, तो नरेंद्र मोदी भारत के इतिहास में सर्वाधिक परिवर्तनकारी प्रधानमंत्री हैं! भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली स्थित मुख्यालय में उनका विजय भाषण बाहरी के रूप में दिल्ली आने के बाद स्टेट्समैन के रूप में सबसे अच्छा भाषण था। हालांकि उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने तीखे शब्दों के साथ कटाक्ष करते हुए कांग्रेस, समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के नेताओं की निंदा की और भविष्यवाणी की कि जब नतीजे की घोषणा होगी, तो उन्हें झटका लगेगा। लेकिन विजय भाषण के दौरान उन्होंने सावधानीपूर्वक सपा-बसपा और कांग्रेस का जिक्र नहीं किया और उनकी शर्मनाक हार के घाव पर नमक छिड़कने से परहेज किया। इसके विपरीत उन्होंने अपने समर्थकों को उदारता और नम्रता की सलाह देते हुए याद दिलाया कि पेड़ चाहे जितना भी बड़ा हो, फल लगने पर वह झुकता ही है।
एकजुटता का संदेश दोहराते हुए उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार सबके लिए है-जो उनके समर्थक हैं, तथा जो उनका विरोध करते हैं। उत्तर प्रदेश में 325 सीटों पर जीत निस्संदेह उनके करिश्मा और लोगों की कल्पना और सपनों को पकड़ने की उनकी अतुलनीय क्षमता को दर्शाती है। उनके विरोधियों द्वारा उनकी कठोर आलोचना और उनके खिलाफ तमाम नकारात्मकता फैलाने के बावजूद लोगों का भरोसा उन पर कायम है और वे कामना करते हैं कि वह उनके जीवन में बेहतर बदलाव लाएंगे। स्वतंत्र भारत के इतिहास में कभी भी इतने सारे लोगों ने किसी एक व्यक्ति से इतनी आकांक्षाएं नहीं की हैं। यह एक भयावह जिम्मेदारी है। मोदी देश के 130 करोड़ लोगों के साथ धोखा नहीं कर सकते। उन्हें अपने वायदों को पूरा करना होगा, अन्यथा भावी पीढ़ियां उन्हें माफ नहीं करेंगी।
उन्होंने 2022 तक भारत के बदलाव की एक विस्तृत रूपरेखा खींची, जब भारत अपनी स्वाधीनता के 75 वर्ष पूरे करेगा। पिछली बार की तरह अपने इस भाषण में भी मोदी ने 35 वर्ष से कम उम्र के आकांक्षी भारतीयों के महत्व को रेखांकित किया, जो नए भारत के निर्माण के वाहक बनने वाले हैं। पिछले ढाई वर्षों में मोदी ने कई पहल की घोषणा की, जिन्हें अगर गंभीरता से लागू किया गया, तो वह मान्यता से परे भारत को बदल देगा। स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, जन-धन खाते और गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस सिलेंडर जैसी योजनाओं के जरिये उन्होंने गरीबों तक पहुंचने की कोशिश की, जो भाजपा के साथ नहीं थे। कई राजनीतिक पार्टियां सड़क, बिजली और पानी का वायदा करती रही हैं। लेकिन ग्रामीण और शहरी लोगों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए मोदी ने चार प्रमुख जरूरतों पर ध्यान केंद्रित किया-सिंचाई, पढ़ाई, दवाई और कमाई। भारत में बदलाव के लिए उनका नुस्खा 'गरीबों की ताकत और मध्यवर्ग की आकांक्षाओं' को एक साथ लाने पर केंद्रित है।
उनके विरोधियों ने उन्हें एक चतुर और सपनों का मुखर सौदागर बताया, जिन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से अलग-अलग वायदे किए और लोगों की क्षीण स्मृति के चलते उनके अधूरे वायदे भुला दिए गए। वे दावा करते हैं कि आधारभूत संरचनाओं के निर्माण, रोजगार, काला धन वापस लाने और हर व्यक्ति के खाते में पंद्रह लाख रुपये जमा करने और ताजा घरेलू निवेश से संबंधित प्रगति रिपोर्ट खराब है। फिर भी लोग उन पर भरोसा करने को तैयार हैं और बताते हैं कि कम से कम वह कोशिश तो कर रहे हैं। कई अर्थशास्त्रियों, विश्लेषकों और टिप्पणीकारों ने छोटे व्यवसायियों, किसानों, दिहाड़ी मजदूरों की असुविधाओं और 115 लोगों की मौत का हवाला देते हुए विमुद्रीकरण के फैसले की आलोचना की। हालांकि मोदी उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को यह समझाने में सफल रहे कि वास्तव में उन्होंने समृद्ध और काला धन रखने वालों पर निशाना साधने की कोशिश की है, जिनसे वसूले जाने वाले पैसे उनके लिए बनने वाली योजनाओं पर खर्च होंगे। अब उनके समर्थक विमुद्रीकरण को सबसे बड़ा गरीब समर्थक उपाय बता रहे हैं, जैसा इंदिरा गांधी का बैंकों को राष्ट्रीयकृत करने, प्रिवी पर्स खत्म करने और गरीबी हटाओ का अभियान था!
अपने भाषण में उन्होंने 2014 की अपनी तीन प्रतिज्ञाओं को दोहराया-वह गलती कर सकते हैं, लेकिन गलत नीयत से कुछ नहीं करेंगे। बिना थके काम करेंगे और शासन व्यवस्था में पारदर्शिता लाएंगे। निस्संदेह मोदी ताकतवर और निर्णायक नेता हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, सपा और बसपा को खत्म करने के बाद आज वह देश के सबसे बड़े और लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं। मोदी अकाट्य लगते हैं, खासकर विरोधियों को यह समझ नहीं आता कि उनके प्रभुत्व का सामना कैसे करें। वह भारत को बदलना चाहते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में भाजपा खुद भी बदल रही है। एक बार मायावती ने ब्राह्मणों को लुभाकर सोशल इंजीनियरिंग की कोशिश की थी और बहुमत हासिल किया था। अब ब्राह्मण समर्थक भाजपा कभी कांग्रेस के वोट बैंक रहे गरीबों और दलितों तक पहुंच रही है। एक तरफ भाजपा ने जहां सपा और बसपा के गढ़ में सेंध लगाकर गैर यादव और गैर जाटव वोट हासिल किया, वहीं 94 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर मुसलमानों का वोट हासिल करने का बसपा का दांव विफल रहा। इन दोनों दलों को अपने जातिगत समीकरणों को छोड़ना होगा और व्यापक अपील करनी होगी। अस्तित्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस को एक अपना मोदी चाहिए, जो मोदी की तरह मुखर हो, जिसमें अतुल्य ऊर्जा हो, मिशनरी उत्साह हो, सपने दिखाने की क्षमता हो और जनसेवा की इच्छा हो। सिर्फ मोदी की विफलता गिनाने से उसका कुछ नहीं हो सकता।
मोदी के समर्थकों को इस सफलता पर घमंड नहीं करना चाहिए और मुस्लिमों की जान-बूझकर उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, जिनके समर्थन से भाजपा को भारी जनादेश मिला है। उन्हें मोदी के संदेश का पालन करते हुए उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया है।