फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सिर्फ मौद्रिक नीति से नहीं घटेगी महंगाई

Thu, 07 Nov 2013 04:40 PM IST
अश्विनी महाजन
विज्ञापन
विज्ञापन
जब डॉ रघुराम राजन ने सितंबर में रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद संभाला, तब तक अर्थव्यवस्था की स्थिति काफी कमजोर हो चुकी थी। डॉलर के मुकाबले में रुपया पिछड़कर काफी निचले स्तर तक पहुंच चुका था।
विज्ञापन


चालू खाते का विदेशी भुगतान का घाटा पिछले साल 88 अरब डॉलर के ऊंचे स्तर पर पहुंचने से भुगतान संकट भयंकर रूप धारण कर चुका था। महंगाई की दर भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई थी। ऐसे में, स्वाभाविक तौर पर रघुराम राजन से बड़ी अपेक्षाएं थीं कि वे इन समस्याओं की तरफ ध्यान देंगे।

रघुराम राजन ने पद भार संभालते ही अपनी मौद्रिक नीति की घोषणा में बहुत-सी बातें कहीं। रुपये की बदहाली को रोकने हेतु ‘स्वैप’ की रणनीति अपनाने की घोषणा के साथ महंगाई के मद्देनजर सख्त मौद्रिक नीति की भी बात की। चालू खाते पर भुगतान घाटे को कम करने के लिए सोने के आयात पर अंकुश लगाने के उपायों को भी बताया।
विज्ञापन


रुपया कुछ संभला और पिछले लगभग एक माह से ज्यादा समय से 61-62 रुपये प्रति डॉलर पर चल रहा है। लेकिन रुपये की मजबूती से महंगाई को थामा नहीं जा सका। सरकार द्वारा 14 अक्तूबर को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में फिर महंगाई की दर लगातार बढ़ती हुई 6.42 प्रतिशत पर पहुंच गई है। गौरतलब है कि अगस्त में यह दर 6.10 प्रतिशत ही थी। अगर उपभोक्ता कीमत सूचकांक का आधार लें, तो महंगाई की दर सितंबर माह में 9.84 प्रतिशत तक पहुंच गई।

खाने-पीने की चीजों में महंगाई दर और भी ज्यादा है। पिछले दो माह में खाद्य मुद्रास्फीति 18 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि जुलाई में यह 12 प्रतिशत के आसपास ही थी। रिजर्व बैंक का कहना है कि महंगाई की दर सुरक्षित सीमा पांच प्रतिशत से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। इसके चलते रिजर्व बैंक गवर्नर चाहकर भी ब्याज दर घटाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। रिजर्व बैंक के सभी उपाय महंगाई रोकने में विफल होते दिख रहे हैं। 29 अक्तूबर को रिजर्व बैंक ने एक बार फिर से रेपो रेट को .25 प्रतिशत बढ़ाकर महंगाई को थामने की मंशा दोहराई है।

यदि कुछ सरकारी कर्मचारियों को छोड़ दें, तो लगभग सभी कर्मियों, मजदूरों और अन्य वेतनभोगियों की आय निश्चित होती है और उनमें महंगाई के साथ बढ़ोतरी नहीं होती। ऐसे में जब खाने-पीने की चीजों के दामों में बढ़ोतरी होती है, तो उनकी थाली से सामान गायब होने लगता है।

रिजर्व बैंक द्वारा पिछले लगभग तीन वर्षों से महंगाई को थामने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन थमने के बजाय वह लगातार बढ़ती जा रही है। आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, महंगाई बढ़ने के दो कारण होते हैं, एक मांग में वृद्धि और दूसरा लागतों में वृद्धि अथवा आपूर्ति में कमी। मांग में वृद्धि आय बढ़ने से होती है। यह सही है कि देश में लोगों की मौद्रिक रूप से आय लगातार बढ़ रही है। आमदनियां बढ़ने के साथ-साथ मुद्रा की उपलब्धता भी काफी बढ़ी है। इसका मुख्य कारण सरकार के खर्चों में अनाप-शनाप वृद्धि है।

मांग बढ़ने के साथ-साथ आपूर्ति में बराबर की वृद्धि नहीं हुई, नतीजतन कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं। साथ ही साथ कच्चे माल, ईंधन और अन्य लागतों के बढ़ने के कारण भी आपूर्ति बाधित हुई। इन सबका असर कीमतों पर पड़ा। खाद्य पदार्थों में मुद्रास्फीति सामान्य मुद्रास्फीति से लगभग दोगुनी रही। इसका कारण यह था कि सरकारी नीतियों में खेती की अनदेखी हुई, जिसके चलते कृषि उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी।

सरकार की कमियों को रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति से दूर नहीं कर सकता। वह उत्पादन नहीं बढ़ा सकता। ज्यादा से ज्यादा वह देश में उधार की मात्रा को कम रख सकता है, ताकि लोग उधार लेकर ज्यादा खरीदारी न कर सकें।

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति विकास दर को कम करती है। यदि देश में उधार की मात्रा कम होती है, तो लोग कम कारें, स्कूटर, घर तथा अन्य साजो-समान खरीदेंगे। ऐसे में उद्योगों को उत्पादन के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलेगा। इसलिए जरूरी है कि महंगाई थामने के लिए सरकार अपने खर्चों पर अंकुश लगाए। साथ ही कृषि विकास के उपाय अपनाए जाएं। आयातों पर अंकुश लगे, ताकि रुपया कमजोर न हो।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें