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बात केवल एक शहर की नहीं: नलों से आती मौत और शहरी शासन की विफलता

नई दिल्ली Published by: पत्रलेखा चटर्जी Updated Wed, 14 Jan 2026 07:04 AM IST

सार

दूषित नल के पानी के बारे में हाल की खबरें आधारभूत संरचना, विनियामक निगरानी और जनस्वास्थ्य के गहरे संकट को दिखाती हैं। ये बताती हैं कि कैसे तेजी से शहरीकरण, खराब योजना व सुरक्षा मानकों की अनदेखी से उन शहरों में दुखद घटनाएं पैदा हुईं, जो कभी अपनी स्वच्छता और विकास के लिए जाने जाते थे।
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इंदौर में दूषित जल के मामले ने देशभर में चिंताएं बढ़ा दी हैं। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


इंदौर के निम्न आय वर्ग वाले इलाके भागीरथपुरा में बीते 25 से 30 दिसंबर के बीच नगर निगम की पाइपलाइन से आने वाले पानी को पीने वाले कई लोगों की मौत हो गई। दूषित पानी से हुई मौतों की संख्या को लेकर अब भी भ्रम बना हुआ है। जिला प्रशासन ने 18 पीड़ितों के परिवारों को मुआवजे के चेक बांटे हैं, जबकि आधिकारिक आंकड़ा सात ही बताया जा रहा है। आंकड़ों में इस विरोधाभास के बीच, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि उनकी सरकार ‘आंकड़ों में नहीं उलझेगी, बल्कि सभी पीड़ितों के साथ खड़ी रहेगी।’


जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) द्वारा नौ जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में बताया गया है कि कम से कम 18 मौतें हुई हैं, 50 मरीज अब भी अस्पताल में भर्ती हैं और 10 आईसीयू में हैं। जन स्वास्थ्य अभियान के कार्यकर्ता अमूल्य निधि का कहना है कि इंदौर में नल के दूषित पानी से होने वाली मौतें ‘ज्ञात समस्या’ थी। दिलचस्प बात यह है कि इंदौर को शहरी आधारभूत संरचना और पर्यावरणीय सुधार के लिए एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से 1,365 करोड़ रुपये का ऋण मिला है। यही नहीं, इस शहर को अमृत (अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन) स्कीम और स्मार्ट सिटी परियोजना का हिस्सा होने का भी फायदा मिला है। जेएसए के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने बताया कि प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा गया है कि ‘एडीबी से 2004 में लिए गए ऋण का मकसद हर नागरिक को पर्याप्त पीने योग्य साफ पानी देना था और शहर में सातों दिन चौबीसों घंटे पानी की आपूर्ति का वादा किया गया था। लेकिन परियोजना के सफलतापूर्वक पूरा होने के एक दशक से ज्यादा समय बाद भी नागरिकों को पर्याप्त सुरक्षित एवं स्वच्छ पानी नहीं मिल रहा है। भागीरथपुरा के निवासियों ने आरोप लगाया कि जब एडीबी से मिले ऋण के बाद पीने के पानी की नई पाइपलाइन बिछाई गईं, तो कुछ जगहों पर उन्हें सीवर लाइनों के साथ ही लगा दिया गया। हो सकता है कि अब मासूम लोग इस लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हों।’

जनवरी 2026 की शुरुआत में, गुजरात की राजधानी गांधीनगर भी टाइफाइड के प्रकोप की चपेट में आ गई, जिसका कारण नगर निगम द्वारा आपूर्ति किया गया दूषित पानी ही था, और दिल्ली-एनसीआर के ग्रेटर नोएडा में भी कुछ निवासियों ने नल के पानी से बदबू आने की शिकायत की है। शहरी भारत में दूषित नल के पानी के बारे में हाल की ये सभी खबरें नागरिक आधारभूत संरचना, विनियामक निगरानी और जनस्वास्थ्य के गहरे संकट को दिखाती हैं। ये सभी खबरें बताती हैं कि कैसे तेजी से शहरीकरण, खराब योजना और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने मिलकर उन शहरों में ऐसी दुखद घटनाएं पैदा की हैं, जो कभी अपनी स्वच्छता और विकास के लिए जाने जाते थे।


वर्ष 2019 में, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट (जो 2013-2018 तक की थी) में इंदौर और भोपाल में पानी की आपूर्ति में बड़ी समस्याओं की चर्चा की गई थी। इसमें बताया गया था कि कुल 8.95 लाख निवासियों (भोपाल में 3.62 लाख और इंदौर में 5.33 लाख) को दूषित पानी की आपूर्ति की गई थी। जन स्वास्थ्य अभियान कार्यकर्ता अमूल्य निधि ने पानी की सख्त जांच की तत्काल जरूरत पर भी प्रकाश डाला है।


अगर हम भागीरथपुरा जैसी त्रासदियों को रोकना चाहते हैं, तो चर्चा सिर्फ इसी घटना तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जेएसए की मांगों में इंदौर एवं देश के दूसरे इलाकों में भी पानी से होने वाली बीमारी के मुफ्त इलाज, पुरानी पाइपलाइनों को वैज्ञानिक जीआईएस-आधारित नेटवर्क मैपिंग से बदलना, पारदर्शी ऑडिटिंग, और रिसाव व नुकसान को कम करना, ठोस कचरा प्रबंधन और सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना (सेप्टिक टैंक और पानी की आपूर्ति व स्वच्छता का स्वतंत्र मूल्यांकन) शामिल है। उनका कहना है कि आपूर्ति किए जाने वाले पानी की मात्रा और गुणवत्ता जलापूर्ति के नियमों के अनुसार होनी चाहिए।

साफ पानी सिर्फ स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की चिंता का विषय नहीं, बल्कि व्यवसाय का मामला भी है। अमीर घरों में अक्सर वाटर फिल्टर, बोतलबंद पानी, या बोरवेल होते हैं, जबकि गरीब लोग लगभग पूरी तरह से नगर निगम की आपूर्ति पर ही निर्भर रहते हैं। दूषित नल के पानी का खामियाजा सबसे गरीब और सबसे कमजोर लोगों को उठाना पड़ता है। असुरक्षित पानी की छिपी हुई लागत काम के छूटे हुए दिनों, अस्पताल के खर्च, संस्थानों पर कम होते भरोसे और कभी-कभी मौतों के रूप में सामने आती है। इंदौर, गांधीनगर और ग्रेटर नोएडा शहरी आधुनिकता के आख्यान को चुनौती देते हैं। शहरों को विकास के इंजन के तौर पर पेश किया जाता है, पर उनकी जलापूर्ति व्यवस्था महामारियों का इंजन बनती जा रही है। पाइप बिछाए जाते हैं, नल लगाए जाते हैं, लेकिन पानी असुरक्षित और अस्वच्छ ही रहता है। पानी उपलब्ध कराने के शानदार आंकड़े प्रदूषण के गंदे राज को छिपाते हैं।
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अगर शहरों को फलना-फूलना है, तो इसमें सुधार लाना ही होगा। पानी की उपलब्धता के साथ गुणवत्ता भी होनी चाहिए। स्वतंत्र, पारदर्शी और लगातार निगरानी होनी चाहिए। पाइपलाइन विस्तार से ज्यादा रखरखाव को प्राथमिकता देनी चाहिए। नागरिकों को सिर्फ कनेक्शन नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग के लिए भी सशक्त बनाया जाना चाहिए। जरूरी यह नहीं है कि कितने नल लगाए गए हैं, बल्कि यह है कि क्या उन नलों से ऐसा पानी आता है, जिसे बिना किसी डर के पिया जा सके।

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