75 साल पहले संविधान सभा के विचार-विमर्श में कांग्रेस पार्टी एक प्रेरक शक्ति थी। तब डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में 'व्यवस्था और अनुशासन का अहसास' लाने के लिए कांग्रेस की सराहना की थी। आज कांग्रेस लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में विपक्ष में बैठी है। यह एक दुखद बदलाव है, पर अपरिवर्तनीय नहीं है।
आपातकाल वाली मानसिकता
भाजपा और दक्षिणपंथी तत्वों के मन में कांग्रेस की वह छवि है, जो 1975-77 में लगे आपातकाल और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के निलंबन से जुड़ी है। सही मायने में यह कांग्रेस के 139 साल के इतिहास में एक काला धब्बा था, लेकिन इंदिरा गांधी ने यह शपथ लेते हुए माफी मांगी थी कि आपातकाल कभी दोहराया नहीं जाएगा। जनता ने उनकी माफी को स्वीकार किया और 1980 में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस भेजा।
क्या संविधान के निर्माण और संविधान को मजबूत करने में कांग्रेस का कोई अन्य योगदान नहीं है? हां है, लेकिन वे बातें शायद ही कभी जनता के सामने लाई जाती हैं। संविधान का 'अनुच्छेद 368' संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्रदान करता है, जो किसी भी देश के संविधान के लिए एक जरूरी तत्व है। एक देश समय-समय पर बदलावों का सामना करता है और न्यायाधीशों द्वारा निरंतर संविधान पर व्याख्यान दिया जाता है। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जिसे राष्ट्र के बदलते जीवन के अनुसार ढाला जाना चाहिए।
संविधान संशोधन से आती है मजबूती
अगर मैं उस बहस में बोलता तो मैं कांग्रेस द्वारा संविधान को मजबूत करने के लिए किए गए कुछ संशोधनों की याद दिलाता। कांग्रेस ने संविधान की उद्देशिका में निर्धारित उच्च लक्ष्य, विशेष रूप से न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) और समानता (स्थिति और अवसर की समानता) को आगे बढ़ाया है।
संविधान का पहला संशोधन एक्ट 1951 एक विधायी कदम था। इसने सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े या अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण की सांविधानिक सुरक्षा प्रदान की। अगर यह पहला संशोधन नहीं होता तो आरक्षण की पूरी प्रणाली स्थापित नहीं हो पाती।
पहले संविधान संशोधन ने अनुच्छेद 31 ए और 31 बी को जोड़ा और जमींदारी व्यवस्था के उन्मूलन के मार्ग को प्रशस्त किया, जिसने लाखों किसानों और खेतिहर मजदूरों को मुक्त किया। इसके साथ ही भूमि सुधारों और भूमि वितरण की सुविधा भी प्रदान की।
पहले संशोधन ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए नागरिकों के पूर्ण या आंशिक बहिष्कार के साथ किसी भी व्यापार, उद्योग, व्यवसाय या सेवा को चलाने के लिए कानूनी नींव रखी।
संविधान के (42वें संशोधन) अधिनियम 1976 को संविधान में किए गए कई परिवर्तनों के लिए संशोधित किया गया। हालांकि इस बात को कम ही लोग याद करते हैं कि इसमें जो दो बदलाव किए गए थे, उन्हें भावी पीढ़ी याद रखेगी। पहला समान न्याय सुनिश्चित करने के लिए राज्य को 'मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने' के लिए कानूनी रूप से बाध्य करने के लिए अनुच्छेद 39ए को शामिल करना था। दूसरा अनुच्छेद 48ए को शामिल करना था, जिससे राज्य के लिए 'पर्यावरण' की रक्षा और सुधार करना और जंगलों तथा वन्य जीवन की रक्षा करना अनिवार्य हो गया।
संविधान के (52वें संशोधन) अधिनियम, 1985 ने दसवें अनुच्छेद को पेश किया था, जो सदन में बैठने वाले विधायकों की अराजकता की समस्या से निपटने की पहली कोशिश थी। अफसोस की बात है कि इसने चुने हुए विधायकों की चतुराई, सभापतियों की मिलीभगत और अदालतों के उलझे हुए फैसलों का अनुमान नहीं लगाया था। दसवें अनुच्छेद का उद्देश्य तब तक पूरा नहीं होगा, जब तक इसे फिर से संशोधित नहीं किया जाता।
संविधान में सबसे दूरगामी संशोधन (73वां संशोधन) अधिनियम, 1992 और (74वां संशोधन) अधिनियम, 1992 थे, जिन्होंने पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए अलग-अलग प्रावधान किए और लोकतंत्र को अघिक गहरा एवं मजबूत किया। अनुसूचित जातियों और जनजातियों की लाखों महिलाओं एवं सदस्यों को राजनीति की मुख्य धारा में लाया गया और उन्हें लोकतांत्रिक शक्ति का उपयोग करने के लिए सशक्त किया गया। इतने बड़े पैमाने पर शक्ति का वितरण और विकेंद्रीकरण का कोई ऐतिहासिक उदाहरण इससे पहले कहीं देखने को नहीं मिलता है।
दोनों सदनों में हुई बहस दुर्भाग्यपूर्ण और आरोप-प्रत्यारोप से युक्त थी। यह सिर्फ संविधान की 75 साल की यात्रा पर केंद्रित थी। एक देश, एक चुनाव और भाजपा द्वारा प्रस्तावित अन्य बदलाव लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा उत्पन्न करते हैं। हालांकि मुझे इस बात का विश्वास है कि अंतत: जीत संविधान के मजबूत ढांचे और इसकी प्रगतिशील भावना की ही होगी।