इतिहासकार के अनुसार, समय और वैचारिक संबद्धता के आधार पर अलग-अलग दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच पांच उल्लेखनीय समानताएं हैं। सबसे पहले मोदी ने इंदिरा की तरह ही अपने राजनीतिक अधिकार का इस्तेमाल एक विशाल व्यक्तिवादी पंथ का निर्माण करने के लिए किया है, जिसमें वे खुद को पार्टी, सरकार और राष्ट्र का एकमात्र अवतार बताते हैं।
दूसरा, इंदिरा की ही तरह मोदी ने भी उन संस्थाओं को कमजोर करने का भरपूर प्रयास किया है, जिनकी स्वतंत्रता लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है। यह इंदिरा ही थीं, जिन्होंने पहली बार ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ और ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ की बात कही थी। उसी विचार को मोदी ने अपना लिया है। हालांकि इंदिरा के विपरीत मोदी ने औपचारिक आपातकाल की घोषणा तो नहीं की है, फिर भी उन्होंने सांविधानिक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति उसी तरह की उपेक्षा दिखाई है। इंदिरा ने प्रेस को सच दबाने के लिए धमकाया, जबकि मोदी उसे झूठ बोलने के लिए मजबूर कर रहे हैं। नौकरशाही आज 1970 के दशक की तुलना में और भी कम स्वतंत्र है, जांच एजेंसियों का प्रयोग राजनीतिक विरोधियों को चुप कराने के लिए और भी अधिक किया जा रहा है।
भारतीय लोकतंत्र प्रणाली में प्रधानमंत्री को प्रथम माना जाता है। वह उस प्रकार कार्य नहीं कर सकते, जिस प्रकार सर्वशक्तिमान अमेरिकी राष्ट्रपति कर सकते हैं। हालांकि व्यवहार में इंदिरा ने सरकार चलाने के लिए परामर्शी तरीके के बजाय एकतरफा तरीका अपनाया। पूरे शासनकाल में केवल दो लोगों की सलाह को ही उन्होंने गंभीरता से लिया- पहले पीएन हक्सर और फिर संजय गांधी। मोदी के साथ भी ऐसा ही है। वह सिर्फ और सिर्फ अमित शाह पर भरोसा करते हैं। शाह भी अपने बॉस की तरह ही शासन के अपारदर्शी, सत्तावादी तरीकों के समर्थक हैं।
चौथा, इंदिरा की तरह मोदी ने भी भारतीय संघवाद को खत्म करने की कोशिश की है। इंदिरा ने गैर-कांग्रेसी दलों द्वारा चलाए जा रहे राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के लिए अनुच्छेद 356 को एक हथियार के रूप में उपयोग किया, वहीं मोदी ने राज्यपाल के कार्यालय को हथियार बनाकर उन्हें कमजोर किया है।
पांचवां, इंदिरा की तरह मोदी ने भी अपने शासन को मजबूत करने के लिए उग्र-राष्ट्रवाद को हवा दी है। इंदिरा की तरह उन्होंने भी पार्टी, राज्य और मीडिया का इस्तेमाल कर यह दावा किया है कि केवल वे ही भारत की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। इस तरह के अंधराष्ट्रवाद को कथित तौर पर विदेशी ताकतों द्वारा भड़काया जाता है। इंदिरा ने तो महान देशभक्त जयप्रकाश नारायण को विदेशी एजेंट तक कह दिया था। अब भाजपा राहुल गांधी पर जॉर्ज सोरोस से पैसे लेने का आरोप लगा रही है।
अब मैं उन अंतर के बारे में बात करता हूं, जिनमें से दो खासतौर पर महत्वपूर्ण हैं। पहला, अपने तानाशाही तरीकों के बावजूद इंदिरा ने संविधान में निहित भारत के बहुलवादी विचार को बरकरार रखा। इसके अनुसार नागरिकता को भाषा, धर्म या जातीयता के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता है। जवाहरलाल नेहरू, जो अधिक सिद्धांतवादी और धर्मनिरपेक्ष माने जाते थे, वे कांग्रेस शासित राज्यों में किसी भी मुस्लिम को मुख्यमंत्री नहीं बना सके, वहीं इंदिरा ने चार मुस्लिमों को मुख्यमंत्री बनाया था। इंदिरा ने अपने सिख अंगरक्षकों को हटाने से भी मना कर दिया था, जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी एक बहुसंख्यकवादी हैं। वे किसी भी स्वयंसेवक की तरह देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्षधर हैं। भाजपा द्वारा 2014, 2019 और 2024 में लोकसभा में भेजे गए 800 सांसदों में से एक भी मुस्लिम नहीं था।
इंदिरा गांधी का यह मानना कि यह देश जितना हिंदुओं का है, उतना ही मुसलमानों का भी, उन्हें बहुसंख्यकवादी मोदी से अलग करता है। आपातकाल के दौरान पहले बेटे संजय गांधी को, फिर 1980 में उनकी मृत्यु के बाद दूसरे बेटे राजीव को अपना उत्तराधिकारी बनाकर उन्होंने एक खतरनाक राजनीतिक प्रथा की शुरुआत की, जो कांग्रेस पार्टी के इतिहास और विरासत के विपरीत थी। महात्मा गांधी के बच्चों में से कोई भी स्वतंत्रता के बाद सांसद या मंत्री नहीं बन पाया, हालांकि उनके चारों बच्चे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल गए थे। इंदिरा ने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को पारिवारिक संस्था बना दिया और इसने दूसरी पार्टी के नेताओं को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया। शिवसेना, डीएमके, अकाली और टीएमसी क्षेत्रीय गौरव के लिए उठ खड़े हुए। इसी तरह एसपी और राष्ट्रीय जनता दल समाजवादी सिद्धांतों की जगह परिवारवाद के सिद्धांत के पक्षधर हैं।
मोदी के माता-पिता राजनीति में नहीं थे और मोदी के भी बच्चे नहीं हैं। चुनावी दृष्टि से देखा जाए तो यह उनके प्रधानमंत्री पद के संभावित उन प्रतिद्वंद्वियों पर एक बड़ी जीत है, जो इस मुकाम पर केवल इसलिए पहुंचे हैं, क्योंकि वह राजीव और सोनिया गांधी के बेटे और इंदिरा गांधी के पोते हैं। अपने दम पर राजनेता बने मोदी और वंशवादी राहुल के बीच के अंतर ने पिछले तीन आम चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने में काफी योगदान किया है और यह अगले चुनाव में भी उनकी मदद कर सकता है। भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर उत्थान उसके प्रमुख विरोधी दलों की वंशवादी राजनीति के कारण संभव हुआ है। यह एक कड़वा सच है, जिसे हिंदू बहुसंख्यकवाद के विरोधी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। वंशवादी राजनीति आपातकाल की एक विरासत है, जो वर्तमान में भारतीय लोकतंत्र पर एक भयावह विरासत का प्रयोग कर रही है।
आजादी के बाद जितने भी प्रधानमंत्री हुए, उनमें इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों सत्तावादी विचारों वाले रहे हैं। किसका कार्यकाल सबसे खराब रहा? अभिव्यक्ति की आजादी के लिहाज से हम अभी पहले से बेहतर स्थिति में हैं। इसी तरह राजनीतिक विरोध के लिए भी अधिक जगह है। दूसरी तरफ मई 2014 के बाद हमारी सार्वजनिक संस्थाओं को जरूरत से ज्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण काफी नुकसान झेलना पड़ा है। चुनाव आयोग के साथ टैक्स अधिकारी और नियामक एजेंसी पूरी तरह से राजनीतिक आकाओं के प्रति पहले से कहीं अधिक ‘प्रतिबद्ध’ हैं।
अंतत: सबसे चिंता वाली बात यह है कि मोदी के शासनकाल में धार्मिक कट्टरता का जहर अधिक तेजी से फैला है। यह कट्टरता रोजमर्रा की जिंदगी में भी जमीनी सतह पर दिखाई दे रही है। इसके साथ ही वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों और भाजपा के मुख्यमंत्रियों के भाषण तथा आचरण में भी यह कट्टरता तेजी से सामने आ रही है। अधिनायकवाद के साथ बहुसंख्यकवाद का यह मिश्रण नरेंद्र मोदी की शासन शैली का सबसे हानिकारक पहलू है, जिसे उनके पद से हटने के बाद भी पहले जैसा करने में दशकों लग सकते हैं।