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अमेरिका से भारतीयों का मोहभंग !

Mon, 24 Apr 2017 07:24 PM IST
गीता आनंद
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गीता आनंद
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भारतीयों ने लगभग हर चीज के लिए अमेरिका की प्रशंसा की है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के शासन में नस्लीय हिंसा को देखकर अनेक लोग क्षुब्ध और हतोत्साहित हो गए हैं और अमेरिकी आकर्षण से उनका मन खट्टा हो गया है। भारतीय अपनी प्रतिक्रिया में केवल गुस्सा और चिंता ही नहीं जाहिर कर रहे, बल्कि अमेरिका में पढ़ाई और नौकरी करने की आकांक्षा रखने वाले युवा दूसरा विकल्प भी तलाश रहे हैं। अमेरिका में पढ़ने की योजना पर पुनर्विचार कर रही मुंबई की बीस वर्षीय कनिका अरोड़ा कहती हैं, 'हम नहीं जानते कि वहां सड़क पर हमारे साथ क्या हो सकता है। वे शायद सोचें कि हम आतंकवादी हैं।'
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अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों पर हाल में हुआ हमला एक विस्फोटक खबर है। जिस देश को कभी आकांक्षाओं को पूरा करने वाला माना जाता था, उसे अब अनेक लोग खतरनाक और रहने लायक नहीं मान रहे। इसके अलावा भारतीयों, खासकर उच्च शिक्षित वर्ग के अमेरिका से विमुख होने का एक और कारण ट्रंप प्रशासन द्वारा एच-1बी वीजा का पुनर्मूल्यांकन भी है, जो ज्यादातर सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) रोजगार के लिए दिया जाता है। हर वर्ष 85,000 से ज्यादा लोगों को यह वीजा दिया जाता है, जिसमें ज्यादातर भारतीय होते हैं।

वित्तीय प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले इक्कीस साल के संकेत बाफना कहते हैं, अमेरिका महान अवसरों वाला देश था, जो अब नहीं रह गया है। अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ कॉलेजिएट रजिस्टार्स ऐंड एडमिशन ऑफिसर्स द्वारा 250 अमेरिकी विश्वविद्यालयों में कराए गए सर्वे के मुताबिक, इस वर्ष अमेरिकी शिक्षण संस्थानों में भारत से अंडरग्रेजुएट कोर्सों के लिए आवेदन में 26 फीसदी और ग्रेजुएट कोर्स के आवेदन में 15 फीसदी की कमी आई है।
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अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा के आंकड़ों के मुताबिक, एच-1बी वीजा के आवेदनों की संख्या भी 1.99 लाख तक कम रह गई है, यानी इसमें लगभग 20 फीसदी की गिरावट आई है। दूसरे लोगों की तरह भारतीय भी मैक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने और छह मुस्लिम देशों के लोगों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने से नाराज हुए। हालांकि भारतीय तब यह देखकर थोड़े आश्वस्त हुए  कि भारतीयों को निशाना नहीं बनाया गया है। लेकिन शीघ्र ही उन्होंने देखा कि अमेरिका में आप्रवासी-विरोधी आक्रोश किसी को नहीं बख्शता। विगत फरवरी में दो भारतीय आप्रवासियों को गोली मारी गई, जिनमें से एक पर कंसास बार में प्राणघातक हमला किया गया। प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, हमलावर नस्लीय गाली दे रहा था और उन्हें कह रहा था कि वे अमेरिकी नहीं हैं। उसके बाद से भारतीय प्रवासियों पर हुए कई और हमलों को भारतीय मीडिया द्वारा विस्तार से कवर किया गया। हालांकि अधिकारी सभी हमलों को आप्रवासी-विरोधी कट्टरता से नहीं जोड़ रहे, लेकिन  यह विश्वास, कि अमेरिका में भारतीयों पर हमले हो रहे हैं, अनेक लोगों के मानस में घर कर गया है।

प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, लगभग 32 लाख भारतीय मूल के लोग अमेरिका में रहते हैं, जो अमेरिका की आबादी से एक फीसदी से कुछ ज्यादा है। इनमें से ज्यादातर लोगों के पास ग्रीन कार्ड और एच-1बी वीजा है और वे औसत अमेरिकियों की तुलना में ज्यादा समृद्ध और शिक्षित हैं।

सिलिकन वैली में भारतीय-अमेरिकी एक बड़ी भूमिका निभाते हैं, जहां गूगल इंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई समेत कुछ लोगों ने कुछ सबसे सफल कंपनियों की स्थापना की है। लेकिन पिचाई जैसी सफलता की कहानी अब भारत में ईर्ष्या नहीं जगाती।

कनिका अरोड़ा कहती हैं कि उनके माता-पिता को उनके भाई को अमेरिका भेजने को लेकर आपत्ति है।अपने भाई की तरह अमेरिका में पढ़ने और नौकरी करने की आकांक्षा कनिका की भी है, लेकिन वह बताती हैं कि अब वह फिर से इस पर विचार कर रही हैं। इसका सबसे बड़ा कारण वहां हो रही नस्लीय हिंसा है। वह कहती हैं कि यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने संबंधी उथल-पुथल के बावजूद उन्हें और अन्य लोगों को पढ़ाई एवं नौकरी के लिए यूरोप ज्यादा अनुकूल लग रहा है, क्योंकि तुलनात्मक रूप से वह ज्यादा सुरक्षित है।

कनिका और अन्य लोगों का कहना है कि ट्रंप की नीतियां भारत से प्रतिभा पलायन को रोककर अमेरिका को फायदा पहुंचा सकती हैं, क्योंकि वहां से सभी प्रतिभाशाली लोग लौट रहे हैं, जो भारत में काम कर सकते हैं।

मुंबई की 21 वर्षीय अनन्या गुप्ता बताती हैं कि बचपन से ही उसका सपना अमेरिका जाने का था, लेकिन अब वह वहां नहीं जाना चाहती। अलबत्ता हर कोई ट्रंप के शासन में अमेरिका के प्रति नकारात्मक नहीं है।

इक्कीस वर्षीय देवांशु जैन बताते हैं कि वह अब भी अमेरिका में पढ़ाई और नौकरी करने का सपना देख रहे हैं। वह आगे कहते हैं कि नस्लीयता की समस्या तो भारत में भी है। न्यूयार्क में गोल्डमैन सैश में काम करना कौन नहीं चाहेगा! लेकिन अमेरिका में जो हो रहा है, उसने हमारे कई मित्रों को बुरी तरह हिला दिया है और उन्होंने हाल के महीनों में अमेरिकी विश्वविद्यालयों से निकलकर कनाडा के शिक्षण संस्थानों में दाखिला लिया है।

फिर भी कुछ भारतीय ट्रंप के आक्रामक रुख की अनदेखी करने को तैयार हैं, अगर वह पाकिस्तान को सबक सिखाते हैं। भारत ने पाकिस्तान के साथ तीन लड़ाइयां लड़ी हैं और अनेक भारतीय मानते हैं कि भारत में होने वाले आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान है। आतंकवाद पर ट्रंप के कठोर रुख ने भारतीयों में उम्मीद का संचार किया है। एक सॉफ्टवेयर कंपनी के प्रबंध निदेशक अभय भालेराव कहते हैं कि एक तरफ तो ट्रंप बिल्कुल ही अजीब किस्म का व्यक्ति है, लेकिन दूसरी तरफ लगता है कि वह समझते हैं कि पाकिस्तान बहुत ही शरारती मुल्क है।
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