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अफगानिस्तान में हमारा दांव

Thu, 29 Aug 2013 08:40 PM IST
पुष्पेश पंत
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सारी दुनिया की निगाहें जिस समय सीरिया पर अटकी हैं, जहां अमानवीय रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप लगा अमेरिका असद सरकार को सबक सिखाने के लिए हमले की तैयारी करता नजर आ रहा है, उसी वक्त हमारे पड़ोस में बहुत कुछ ऐसा घट रहा है, जो हमारे राष्ट्रहित के लिए कहीं अधिक संवेदनशील सिद्ध हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह नहीं कि जो कुछ घटनाक्रम पश्चिम एशिया में संभावित है, वह सामरिक महत्व का नहीं है या उसकी उपेक्षा की जा सकती है; पर हामिद करजई की पाकिस्तान यात्रा को और उनके साथ नवाज शरीफ की वार्ता को जो प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी, वह नहीं दी गई है।
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इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस सरकार का खाद्य सुरक्षा विधेयक को अपने सम्मान का ही नहीं, जीवन-मरण का प्रश्न बनाने का हठ रहा है। संसद की कार्यवाही में जितने भी व्यवधान पड़े, उन सबका ठीकरा भाजपा के सिर फोड़ना इस बार जायज नहीं। आंध्र प्रदेश के सांसदों ने तेलंगाना के मुद्दे पर हंगामा किया, तो तमिलनाडु के नेताओं ने मद्रास कैफे को निशाना बनाया और इसी बहाने श्रीलंका द्वारा तमिल मछुआरों को बंदी बनाने के मुद्दे पर खासा हंगामा मचाया। उधर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार ने आगामी चुनावों में अल्पसंख्यक वोट बैंक पर एकाधिकार जमाने के लिए चौरासी कोसी यात्रा पर प्रतिबंध लगाने का फैसला कर माहौल गरमाया। दूसरी तरफ रुपया कुछ ऐसे लुढ़कने लगा है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा। रही-सही कसर मुंबई की सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरी कर दी। इस सबके दौरान कोलगेट घोटाले के आरोपों में अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराते प्रधानमंत्री सदन से लापता ही रहे।

कुल मिलाकर, आंतरिक राजनीति के ये सब दबाव इतने जबर्दस्त थे कि विदेश नीति की चुनौतियों को बिसराना सहज संभव हो गया। जब प्रधानमंत्री सदन में मौजूद नहीं थे, तब यह दलील दी जा रही थी कि वह इराक के प्रधानमंत्री के साथ वार्ता में व्यस्त हैं। मगर यह सोच पाना कठिन है कि क्या आज का भारत इस हालत में है भी कि वह अपने अमेरिकी साझीदारों की मर्जी के खिलाफ उस देश के साथ स्वाधीन उभयपक्षीय संबंधों का निर्वाह कर सकता है? जब से सद्दाम को अपदस्थ कर इराक की तबाही का दौर आरंभ हुआ है, तब से भारत ने अरब जगत में अपनी साख बुरी तरह गंवाई है। गुट निरपेक्ष आंदोलन का कोई वास्ता आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से नहीं रहा है। अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप ने इराक को कमोबेश धर्मनिरपेक्ष-समाजवादी संस्कार वाली कुनबा परस्त-सैनिक तानाशाही से सांप्रदायिक मिजाज वाली कमजोर तानाशाही में बदल डाला है। यही दुर्गति लीबिया एवं मिस्र की भी हुई है। अब सीरिया अमेरिका के निशाने पर है।
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जहां तक भारत का प्रश्न है, उसके सामरिक-आर्थिक हित सीरिया में इराक से कहीं कम हैं। अधिक से अधिक वह संयुक्त राष्ट्र के किसी निंदक-सैनिक हस्तक्षेप का समर्थन करने वाले प्रस्ताव पर मतदान के वक्त तटस्थ रह सकता है। ईरान तथा श्रीलंका के प्रकरण में यही ढुलमुल मानसिक दशा और लाचारी देखने को मिलती रही हैं।

इसीलिए अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की आसन्न वापसी के बाद अफ-पाक मोर्चे में बदलाव पर पैनी नजर रखना बेहद जरूरी है। अब तक हमारी सरकार अमेरिकी सीख के आधार पर यह प्रचार करती रही है कि असरदार ‘सामरिक गहराई’ के लिए अफगानिस्तान में हमारी वजनदार मौजूदगी अनिवार्य है। यह ब्योरे कोई नहीं बतलाता कि इस मौजूदगी का स्वरूप क्या होगा तथा क्या हम इसका बोझ उठाने की स्थिति में हैं? भारत को उकसाया जाता रहा है कि अपनी उदीयमान हस्ती के अनुरूप क्षेत्रीय भूमिका निभाने के लिए अफगानिस्तान के संकट निवारण का जरूरी खर्च उसे उठाना ही होगा। अरबों डॉलर की सहायता का आश्वासन हम करजई को दे चुके हैं। अब तक इसकी लाभ-लागत का कोई आकलन जरूरी नहीं समझा गया है।

जो बात भुलाई नहीं जानी चाहिए, वह यह है कि करजई की अपनी स्थिति संकट ग्रस्त है। तालिबान गुटों के साथ अमेरिकियों की प्रस्तावित वार्ता से वह खिन्न रहे हैं और इस बात से खासे आशंकित कि उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंकने की साजिश तो नहीं रची जा रही है। पिछली बार जब वह पाकिस्तान में थे, तो उन्होंने बेहिचक पाकिस्तान को 'भाई' (भारत को ‘सिर्फ दोस्त’ जतलाते हुए) कहा था। करजई को सबसे विकट खतरा यह है कि खूंखार तालिबान को पनाह देने में माहिर पाकिस्तान उनके लिए बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों की महत्वाकांक्षा तालिबान के जरिये अफगानिस्तान पर परोक्ष रूप से राज करने की है। इस बात को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि चीन अपने प्रमुख एशियाई प्रतिद्वंद्वी भारत को यहां से बेदखल करने के लिए पाकिस्तान को सैनिक से लेकर राजनयिक तक की हरसंभव मदद करता आया है।

जब नवाज शरीफ अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोग की बात करते हैं, तो इसका सीधा असर उन प्रस्तावित भारतीय परियोजनाओं पर पड़ना अवश्यंभावी है, जो सड़क-पुल, भवन निर्माण, शिक्षा तथा चिकित्सा सेवाओं के प्रसार तथा दूर संचार एवं ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हैं।

हम निराशावादी नहीं और न ही यह सुझाना चाहते हैं कि इन प्रस्तावों से भारत-पाक मुठभेड़ की आशंका बढ़ी है। इसकी भी गुंजाइश है कि अफगानिस्तान में भारत-पाक का राजनयिक सहयोग और पुनर्निर्माण परियोजनाओं में साझेदारी इन दोनों के बीच परस्पर भरोसा बढ़ाने वाले उस अभियान को फिर से गतिशील कर सकती है, जो थम गया है। मगर मौजूदा सरकार के हाल को देखते हुए यह उम्मीद फिलहाल नादानी ही लग रही है।
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