इसके बाद स्कंद ने विश्वकर्मा से आग्रह किया, ‘हे दिव्य शिल्पी! आप शीघ्र तीन शिवलिंग तैयार कीजिए।’ उन्होंने तीन शिवलिंग निर्मित कर कार्तिकेय को अर्पित कर दिएा। कार्तिकेय ने पहला शिवलिंग पश्चिम दिशा में स्थापित किया, जो ‘प्रतिज्ञेश्वर’ कहलाया। उसकी स्थापना के समय स्वयं महादेव प्रकट हुए और बोले, ‘कुमार! जो भक्त कार्तिक या चैत्र मास की अष्टमी को यहां स्नान, उपवास, पूजन और जागरण करेगा, वह मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाएगा।’
इसके बाद स्कंद अग्निकोण की ओर बढ़े, जहां दैत्य के कपाल से शक्ति निकली थी। वहां उन्होंने दूसरा शिवलिंग स्थापित किया, जो ‘कपालेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके समीप देवी कापालिकेश्वरी की स्थापना भी हुई। वहीं उत्तर दिशा में ‘शक्तिछिद्र’ तीर्थ पर पातालगंगा प्रकट हुई। स्कंद ने देवताओं सहित उसमें स्नान कर तारकासुर को तर्पण अर्पित किया। तब महादेव प्रसन्न होकर बोले, ‘जो मनुष्य चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को यहां उपवास और पूजन करेगा, वह वध-जन्य पाप से मुक्त हो जाएगा।’
- तीसरे शिवलिंग की स्थापना का समय आया, तब ब्रह्माजी प्रसन्न होकर बोले, ‘कुमार! इस बार मैं स्वयं तीसरे शिवलिंग की स्थापना करूंगा।’
उन्होंने अद्वितीय, दोषरहित और मनोहर शिवलिंग की स्थापना की। उसे देखकर महादेव ने घोषणा की, ‘यहां मेरी पूजा ‘कुमारेश्वर’ नाम से होगी। जैसे मैं काशी में विश्वनाथ के रूप में विराजमान हूं, वैसे ही इस गुप्त क्षेत्र में कुमारेश्वर रूप में निवास करूंगा।’ स्कंद ने शिव की स्तुति करते हुए कहा, ‘कल्याणस्वरूप, सर्वव्यापक और देवताओं से पूजित भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।’
महादेव ने भी प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया, ‘कुमारेश्वर की सेवा से भक्तों को आरोग्य, संतान, धन और सुख मिलेगा। जो तपस्वी यहां ब्रह्मचर्य का पालन करेगा, वह पाशुपत योग को प्राप्त कर अंततः मुझमें लीन हो जाएगा।’ शिव ने उस स्थान पर निवास करने का वचन भी दिया। इसके बाद स्कंद ने माता पार्वती से कहा, ‘मां! मेरी प्रसन्नता के लिए आप इस स्थल को कभी न छोड़ें।’ पार्वती ने स्नेहपूर्वक उत्तर दिया, ‘पुत्र! जहां शिव रहते हैं, वहां मेरा निवास स्वभाव से ही होता है। यहां जो स्त्रियां श्रद्धा से मेरी पूजा करेंगी, मैं उन्हें सौभाग्य, उत्तम पति और संतान प्रदान करूंगी। जो नारी चैत्र शुक्ल तृतीया को स्नान कर मुझे अष्ट सौभाग्यसूचक वस्तुएं अर्पित करेगी, मैं उन्हें ये आठ वरदान-पिता, माता, सास, श्वशुर, पति, पुत्र, सौभाग्य और संपत्ति-प्रदान करूंगी।’ फिर स्कंद ने गणेश से कहा, ‘विनायक! जो भक्त पहले तुम्हारी पूजा कर फिर कुमारेश्वर का पूजन करेंगे, उनके विघ्न दूर करना।’ गणेश ने आश्वासन दिया, ‘भैया! इस शिवलिंग के भक्तों के मार्ग में कभी विघ्न उत्पन्न नहीं होगा।’
इसके बाद देवताओं ने मिलकर उस पवित्र स्थल की परिक्रमा की। ऋषियों ने कहा, ‘हे कुमार! तुम्हारे द्वारा स्थापित ये लिंग युगों-युगों तक मानवता को धर्ममार्ग पर प्रेरित करेंगे।’ कुमारेश्वर तीर्थ की महिमा दूर-दूर तक फैल गई। यहां आने वाले भक्त, भगवान शंकर के दर्शन से कृतार्थ होते हैं। जो कार्तिकेय के 108 नामों का एक मास तक जप करता है, वह सब संकटों से मुक्त हो जाता है। जो ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए यहां निवास करता है, उसे पाशुपत योग और मोक्ष प्राप्त होता है। इस प्रकार तारकासुर के वध से उत्पन्न शोक ने कार्तिकेय को शिवभक्ति के मार्ग पर अग्रसर किया। तीनों शिवलिंगों की स्थापना से यह क्षेत्र देवताओं और ऋषियों का पावन तीर्थ बन गया। आज भी महीसागर संगम स्थित यह तीर्थ पुण्य, सौभाग्य और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है।