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जानना जरूरी है: चांडाल पुत्र कैसे बना शिव का गण... शिवरात्रि के व्रत से जुड़ी है ये कथा

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 14 Sep 2025 04:51 AM IST

सार

विचित्रवीर्य पूर्व जन्म में चांडाल के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने शिवरात्रि के व्रत से जो पुण्य अर्जित किया, उससे उन्हें उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्हें यह अनुभूति हुई कि संपूर्ण सृष्टि में एक ही आत्मा व्याप्त है और वही भगवान सदाशिव हैं।
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


स्कंदपुराण में प्रसंग है कि प्राचीनकाल में एक ब्राह्मणी विधवा थी, जो स्वभाव से चंचल थी। उसने धर्म से विचलित होकर एक कामी चांडाल से संबंध बना लिया। कुछ समय बाद उसके गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम दुस्सह रखा गया। दुस्सह बड़ा ही दुष्ट और धर्मविरोधी था। वह सदा पापकर्म में लिप्त रहता। वह जुआ खेलता, चोरी करता, मदिरा पीता और गुरु की स्त्री तक से संबंध बनाने में भी नहीं हिचकता था। उसके जीवन में धर्म का कोई स्थान न था। एक दिन अधर्मी दुस्सह मन में कोई दुष्कृत्य सोचकर शिवालय पहुंचा। संयोगवश उसी दिन महाशिवरात्रि थी। दुस्सह ने दिनभर कुछ खाया नहीं और रात भी वहीं मंदिर में बिताई। वहां किसी संत के मुख से शैव शास्त्र की कथा सुनाई जा रही थी।


दुस्सह के कानों में शिव कथा पड़ती रही। अनजाने में उसने पूरी रात जागकर भगवान शिव के लिंगस्वरूप का दर्शन किया और उपवास कर डाला। अनायास हुए एक रात्रि के व्रत ने दुस्सह का भाग्य बदल दिया।


उस व्रत के पुण्य से मृत्यु के बाद दुस्सह को पुण्यलोक प्राप्त हुआ, जहां उसने अनेक वर्षों तक दिव्य सुख भोगे। इसके पश्चात उसने पृथ्वी पर राजा चित्रांगद के घर जन्म लिया और उसका नाम विचित्रवीर्य रखा गया। विचित्रवीर्य के स्वभाव में राजाओं के सभी श्रेष्ठ गुण थे। वह सुंदर, वीर, धैर्यवान और दानशील थे। उन्होंने विशाल राज्य प्राप्त किया, किंतु वैभव और ऐश्वर्य में भी अहंकार को कभी स्थान नहीं दिया। वह सदा भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते। रात्रि में जागरण करते, शिव धर्म के अनुसार पूजा करते, शिव कथा सुनते और शास्त्रों का पालन करते। कथा सुनते समय उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बहते और रोमांच से उसका शरीर पुलकित हो उठता। उन्होंने संपूर्ण आयु शिव धर्म के पालन में व्यतीत की और प्रजा को भी उसी पथ पर चलाया। वह भक्तों को सदैव शिव कथा सुनाने और सुनने के लिए प्रेरित करते थे।


भगवान शिव इस संसार में अज्ञानी और ज्ञानी, दोनों को समान रूप से सुलभ हैं। विचित्रवीर्य ने शिवरात्रि के व्रत से जो पुण्य अर्जित किया, उससे उन्हें उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्हें यह अनुभूति हुई कि संपूर्ण सृष्टि में एक ही आत्मा व्याप्त है और वही भगवान सदाशिव हैं। उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि इस ब्रह्मांड में कुछ भी शिव से अलग नहीं है। यह ज्ञान अत्यंत दुर्लभ है और ज्ञानीजन भी इसे सहज ढंग से प्राप्त नहीं कर पाते। विचित्रवीर्य ने हृदय में शिवमयी भावना को दृढ़ कर लिया। इसी ज्ञान से उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया और भगवान शिव के प्रिय भक्त बन गए।


इसी पुण्य के प्रभाव से उन्हें पुनः भगवान शिव की लीला में भाग लेने के लिए दिव्य रूप मिला। जब दक्ष प्रजापति की कन्या सती के वियोग से शिवजी ने क्रोध में अपनी जटाएं फटकारीं, उस समय उनके मस्तक से वीरभद्र नामक वीर उत्पन्न हुआ, वह यही विचित्रवीर्य थे! वीरभद्र ने ही दक्ष के यज्ञ का विनाश कर दिया और शिव की महिमा को प्रतिष्ठित किया। इसी प्रकार, बहुत से राजा जैसे भरत, मांधाता, धुंधुमार और हरिश्चंद्र आदि ने भी शिवरात्रि व्रत के प्रभाव से ही सिद्धि प्राप्त की। अनगिनत कुल और वंश इस श्रेष्ठ व्रत के प्रभाव से उद्धार पा चुके हैं, जिनकी गणना करना भी असंभव है। इसलिए शिवरात्रि का व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला, परम दुर्लभ ज्ञान देने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है।

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