शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी समेत कई विश्वविद्यालयों की ओर से न्यायमूर्ति गवई का उनके इस कदम के लिए स्वागत किया गया है। उनके शपथ ग्रहण में अपनी जुबान के प्रयोग ने देश के करोड़ों हिंदी और भारतीय भाषा प्रेमियों को नई उम्मीद से भर दिया है। उन्हें आशा है कि न्यायमूर्ति गवई की अगुवाई में हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को न्यायपालिका में सम्मान मिलेगा। उनसे उम्मीदों की वजह है न्यायपालिका में हिंदी और भारतीय भाषाओं की स्थिति।
इसे बिडंबना ही कहेंगे कि छह साल पहले संयुक्त अरब अमीरात के न्यायालयों में हिंदी में सुनवाई की अनुमति मिल चुकी है, लेकिन अब भी देश की उच्च न्यायपालिका की भाषा अंग्रेजी ही है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अब भी सुनवाई भारतीय भाषाओं के बजाय अंग्रेजी में ही जारी है। न्यायमूर्ति गवई से उम्मीद की वजह है कि उनके पद में निहित अधिकार। इसके मुताबिक, बिना मुख्य न्यायाधीश की सहमति के किसी भी हाईकोर्ट की कार्यवाही का माध्यम वहां की भाषा नहीं बन सकती।
संविधान के अनुच्छेद 348 के भाग एक ए के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की सभी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में करने का प्रावधान है। हालांकि, इसी अनुच्छेद के भाग दो में प्रावधान है कि अगर कोई राज्य भारतीय भाषाओं में कामकाज करना चाहे, तो उस राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की सहमति से, अपने राज्य के हाईकोर्ट की कार्यवाही में हिंदी या अपने राज्य की आधिकारिक भाषा के प्रयोग की मंजूरी दे सकता है। संविधान के इस प्रावधान की ही तरह राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 7 में भी कहा गया है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस राज्य के हाईकोर्ट के फैसले या आदेश के लिए अंग्रेजी के साथ हिंदी या राज्य की आधिकारिक भाषा के प्रयोग की मंजूरी दे सकता है। लेकिन इस प्रावधान का प्रयोग अब तक बहुत कम ही हुआ है।
संविधान के प्रावधानों के तहत हिंदी को 26 जनवरी, 1965 से राजभाषा के तौर पर पूरे देश में कामकाज करने की अनुमति मिलनी थी। लेकिन इसके खिलाफ तीखे विरोध के साथ तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति मैदान में कूद पड़ी थी। 26 जनवरी, 1965 को द्रविड़ राजनीति ने समूचे तमिलनाडु में हिंदी विरोध में काला झंडा फहराने की अपील तक कर डाली थी। हालांकि, जब उसे एहसास हुआ कि गणतंत्र दिवस पर ऐसा करना उचित नहीं होगा, तो एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को उसने ऐसा किया। राजभाषा को लेकर होते रहे ऐसे विवादों की वजह से राजभाषा नीति पर विचार के लिए मंत्रिमंडल समिति का गठन किया गया, जिसने 21 मई, 1965 की अपनी बैठक में यह तय किया कि हाईकोर्ट में अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भाषा के प्रयोग से संबंधित प्रस्ताव पर देश के मुख्य न्यायाधीश की सहमति प्राप्त की जानी चाहिए। भारतीय भाषा प्रेमियों की नजर में यह प्रावधान भारतीय भाषाओं की न्याय की भाषा बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा है।
अब तक सिर्फ राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के हाईकोर्ट में ही हिंदी में काम करने की अनुमति है। मध्य प्रदेश से निकले राज्य छत्तीसगढ़, बिहार से अलग बने झारखंड और उत्तर प्रदेश से निकले राज्य उत्तराखंड के हाईकोर्ट में भी हिंदी में याचिका तो स्वीकार हो सकती है, पर उसका अंग्रेजी अनुवाद देना भी जरूरी है। एक तरह से देखें तो ठेठ हिंदीभाषी राज्य हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के हाईकोर्ट में अब भी हिंदी प्रमुख भाषा नहीं है। अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों में भी उनकी स्थानीय भाषा में कार्यवाही की समय-समय पर मांग उठती रही है।
कुल मिलाकर, न्यायमूर्ति गवई ने हिंदी में शपथ लेकर एक संदेश तो दिया है कि भारतीय भाषाएं न्यायपालिका के दिल की भाषा हो सकती हैं। बेशक उनका कार्यकाल नवंबर तक ही है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को न्यायपालिका में उचित स्थान दिलाने की दिशा में वह आगे कदम जरूर बढ़ाएंगे।