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आर्थिकी: महंगाई की महाचुनौती... सरकार ला सकती है कुछ नई आर्थिक नीतियां, आरबीआई के रुख पर रहेंगी नजरें

पीएस वोहरा
Updated Tue, 24 Dec 2024 04:40 AM IST

सार

दास के कार्यकाल में कोरोना संकट से जूझने के बावजूद भारत पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना। अब नए गवर्नर को भी कई चुनौतियों से जूझना है।
 
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आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा - फोटो : अमर उजाला


एक समय में आरबीआई के मुखिया के तौर पर विख्यात अर्थशास्त्री रघुराम राजन इस पद पर रहे, जिन्होंने वर्ष 2003 में ही अमेरिका को चेता दिया था कि वह मंदी के दौर की ओर अग्रसर है। राजन के बाद उन्हीं की तरह उर्जित पटेल को मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में गवर्नर के लिए चुना, लेकिन एकाएक 10 दिसंबर, 2018 को उनके इस्तीफे के बाद 12 दिसंबर, 2018 को जब शक्तिकांत दास गवर्नर के पद पर नियुक्त हुए, तो इस बात पर आर्थिक जगत में एक अंदेशा था कि क्या वह मोदी सरकार के तेजी से बढ़ रहे आर्थिक एजेंडे पर सही ढंग से कदमताल कर पाएंगे। लेकिन उन्होंने करके दिखाया।


पिछले छह वर्षों के दास के कार्यकाल के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था ने कोरोना के आर्थिक संकट को देखा, जब बीते 40 वर्षों में पहली दफा जीडीपी नकारात्मक रही। फिर वैश्विक मोर्चे पर जी-20 में भारत के एक वर्ष के अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान भी कई तरह की सकारात्मक सोच को वास्तविक परिणाम में बदलते हुए पाया। यह भी ज्ञात रहे कि इन्हीं वर्षों में भारत ने जीडीपी की दौड़ में बड़ी तेजी से छलांग लगाई और पांचवीं बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था का मुकाम भी हासिल किया।


संजय मल्होत्रा ने आरबीआई की कमान मुश्किल भरे दिनों में संभाली है। इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट दर्ज हुई है। इसी के चलते चालू वित्तीय वर्ष में विकास दर को आरबीआई ने अब 7.2 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत पर अनुमानित किया है। यानी कि भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास दर को बढ़ाना, वर्तमान समय में एक मुख्य चुनौती है और इस चुनौती का पहला मुख्य कारण लगातार बढ़ रही महंगाई है।


बीते, अक्तूबर में महंगाई 6.2 प्रतिशत पर दर्ज हुई, जो कि आरबीआई की नीतियों के मापदंड के मुताबिक अधिकतम महंगाई दर छह प्रतिशत की सीमा से भी बाहर थी। इसके अलावा, इन दिनों वैश्विक स्तर पर तेल के मूल्य में वापस बढ़ोतरी की संभावना है, जिसके चलते आने वाले दिनों में घरेलू बाजार में महंगाई का और असर रहेगा। शायद इसी के चलते आरबीआई ने अब चालू वित्तीय वर्ष के लिए महंगाई को 4.8 प्रतिशत पर अनुमानित किया है, जबकि पहले ये अनुमान 4.5 प्रतिशत था। इससे ऐसा लगता है कि नए गवर्नर संजय मल्होत्रा के लिए महंगाई को नियंत्रण में रखना ही मुख्य चुनौती रहेगी। यह देखना भी आश्चर्यजनक ही होगा कि क्या आरबीआई आने वाले दिनों में रेट कट को प्राथमिकता देगा? नए गवर्नर के सामने दूसरी बड़ी चुनौती डॉलर के मुकाबले रुपये को स्थिर रखना होगी। इस संदर्भ में पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास ने रुपये को डॉलर के मुकाबले स्थिर रखने के लिए पिछले दो वर्षों में भारतीय बाजार में 130 अरब अमेरिकी डॉलर को बेचकर डॉलर की रुपये की तुलना में मांग को नियंत्रित करने की कोशिश की, ताकि रुपया अधिक कमजोर न हो।


अब इस बात की सुगबुगाहट ज्यादा है कि पिछले दो वर्षों से अधिक समय से भारतीय रुपया डॉलर के सामने 84 के स्तर पर स्थिर है, क्या इसे इसी सीमा पर नियंत्रित किया जाएगा या उसमें कुछ बढ़ोतरी की स्वीकृति रहेगी, ताकि भारत के निर्यातों को नुकसान न हो। पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास की रुपये को 84 पर नियंत्रित करने की नीतियों के चलते भारतीय निर्यातों में वर्ष 2019 से अब तक मात्र 4.5 प्रतिशत की ही वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि उससे पहले बीते दो दशकों में यह वृद्धि दर 10 प्रतिशत थी।

आने वाले समय में वैश्विक तौर पर भी कुछ चुनौतियां नए तरीके से आरबीआई के सामने आएंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की आर्थिक नीतियां किस तरफ करवट लेती हैं, यह भी मुख्य तौर पर देखना होगा। वहीं, शेयर बाजार में कुछ उठापटक होती है, तो उसके प्रति भी आरबीआई का क्या रुख रहेगा? यह सब आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। वर्तमान समय में मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के दौर में है और आगामी एक फरवरी के बजट में निश्चित तौर पर आर्थिक विकास के मोर्चे पर सरकार की कुछ नई आर्थिक नीतियां देखने को मिलेंगी और उससे पूर्व आरबीआई का रुख भी इस पक्ष पर काफी कुछ स्पष्ट कर देगा।

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