इन सबकी स्मृति साथ लिए सियाचिन के वायु सैन्य हवाई अड्डे थॉइस से 56 वायुवीर अर्थात वायुसेना के सेवारत अधिकारी, साथ में थल सेना के वरिष्ठ अफसर, और कुछ पूर्व सैनिक एक ऐसी कार रैली पर सात हजार किलोमीटर की यात्रा करते हुए 8 अक्तूबर यानी वायुसेना दिवस पर निकले, जो 1947 के बाद अपने किस्म का पहला वायुसैनिक युवा संपर्क अभियान कहा जा सकता है। रैली में दो माउंट एवरेस्ट विजेता हैं-एक महिला सेनानी-कर्नल अश्विनी पवार और दूसरे वैश्विक ख्याति के पर्वतारोही एवरेस्ट विजेता ग्रुप कैप्टन आरसी त्रिपाठी। रैली के कमांडर विंग कमांडर विजय प्रकाश भट्ट वायुसेना में अपने रोमांचकारी कारनामों के लिए जाने जाते हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नूतन वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह के साथ इस रैली को राष्ट्रीय समर स्मारक से विदा किया। इस रैली की सफलता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान था राजमार्गों का कमाल का बना होना। ऐसे राजमार्ग, जहां कारें और ट्रक ही, नहीं युद्धक विमान भी उतर सकें। केंद्रीय सड़क एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और उनके महाबली संगठन एनएचआईडीसीएल ने लद्दाख से चीन सीमा तक जो राजमार्ग बनाए हैं, उनके कारण सीमा सुरक्षा ही मजबूत नहीं हुई, बल्कि इस वायुवीर रैली को भी सफलता मिली।
चीन ने अक्तूबर 1962 में भारत पर हमला किया था। उस समय सेना के आर्टिलरी वाले ट्रक रस्सियों से खींचकर सीमा तक पहुंचे, क्योंकि मार्ग ही नहीं थे। इसके चित्र जसवंतगढ़ स्मारक में लगे हुए हैं। यहां भारतीय सैनिकों के बलिदान को प्रणाम करते हुए रैली तीस अक्तूबर को संपन्न होगी। चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को मैकमोहन रेखा पार कर भारत पर हमला किया था। तवांग, बोमडिला, तेजपुर तक लड़ाई हुई। उस समय हिंदी-चीनी भाई-भाई के मोह में सेना को आवश्यक रक्षा सामग्री नहीं मिली थी। थ्री नॉट थ्री की बंदूकों से सैनिकों ने अपना शौर्य दिखाया और अमर हो गए। पंडित नेहरू का आकाशवाणी पर दिया गया संदेश आज भी असम और पूर्वांचल वासियों को चुभता है, जिसमें उन्होंने यहां के नागरिकों को लगभग विदाई ही दे दी थी। इस क्षेत्र में आज भारतीय सेनाओं का प्रभाव सैकड़ों गुना बढ़ गया है। मोदी का भारत बासठ का भारत नहीं। वर्ष 2062 आते आते भारत चीन पर पूरी तरह हावी ही नहीं, बल्कि अपनी खोई भूमि वापस लेने में समर्थ होगा।
तवांग के भारत में आने की भी एक रोमांचक कथा है। तवांग पर आज भी चीन दावा करता है, यह संपूर्ण पूर्वोत्तर का सबसे महत्वपूर्ण सामरिक स्थान है। वर्ष 1951 में भारत के सेनाध्यक्ष ब्रिटिश फील्ड मार्शल रॉय बाउचर थे। तब असम के राज्यपाल जयरामदास दौलत राम ने समझा था कि तवांग पर जिसका कब्जा होगा, वही संपूर्ण उत्तरपूर्वांचल को नियंत्रित कर सकेगा। उन्होंने भारतीय सेना से अवकाश प्राप्त मेजर बॉब खाथिंग को बुलाकर गोपनीय ऑपरेशन के तहत तवांग पर भारत का नियंत्रण स्थापित करवाया। उन्हीं मेजर खाथिंग की स्मृति में तवांग के जांबाज सैनिकों का एक सुंदर संग्रहालय दिवाली के दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह उद्घाटित करेंगे।
यह रैली मिशन बनी है। इसने लद्दाख में सिंधु का पावन स्पर्श किया, जम्मू-कश्मीर, पंजाब से रावी, सतलज, ब्यास, चिनाब के दर्शन किए, गंगा और यमुना के दोआब देहरादून से गुजरते हुए आगरा, लखनऊ, गोरखपुर, दरभंगा, कूचबिहार, हाशिमारा (भूटान और बांग्लादेश सीमा) से गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र के तट पर विश्राम किया। कई विश्वविद्यालयों के हजारों छात्रों से संवाद हुआ। तेजपुर, जहां बासठ में चीनी हमले से लोग विस्थापित हो गए थे, में वायुसेना स्टेशन में रुके और उच्च वायुसेना अधिकारियों से स्वागत स्वीकारते हुए दिरांग में अरुणाचल प्रवेश किया। मन यह कहने का है कि जैसे कोई महान तीर्थ किए बिना संतोष नहीं होता, वैसे ही तवांग आए बिना भारतीय जीवन अधूरा मानना चाहिए। यहां सेना का हर दिन शौर्य पर्व होता है। अरुणाचल सुंदर है, यह भारत का सुप्रभात प्रांत है, यहां हर घर गांव में हिंदी और जयहिंद है, लेकिन प्रांत चीन के निशाने पर है। चीन इसे अपने नक्शे में दिखाता है। भारत के नेता, राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री जब अरुणाचल आते हैं, तो बीजिंग से विरोध होता है। यहां भीतर ही भीतर समाज को देश विरक्त बनाने, विदेशी धन पोषित षड्यंत्र भी चल रहे हैं। ऐसे महान सामरिक योद्धा के नगर तवांग में दिवाली एक नहीं हजार कारणों से महत्वपूर्ण है। सभी वीर सैनिकों को, वायुवीरों काे दिवाली का त्योहार शुभ हो।